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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 53

५० जगजीवन साहब की वानी
जाइगा चल रहहि ना कछु, गहहु पद निर्बान ।
जगजीवन मति निर्मलं धरु, रहहु अंतरध्यान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
मनुवाँ सच नाम ले गाई ।
दुनिया चली जात पल छिन दिन,
कोऊ न थिर ठहराई ॥ १ ॥
नहिं करार दिन घरी बरस का,
केहु का जानि न जाई ।
मैं तैं करि अभिमान गुमानहिं,
सुख परि गे बौराई ॥ २ ॥
कोउ काहु क नहिं मातु पिता हितु,
नारि बन्धु कुटुंबाई ।
ये सब अपने काम स्वार्थ के,
अंत रहैं अरुगाई ॥ ३ ॥
ऐसे सूल काँट ते छेदे,
नहिं कोइ लेत बचाई ।
जगजीवन सब बृथा जानिकै,
रहे चरन सिर नाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
कलि जागत जे राम की कानि ।
नहि डरपत आहै मन माहीं भरम पड़े हैरानि ॥ १ ॥
देत हैं दुख जानि दुखियहिं दरद नहिं मन आनि ।
होयगी दरबार फजिहत मारि बूझहिं छानि ॥ २ ॥
मारि मुगरिन मूड़ फोरहिं मानिहै न हैवान ।
जन्म कर्म नसाइ जैहै होइ है सब हानि ॥ ३ ॥