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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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४६ जगजीवन साहब की बानी
बाहर भयो गइ सुबुद्धि वह, भे अहंकार गुमानी ।
तीनिउ पन गे नाम बिहूने, अंत बूड़ि बिनु पानी ॥ ४ ॥
कैसेहु नहीं मुग्ध नर चेतत, कहै सब्द यह बानी ।
जगजीवन बचिहै पै सोई, चित्त चरन ठहरानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३६ ॥
बौरे समुझि देखि मन माहीं ।
माया देखि कै भूल फूल नहिं, तोर नहीं कछु आहीं ॥ १ ॥
दिना चारि का अहै पेखना, कोउ काहू का नाहीं ।
सुधि बिसराय चेत नहिं कीन्ह्यो, अंत काल पछिताहीं ॥ २ ॥
देह धरे नर नाम न जान्यो, बृथा जियहि जग माहीं ।
जगजीवन भजु राम निर्भय ह्वै, रहिये चरनन माहीं ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साधो देखहु अपने मनहिं बिचारी ॥ टेक ॥
दिना चारि का यह है खाका,
सो तकि नहिं भूलहु संसारी ।
परि कै सुखद भरम नहिं भटकहु,
ह्वै सचेत रहु डोरि सँभारी ॥ १ ॥
नाम बिहून नीच सब हीं ते,
नीच ते नीच बहुत अधिकारी ।
जैसे खाँड़ मीठ सब हीं कहँ,
अनहित लागत खारी ॥ २ ॥
करि बिबेक सों ज्ञान आपने,
जुक्ति बास करि सब ते न्यारी ।
जगजीवन अमृत रस दरसन,
पीवत रहहु सो नैन निहारी ॥ ३ ॥