जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४८ जगजीवन साहब की बानी
साधो साधि सुरति दृढ़ करिये,
रहि रसि बसि छबि अंतर माहीं ।
जगजीवन दास जगत ते न्यारे,
गुरु के चरन बिसरि नहि जाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४० ॥
अरे मन बौरे समुझि विचारु ।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, अब हूँ डोरि संभारु ॥ १ ॥
बहसि न इत उत ह्वै थिर रहि कै, सुकिरत नाम पुकारु ।
नहिं कोइ अचल सबै चलि जाइ हि, कछु नहिं अहै करारु ॥ २ ॥
काया कनक देह नर पायो, करि ले कलुक सँवारु ।
समौ यही फिरि और न पैहौ, भजि कै अपुहि तारु ॥ ३ ॥
लाये प्रीति रीति ऐसी रहु, सूरति छबि न बिसारु ।
जगजीवन सतगुरु के चरनन, जानि सर्वसौ वारु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
बौरे काहे का करत गुमान ।
तोरे नाहिं कछु समुझि देखु मन,
चेतहु होउ न हैवान ॥ १ ॥
दौलत धाम काम नहिं आइहि,
जब तजि है तन प्रान ।
सुत पितु नारि बंधु औ माता,
तजि हैं एउ निदान ॥ २ ॥
कस नहिं सब तजि भजु वहि नामहिं,
ये है सच्च प्रमान ।
जगजीवन दास जग से है न्यारा,
अन्तर धरि रहु ध्यान ॥ ३ ॥