जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४ जगजीवन साहब की बानी
राति दिवस लहि करै पुकार ।
सत मत मंत्र न करै बिचार ॥ ६ ॥
जेहि मत अंतर मिल्यो है धाई ।
कथा पुरान पढ़ब बिसराई ॥ ७ ॥
रटनि रसनि जेहि नाम की आई ।
तेहि का कछु जग नाहिं सधाई ॥ ८ ॥
नहीं तपस्या तिरथ अन्हाई ।
तेहि के दरस पाप कटि जाई ॥ ९ ॥
राम संत ते अंतर नाहीं ।
संत ते कबहूँ न्यारे नाहीं ॥१०॥
जगजीवन कहै प्रगट पुकारी ।
अपने मन महँ लेहु बिचारी ॥११॥
॥ शब्द ३२ ॥
साधो जब ते यह तन थाको ॥ टेक ॥
सुत जनमत सुख आस राखिकै, फिर नहिं कोउ काहू को ।
ऐंठि चलहि डरपहि नहिं मन ते, बचन सो मुँह से भाखो ॥ १ ॥
छूटी कानि लोक की मन ते, नारि नीच तन ताको ।
हँसै हँसावै जानि आप को, नहि बिबेक को आँको ॥ २ ॥
नीच प्रसंग रंग ते रातहि, भ्रमत फिरत है डाको१ ।
जो देख्यो सो कहत हौं परगट, नहीं गुप्त मैं राखो ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
हम समान नहिं कोऊ भाई ।
ऐसा जग की रीति देखिये, कहौं तो कहा न जाई ॥ १ ॥
ऐसी मति संसार की आहै, बातन की अधिकाई ।
सपनेहु रामहि जानहि नाहीं, झगरा नितहि बढ़ाई ॥ २ ॥
( १ ) कूदता हुआ ।