जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द ५६ ॥
संतो गहहु सुरति सँभारि ।
वहि समय जो किहिन है उन, सो सुधि दिह्यो बिसारि ॥ १ ॥
इहाँ तौ कोउ नाहिं थिर है, रहेगा दिन चारि ।
खाइ लैहै काल सब कहँ, जैसे मूस मजारि१ ॥ २ ॥
भाइ भगनी मातु पितु, परिवार हितु सुत नारि ।
अन्त कोउ ना काम अइहै, कोउ न लेहि उबारि ॥ ३ ॥
जानि बृथा मन नाम सुमिरौ, कहत सब्द पुकारि ।
जगजीवन गुरु चरन गहि रहु, सोई लेहि उबारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साधो सत्त नाम जपु प्यारा ॥ टेक ॥
सत्तनाम अंतर धुनि लागी, बास किहे संसारा ।
ऐसे गुप्प चुप्प है सुमिरहु, बिरले लखै निहारा ॥ १ ॥
तजहु बिबाद कुसंगति सबकै, कठिन अहै यह धारा ।
सत्तनाम कै बेड़ा बाँधहु, उतरन कौं भव पारा ॥ २ ॥
जन्म पदारथ पाइ जक्त महँ, आपुन मरहु सँभारा ।
जगजीवन यह सत्त नाम है, पापी केतिक तारा ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
मन तुम भजहु नामहि नाम ।
तारि लीन्ह्यो बहुत पतितन उत्तमं अस नाम ॥ १ ॥
गह्यो जिन परतीत करिकै भये तिन के काम ।
मिटे दुख संताप तिन के भयो सुख आराम ॥ २ ॥
देखि सुख परि भूल नाहीं दौलत औ धन धाम ।
अहै यह सब झूठ आसा नाहिं आवहि काम ॥ ३ ॥
(१) बिल्ली।
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