जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 43, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ें४० जगजीवन साहब की बानी
थिर ह्वै कोउ रहै न पाइहि,
इहाँ बसेरा है दिन चारि ।
अइहैं दूत बाँधि लै जैहैं,
कोऊ नाहीं लगहि गोहारि ॥ २ ॥
दौलत धाम छूटि सब जाइहि,
छुटिहैं मातु पिता सुत नारि ।
जगजीवन गुरु-चरन गहे रहु,
गाढ़ परिहि तौ लेहैं उबारि ॥ ३ ॥
॥ शब्द २४ ॥
यहि जियने का करु न गुमान ॥ टेक ॥
उतहि जन्म पाय नर देही,
भजन बिना को नहि पछितान ।
दौलत धाम देखि कै भूल्यो,
बिसरि गयो वह पाछिल ज्ञान ॥ १ ॥
ना थिर रहे नहीं थिर रहिहै,
जाइहि अंत करि सबै पयान ।
सेन समेत रावन गे छिन महँ,
तिनहूँ के कछु रह्यो न निसान ॥ २ ॥
अन्त काल सब कछु चलि जाइहिं,
चलि जैहे ससि-गन अरु भान ।
जगजीवन सब कछु चलि जाइहि,
रहिहै इक सत नाम निदान ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मनुवाँ समुझि करहु तेवान१ ।
जब तुम आयहु साई पठवा, अब कस भयो हैवान ॥ १ ॥
(१) फिकूर ।