जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ४१
तब कोउ संग साथ नहिं कोऊ, जग आयहु निरबान ।
अब हित लागि चाखि बिषया फल, फिरत अहहु बौरान ॥ २ ॥
भरमत फिरत नहीं थिर बैठत, बिसरि गयो अस्थान ।
नाहीं सुद्धि पाछिली आवत, ता तें भयो गुमान ॥ ३ ॥
हो सचेत अब जागि उलटि कै, निर्गुन करु पहिचान ।
जगजीवन जुग जुग हहु संगी, सतगुरु चरन प्रमान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
सत्त नाम बिना मन कैसे पार तरिहौ ॥ टेक ॥
महा कठिन भर्म जार सूझै नहिं वार पार,
कहौ काह करिहौ ।
जुक्ति करहु चरन सरन लागि पागि,
नहिं तौ फाँसि परिहौ ॥ १ ॥
जे जे जग आये कोऊ नाहिं बाचे,
धीरज कौन धरिहौ ।
जोगी जती सिद्ध साध,
कोऊ नाहिं रहिहौ ॥ २ ॥
मिलि गये अमर भये ते जगत आस,
चित्त ते सब दहिहौ ।
जगजीवन दास गुरू पास,
जुगन जुग संग रहिहौ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
अरे मन समुझि बूझहु ज्ञान ।
भजहु अंतर मगन है कै, होउ नहिं हैरान ॥ १ ॥
नाहिं वार औ पार है, करि जात नाहिं बयान ।
रच्यो रचना जानि कै, अस अहैं कृपानिधान ॥ २ ॥
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