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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

जगजीवन साहब की बानी
बिनती और प्रार्थना
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु मैं तो अहौं तिहारा ।
पूजा अर्चा नाहीं जानों, जानों नाम पियारा ॥ १ ॥
सो हित सदा होत नहिं अनहित, बास किहे संसारा ।
कहत हौं दीन लीन रहों तुम तें, तुम ब्रत राखनहारा ॥ २ ॥
अंतर ध्यान गगन है मगना, निरखौं रूप तिहारा ।
पुहुप गूँधि कै माला लैके, सो पहिराओं हारा ॥ ३ ॥
पान चून औ खैर सुपारी, गरी जायफर डारा ।
कपुर लाइची मेरिया¹ वा में, पूजा यही हमारा ॥ ४ ॥
कटहर कोआ मेवा लायों, सोऊ पवावों² प्यारा ।
कनक नीर कर ते मुख धोओं, तकि के चरन पखारा ॥ ५ ॥
सो चरनामृत नित्त पियो है, सुभ भा जन्म हमारा ।
जगजीवन को दिहे रहहु यह, दाता होहु हमारा ॥ ६ ॥
॥ शब्द २ ॥
प्रभु गति जानि नाहीं जाइ ।
अहै केतिक बुद्धि केहि महँ, कहै को गति गाइ ॥ १ ॥
सेस सम्भू थके ब्रह्मा, बिस्नु तारी लाइ ।
है अपार अगाध गति प्रभु, कहुँ नाहीं पाइ ॥ २ ॥
भान गन ससि तीनि चौथौ, लिया छिनहिं बनाइ ।
जोति एकै कियौ बिस्तर, जहाँ तहाँ समाइ ॥ ३ ॥
सीस दैकै कहौं चरनन, कबहूँ नहिं बिसराइ ।
जगजीवन के सत्य गुरु तुम, चरन की सरनाइ ॥ ४ ॥
(१) मिलाया। खिलाऊँ।

जगजीवन साहिब की बानी
॥ शब्द ३ ॥
तुम ते कहै को बारम्बार ।
जानिये हित आपनो, मो राखिये दरबार ॥ १ ॥
टरौं ना मैं करहुँ सेवा, कठिन माया जार ।
समुझि सो डर होत निसु दिन, तारु अब की बार ॥२॥
नहीं गुन कछु अहै एकौ, औगुन अधिकार ।
करहु माफ गुनाह जैसे, मातु पालत वार१ ॥ ३ ॥
जात जानी दयति२ अब, प्रभु मोहिं है इतवार ।
जगजीवन निरबाहिये, प्रभु जवन कीन करार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
महिं ते करि न बंदगी जाइ ।
सुद्धि तुमहीं बुद्धि तुमहीं, तुमहिं देत लखाइ ॥ १ ॥
केतनि हौं गनती में केतो, कहि न सकौं बनाइ ।
चहे चरन लगाइ राखो, चाहिये बिसराइ ॥ २ ॥
देवता मुनि जती सुर सब, रहे तारी लाइ ।
पढ़ै चारिउ बेद ब्रह्मा, गाइ गाइ सुनाइ ॥ ३ ॥
भस्म अंग लगाइ संकर, रहे जोति मिलाइ ।
कौन जानै गति तुम्हारो, रहे जहँ तहँ छाइ ॥ ४ ॥
जानिये जन आपना मोहिं, कबहुँ ना बिसराइ ।
जगजीवन पर करहु दाया, तबहिं भक्त कहाइ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब मैं कवन गनती आउ ।
दियो जबहि लखाइ महि कहँ, तबहिं सुमिरौ नाउ ॥१॥
समुझि ऐसे परत मोहि कहँ, बसे सरबस ठाउँ ।
अहो न्यारे कहूँ३ नाहीं, रूप की बलि जाउँ ॥ २ ॥
(१) बालक । (२) दात, बख्शिश । (३) कभी ।

बिनती और प्रार्थना। ३
नाम का बल दियो जेहि कहँ, राखि निर्भय गाउँ ।
काल को डर नहीं उहवाँ, भला पायो दाउँ ॥ ३ ॥
चरन सीसहिं राखि निरखी, चाखि दरस अघाउँ ।
जगजीवन गुर करहु दाया, दास तुम्हरा आउँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
अब मोहिं जानु आपन दास ॥ टेक ॥
सीस चरन में रहै लागो, और करौं न आस ।
दियो मोहिं उपदेस तुम्हीं, आइ तुम्हरे पास ॥ १ ॥
लियो ढिग बैठाइ कै जग, जानि सबै निरास ।
भला है अस्थान अम्मर, जोति है परगास ॥ २ ॥
करौं बिनती बहुत बिधि ते, दीजिये विस्वास ।
गति तुम्हारी कौन जानै, जगजीवन है दास ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
बिनती लेहु इतनी मानि ।
कहौं का कहि जात नाहीं, कवन अहौं केतानि ॥ १ ॥
कियो जबहीं दया तुम्हीं, लियो संतन छाँनि ।
रूप नीक लखाय दीन्ह्यौ, होत लाभ न हानि ॥ २ ॥
रहत लागे सदा आगे, सब्द कहत बखानि ।
लागि गा सो पागि गा, पुनि गगन चढ़ि ठहरानि ॥ ३ ॥
निरमल जोति निहारि निरखत, होत अनहद बानि१।
जगजिवन गुरु की भई दाया, लियो मन महँ छानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साँई को केतानि गुन गावै ।
सूझि बूझि तस आवै तेहि का, जेहि का जौन लखावै ॥ १ ॥
आपुहि भजत है आपु भजावत, आपु अलेख लखावै ।
जेहि कहँ अपनी सरनहिं राखै, सोई भगत कहावै ॥ २ ॥

३ जगजीवन साहब की बानी
टारत नहीं चरन ते कबहुँ, नहि कबहुँ बिसरावै ।
सूरति खैंचि ऐंचि जब राखत, जोतिहिं जोत मिलावै ॥ ३ ॥
सतगुर कियो गुरुमुखी तेहिकाँ, दूसर नाहिं कहावै ।
जगजीवन ते भे संग बासी, अंत न कोऊ पावै ॥ ४ ॥
॥ 'शब्द ९' ॥
अब मैं करौं कौन बयान ।
चहौ पल में करहु सोई, होय सो परमान ॥ १ ॥
सहस जिभ्या सेस बरनत, कहत वेद पुरान ।
मोहिं जैसो करहु दाया, करहुँ तैसि बखान ॥ २ ॥
संतन काँह सिखाइ लीन्ह्यो, कहत सोई ज्ञान ।
लागि पागि कै रहे अन्तर, मस्त रहत निर्बान ॥ ३ ॥
रहे मिल तुम्ह नहीं न्यारे, कबहुँ नहिं बिलगान ।
जगजीवन धरि सीस चरनन, नहीं भावै आन ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अब मैं कहौं का कछु ज्ञान ।
बुद्धि हीनं सुद्धि हीनं, हौं अजान हैवान ॥ १ ॥
ब्रह्म सेस महेस सुमिरत, गहै अन्तर ध्यान ।
संत तंते रहत लागे, कहत ग्रंथ पुरान ॥ २ ॥
जोति एकै अहै निर्मल, करै सबै बयान ।
जहाँ जैसे भाव आहे, भयो तस परमान ॥ ३ ॥
करौ दाया जानि आपन, नहीं जानहुँ आन ।
जगजीवन दास सत्य समरथ, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साँई मैं नहीं कछु जाना ॥ टेक ॥
बाल बुद्धि कछु नाहिं जान्यो,
रह्यो सदा हैवाना ।

बिनती और प्रार्थना ।
करि कुसंग कुमारग डोल्यौ,
निसि बासर अभिमाना ॥ १ ॥
नहिं मति मोरि कहौं मैं कहँ लगि,
तुम सब कृपा-निधाना ।
मोहिं सिखाई पढ़ाइ दृढ़ावहु,
तबहिं धरौं मैं ध्याना ॥ २ ॥
मैं बपुरा केतनि किन माहीं,
करि नहिं सकौं बखाना ।
जगजीवन पर दाया करिये,
गुरु निरखै निरबाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द १२ ॥
साँई जब तुम मोहिं बिसरावत ।
भूलि जात भौजाल जगत माँ,
मोहिं नहीं कछु आवत ॥ १ ॥
जानि परत पहिचान होत जब,
चरन सरन लै आवत ।
तब पहिचान होत है तुम ते,
सूरति सुरति मिलावत ॥ २ ॥
जो कोइ चहै कि करौं बंदगी,
बपुरा कौन कहावत ।
चाहत खैंचि सरन ही राखत,
चाहत दूरि बहावत ॥ ३ ॥
हौं अजान अज्ञान अहौं प्रभु,
तुम ते कहि कै सुनावत ।
जगजीवन पर करत हौ दाया,
तेहि ते नहिं बिसरावत ॥ ४ ॥

जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १३ ॥
प्रभुजी का बसि अहै हमारी।
जब चाहत तब भजन करावत,
चाहत देत बिसारी ॥ १ ॥
चाहत पल छिन छूटत नाहीं,
बहुत होत हितकारी ।
चाहत डोरि सूखि पल डारत,
डारि देत संसारी ॥ २ ॥
कहँ लहि बिनय सुनावौं तुम ते,
मैं तो अहौं अनारी।
जगजिवन दास पास रहै चरनन,
कबहुँ करहु न न्यारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द १४ ॥
बंदा कौन बंदगी करई।
रात दिवस मिलि करै बंदगी,
जो पै कबूल न परई ॥ १ ॥
चाहत है मैं रहौं चरन ढिग,
दृढ़ ह्वै धरनी धरई।
साँई चहत मोर है नाहीं,
दूर दूर ह्वै रहई ॥ २ ॥
जोगी जती मुनि जब सब थाके,
करि कै तपस्या मरई।
नाहीं हित करि जानत आपन,
नाहिं काज कछु सरई ॥ ३ ॥
आपु बंदगी करत करावत,
जेहिं पर किरपा करई।

बिनती और प्रार्थना । ७
जगजीवन दास बिनती करि,
बिनवै सीस चरन तर धरई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
प्रभु जी तुम जानत गति मेरी ।
तुम ते छिपा नहीं आहै कछु,
कहा कहौं मैं टेरी ॥ १ ॥
जहँ जहँ गाढ़ पर्यो भक्तन कां,
तहँ तहँ कीन्ह्यो फेरी ।
गाढ़ मिटाय तुरन्तहि डारयो,
दीन्ह्यो सुख घनेरी ॥ २ ॥
जुग जुग होत ऐसै चलि आवा,
सो अब साँझ सबेरी ।
दियो जनाय सोई तस जानै,
बास मनहिं तेहि केरी ॥ ३ ॥
कर औ सीस दियो चरनन महँ,
नहिं अब पाछे हेरी ।
जगजीवन के सतगुरु साहब,
आदि अंत तेहि केरो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १६ ॥
प्रभु बिन किरपा भक्ति न होय ।
कर्म अघ तेहि मेटि डारयो, मंत्र सिखयो सोय ॥ १ ॥
तिरथ बरत करि तपस्या, डारि यहु तन खोय ।
नाहि लाहत नाम रस बहु, नाहिं दृढ़ता होय ॥ २ ॥
कोटि तीर्थ अस्नान करि कै, सैन रहे समोय ।
ऐस करि कै बिचार नाहीं, रहे मन मन रोय ॥ ३ ॥

जगजीवन साहब की बानी
पढ़ि पुरान गरंथ गीता, बकत कीरति सोय।
नहीं अजपा डोरि लागे, भक्ति कैसे होय ॥ ४ ॥
हो दयाल निहाल कर मोहिं दूजा नाहिन कोय।
जगजीवन को चरन गुरु के, नहीं न्यारा होय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १७ ॥
प्रभु जी बुद्धि मोहिं केतानि।
दया जब तुम कीन मो पर, कह्यौ ज्ञान बखानि ॥ १ ॥
भ्रमत रह्यौ अपंथ मारग, पर्यो जाही जानि।
कहाँ लहि मैं कहौं औगुन, महा अघ की खानि ॥ २ ॥
मेटि सकल गुनाह औगुन, सरन लीन्ह्यो आनि।
जानि हित करि आपना मोहिं, और नाहीं मानि ॥ ३ ॥
कहत हौं कर जोरि सुनिये, मोरि अन्तर जानि।
जगजिवन दास तुम्हार आहै, तुमहिं लियो पहिचानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
मैं तौ दास तुम्हार कहावौं।
तुम तजि और न जानौं कोई,
औरै सीस न नावौं ॥ १ ॥
चरन तुम्हारे लागि रहौं मैं,
और सबै बिसरावौं।
तुम्हीं ते निरबाह हमारा,
तुम्हरी कीरति गावौं ॥ २ ॥
चलौं दीनता ह्वै कै सब ते,
नाहिं बिबाद बढ़ावौं।
जो कोइ कीन १ जानि है मोहीं,
तेहि का दूरि बहावौं ॥ ३ ॥
(१) द्रोही।

बिनती और प्रार्थना । ६
आदि अन्त का आहौँ संगी,
त्यागि न अन्तै धावौं ।
जब तुम खुसी सुचित्त होत हौँ,
तब मैं सुरति मिलावौं ॥ ४ ॥
अपने अपने रँग रस माते,
केहि केहि राह लगावौं ।
जगजीवन गुरु चरनन परि कै,
नाहीं सीस उठावौं ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
साईं इतनो बिनती मोरि ।
माँगत हौँ कर जोरि कै तुम ते,
लागि रहै दृढ़ डोरि ॥ १ ॥
रह्योँ अजान नहीं मैं जान्यो,
बहुत हीन मति थोरि ।
जब ते कृपा करि आपन जान्यो,
तब ते सकौँ का तोरि ॥ २ ॥
अब उसवास१ न एकौ मानौँ,
चाखि नाम रस घोरि ।
सदा भरोसा आस तुम्हारी,
भर्म फंद ते तोरि ॥ ३ ॥
चरन ते सीस टरै नहिं टारे,
दीजै हमहि न खोरि ।
जगजिवन दास तुम्हार कहावै,
सतसंगति गहि पोढ़ि ॥ ४ ॥
(१) संसय ।
३

जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द २० ॥
अब मोर मनुवां समुझि डेरात ।
वहि दिन का मोहिं संसा ब्यापत,
कछु गति जानि न जात ॥ १ ॥
काम न आइहि कोउ काहू के,
नारि बंधु पितु मात ।
धोखा देखि सबै कोउ भूला,
थिर नाहीं सब जात ॥ २ ॥
जन्म पाइ जो जानै नाहीं,
कौनि कहौं कुसलात ।
जगजीवन साईं तुम तारहु,
तुमहिं हाथ सब बात ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब सुनि लीजै इतनी हमारी ।
लागी रहै प्रीति निसि बासर,
दास को अपने नाहिं बिसारी ॥ १ ॥
जो मैं चहौं कहि कहँ लौ सुनावों,
औगुन कर्म बहुत अधिकारी ।
सरन चरन की राखि आपनी,
यहु कछु मन में नाहिं बिचारो ॥ २ ॥
काया यहि कर्महिं की आहै,
आपु ते नाहीं जात सँवारो ।
भौसागर हित जानि बूड़ जग,
जेहिं जान्यो तेहिं लियो उबारी ॥ ३ ॥

बिनती और प्रार्थना । ५
लीजै राखि भाखि कहौं तुम ते,
केतिक बात लियो अनगन१ तारी ।
जगजीवन के सांई समरथ,
अपने निकट ते कबहुँ न टारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २२ ॥
सांई मैं नहिं आप का चीन्हा ।
को मैं आहुँ कहाँ ते आयो,
तुम हीं सब कछु कीन्हा ॥ १ ॥
बिंदम बुंद बनायो जामा,
सो पहिराइ कै दीन्हा ।
रहि दस मास अगिन महँ बासा,
तहँ तुम रच्छा कीन्हा ॥ २ ॥
बाहर होत पियत पय बिसरयो,
वह सुधि सब हरि लीन्हा ।
बाल तरुन फिर बृद्ध भये जब,
तबहुँ बिचार न कीन्हा ॥ ३ ॥
अब दाया करि दास जानि कै,
आपन करि कै लीन्हा ।
जगजीवन निरगुन छबि देखै,
चरन कमल चित दीन्हा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २३ ॥
तुम सों मन लागो है मोरा ।
हम तुम बैठे रही अटरिया,
भला बना है जोरा ॥ १ ॥
(१) अनगिनत ।

२ जगजीवन साहब की बानी
सत की सेज बिछाय सूति रहि,
सुख आनन्द घनेरा ।
करता हरता तुमहीं आहहु,
करौं मैं कौन निहोरा ॥ २ ॥
रह्यौँ अजान अब जानि पर्यो है,
जब चितयो एक कोरा ।
अब निर्बाह किये बनि आइहि,
लाय प्रीति नहि तोरिय डोरा ॥ ३ ॥
आवा गमन निवारहु साईं,
आदि अंत का आहिउ चोरा ।
जगजीवन बिनती करि माँगै,
देखत दरस सदा रहौं तोरा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २४ ॥
साँई मोहिं ते सुमिर न जाई ।
पाँच अपरबल जोर अहैं एइ,
इन ते कछु न बिसाई ॥ १ ॥
निसि बासर कल देहि नहीं एइ,
मोहिं औरै राह लगाई ।
जो मैं चहौं गहौं तुव चरना,
इन छिन छिन भरमाई ॥ २ ॥
साथ स

बिनती और प्रार्थना ।
ऊँचे चढ़त आनि कै रोकत,
मानहिं नहीं दोहाई ॥ ४ ॥
अब करु दाया जानि आपना,
बिनय कै कहौं सुनाई ।
जगजीवन कै इतनी बिनती,
तुम सब लेहु बनाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २५ ॥
साईं मैं तो बड़ा अनारी ।
कुमति प्रसंग बास नर्कहिं मा,
आवत नाहिं बिचारी ॥ १ ॥
पर्यों अपरबल महा मोह महँ,
सुधि वह नाहि सँभारी ।
गुन नाहीं औगुन सब बहु बिधि,
बिसरी सुरति हमारी ॥ २ ॥
केतौ करि उपाय मैं थाक्यों,
मैं मन मान्यों हारी ।
अब दाया करि चरन लाई कै,
निकट ते कबहुँ न टारी ॥ ३ ॥
देहु सिखाइ पढ़ाइ ज्ञान मोहिं,
करहु योग अधिकारी ।
जगजीवन को चरन तुम्हारे,
सूरति रहौं निहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
साईं कुदरति अजब तुम्हारो ।
तुम हहु अजब अजब हैं बन्दे,
मैं तुम्हरी बलिहारी ॥ १ ॥

जगजीवन साहेब की बानी
दुनिया अजब धंध मा लागी,
सुधि बुधि नाहिं सँभारी ।
आये फूटि टूटि गारत भै,
का सों कहौं पुकारी ॥ २ ॥
समुझै बूझै बूझै नाहीं,
शब्द कही कहि हारी ।
सो अँदेस होत मन मोरे,
का धौं करहि बिचारी ॥ ३ ॥
आये कहँ ते फिरि कहँ जैहैं,
कहँ ग्रह ग्राम सँवारी ।
भूले फिरहिं मोह मद माते,
इहँ हहिं दिन दुइ चारी ॥ ४ ॥
जेहिं अपनाइ कै चेत चितायौ,
तिन सत सुरति सँभारी ।
जगजीवन मूरति मा मिलि गे,
नैन सों निरखि निहारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २७ ॥
सतगुरु समरथ साहब चरनन पर वारी ॥ टेक ॥
हौं अज्ञान बुद्धिहीन सुद्धि ना सँभारी ।
कर दोऊ तन सीस दीन्ह्यौ गोद हौं तुम्हारी ॥ १ ॥
राखिये अब सरन अपनी कर्म ना बिचारी ।
नेग१ जन्म भर्म के रे डारिये मिटा री ॥ २ ॥
हौं तुम्हार आदि अन्त देहु ना बिसारी ।
ऐसी भाँति दिनं राति चित्त ते न टारी ॥ ३ ॥
(१) अनेक।

बिनती और प्रार्थना । १५
बिनय करि कै कहत हौं सुनि लीजिये हमारी ।
जगजीवन का और ना पनाह है तुम्हारो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २८ ॥
बालक बुद्धि हीन मति मोरी ।
भरमत फिरौं नाहिं दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
सूरति राखौ चरनन मोरी ।
लागि रहै कबहुँ नहिं तोरी ॥ २ ॥
निरखत रहौं जाउँ बलिहारी ।
दास जानि कै नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
तुमहिं सिखाय पढ़ायो ज्ञाना ।
तब मैं धर्यौ चरन का ध्याना ॥ ४ ॥
साईं समरथ तुम हौ मोरे ।
बिनती करौं ठाढ़ कर जोरे ॥ ५ ॥
अब दयाल ह्वै दाया कीजै ।
अपने जन कहँ दरसन दीजै ॥ ६ ॥
नाम तुम्हार मोहिं है प्यारा ।
सोइ भजे घट भा उजियारा ॥ ७ ॥
जगजीवन चरनन दियो माथ ।
साहब समरथ करहु सनाथ ॥ ८ ॥
॥ शब्द २६ ॥
तेरा नाम सुमिरि ना जाय ।
नहीं बस कछु मोर आहै, करहुँ कौन उपाय ॥ १ ॥
जबहिं चाहत हितू करि कै, लेत चरनन लाय ।
बिसरि जब मन जात आहै, देत सब बिसराय ॥ २ ॥
अजब ख्याल अपार लीला, अंत काहु न पाय ।
जीव जंत पतंग जग महँ, काहु ना बिलगाय ॥ ३ ॥

जगजीवन साहब की बानी
करौं बिनती जोरि दुउ कर, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन गुरु चरन सरनं, ह्वै तुम्हार कहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं तौ अरज करौं दरबार ।
भौसागर तकि भरम होत मोहिं,
अब की उतारहु पार ॥ १ ॥
औगुन बहुंत नहीं गुन एकौ,
काम करत बिन कार ।
पग बिहीन कर नाहीं जिन के,
ताहि खवावत चार ॥ २ ॥
बुद्धि हीन सुधि हीन अहौं मैं,
का करि सकौं बिचार ।
अहौं भरोसे सदा तुम्हारे,
तुम प्रति पालनहार ॥ ३ ॥
सुनियत ग्रंथ पुरान कहत अस,
बहुतन करि निस्तार ।
छिनहिं निहाल किहेउ प्रभु बहुतन,
द्विज के दारिद मार ॥ ४ ॥
अब दाया करिये प्रभु इतनी,
आवै मोहिं इतबार ।
जगजीवन चरनन परि बिनवै,
मन ना बहै हमार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
हम तें चूक परत बहुतेरी ।
मैं तौ दास अहौं चरनन का, हम हूँ तन हरि हेरी ॥ १ ॥

बिनती और प्रार्थना । १७
बाल-ज्ञान प्रभु अहै हमारा, झूठ साँच बहुतेरी ।
सो औगुन गुन का कहौं तुम तें, भौसागर तें निबेरी ॥ २ ॥
भव तें भागि आयौं तुव सरनै, कहत अहौं अस टेरी ।
जगजीवन की बिनती सुनिये, राखौ पत जन केरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
अब तुम होहु दयाल तुम्हारी पैयाँ परौं ॥टेक॥
सूझत नहिं मैं भ्रमत फिरत हौं,
पर्यों मोह के जाल ॥ १ ॥
नाम तुम्हार सुमिरि नहिं आवै,
जग संगति जंजाल ॥ २ ॥
आवत जब सुधि वहै समय की,
ब्याकुल होहुँ बेहाल ॥ ३ ॥
हाथ पाँव मेरे बल नाहीं है,
तुमहिं करहु प्रतिपाल ॥ ४ ॥
जगजीवन कौ दरसन दीजै,
अब मोहिं करहु निहाल ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बार बार कहि बिनय सुनावौं ।
तुम्हरी कृपा तें सुरति लगावौं ॥ १ ॥
अनत न जाउँ जाउँ बलिहारी ।
सूरति कबहुँ रहै न न्यारी ॥ २ ॥
जब तुम चहहु रहौं तब पासा ।
कृपा करहु तब बसि बिस्वासा ॥ ३ ॥
दास केर बस एकौ नाहीं ।
तुम जानौ जानै मन माहीं ॥ ४ ॥
३

प्रथम भाग: साखी संग्रह (सतनाम, गुरु व विचार अंग)

१८ जगजीवन साहब की बानी
जब तुम जन का देत जनाई।
तब मन भजत अहै लौ लाई ॥ ५ ॥
दूजा कौन है काहि बतावौं।
कृपा करहु तब ना बिसरावौं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहै बिनय सुनाई।
सतगुरु चरन बिसरि नहिं जाई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साईं को गति गावै तेरी।
जेहि जस ज्ञान बयान कीन्ह तस,
सूरत बास बसे री ॥ १ ॥
ब्रह्मा सनक सनंदन सक्ती,
संकर सहस फने री।
बिस्नु सत्य रस चाखि मस्त है,
गावत ज्ञान घनेरी ॥ २ ॥
अंत अनंत ध्यान तेहि कीन्हे,
भे सतलोक बसेरी।
नाम अधार बिचारत ज्यों जग,
सन्मुख पलक न फेरी ॥ ३ ॥
जेहि हित जानि दया दुख काट्यौ,
भौजल धार निवेरी।
जगजीवन बिस्वास तुम्हारी,
टूटी भ्रम की बेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
चरन सरन अब आयौं, मैं नहिं जानी रे ॥ टेक ॥
मैं अजान अज्ञान है, कछु सुधि न सँभारी रे।
अंध रह्यौं सूझा नहीं, भूल्यौं संसारी रे ॥ १ ॥

बिनती और प्रार्थना । १६
पाँच भ्रमत जहँ तहँ, एक नहिं आयो रे ।
मोरि लागु नहि अहै, ता ते बिसरायो रे ॥ २ ॥
मिलि पचीस तेहि सँग, मोहिं बहुरि दिखायो रे ।
नाचि नाचि मोहि लियो, नाम नहिं आयो रे ॥ ३ ॥
मैं तौ मद माता फिरयों, चित ठहर न आना रे ।
भा गुमान रस पाय तेहि, सुधि बुधि हैवाना रे ॥ ४ ॥
कठिन जार भ्रम फाँसि है जग, बँधा संसारा रे ।
जेहि का तुम दाया करी, तोहि भयो उबारा रे ॥ ५ ॥
न्यारे तुम्हरे दास भे, लिप्त नहिं काहू माहीं रे ।
जगत कहै हम महँ अहैं, वै तुमहीं माहीं रे ॥
औगुन क्रम सब मेटिये, सुनु कृपा-निधाना रे ।
जगजीवन दास तुम्हार है, चरनन लिपटाना रे ।
॥ शब्द ३६ ॥
बिनती सुनिये कृपा-निधान ।
जानत अहौ जनावत तुमहीं, का करि सकौं बयान ॥ १ ॥
खात पियत जो डोलत बोलत, और न दूसर आन ।
ब्यापि रह्यो कहुँ चेत सरन करि, काहू भरम भुलान ॥ २ ॥
माया प्रबल अंत कछु नाहीं, सो मन समुझि डरान ।
अब तो सरन और ना जानौं, करिहौं सो परमान ॥ ३ ॥
सुद्धि बुद्धि कछु नाहीं मोरे, बालक जैसे अजान ।
मात सुतहि प्रतिपाल करत है, राखत हित करि प्रान ॥ ४ ॥
मैं केतानि कवनि गिनती महँ, गावत बेद पुरान ।
जगजीवन का आपन जानहु, चरन रहे लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साँईं मैं तुम्हरी बलिहारी ।
कहौं काह कहि आवत मन तन तुम पर वारी ॥ १ ॥

२४ जगजीवन साहब की बानी
देखत अहौं खरो ताम्रोवर१, झलकै जोति तुम्हारी ।
केहु भरमाय देत माया महँ, केहु करत हितकारी ॥ २ ॥
देखत अहहूँ खेलत सब महँ को करि सकै विचारी ।
करता हरता तुम हीं आहौ अजब बनी फुलवारी ॥ ३ ॥
दासन दास कै मोहि जानिये जानत अहौ हमारी ।
जगजीवन दियो सीस चरन तर कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
साईं मैं अजान अज्ञाना ।
जानों नहीं बूझि नहि आवै भरमत फिरौं भुलाना ॥ १ ॥
हौ समरथ सिद्धि के दाता मोहिं सिखावहु ज्ञाना ।
करौं सो जानि जनाय देव जब धरौं चरन कै ध्याना ॥ २ ॥
दीन लीन सुभ सुमन सुमारग यह बर दौजै दाना ।
आवै दृष्टि दिस देखत रहौं परगट करौं बयाना ॥ ३ ॥
काहूँ२ रहौं सरन नहिं छूटै तुम तजि भजौं न आना ।
जगजीवन कर जोरि