जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती और प्रार्थना । १५
बिनय करि कै कहत हौं सुनि लीजिये हमारी ।
जगजीवन का और ना पनाह है तुम्हारो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २८ ॥
बालक बुद्धि हीन मति मोरी ।
भरमत फिरौं नाहिं दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
सूरति राखौ चरनन मोरी ।
लागि रहै कबहुँ नहिं तोरी ॥ २ ॥
निरखत रहौं जाउँ बलिहारी ।
दास जानि कै नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
तुमहिं सिखाय पढ़ायो ज्ञाना ।
तब मैं धर्यौ चरन का ध्याना ॥ ४ ॥
साईं समरथ तुम हौ मोरे ।
बिनती करौं ठाढ़ कर जोरे ॥ ५ ॥
अब दयाल ह्वै दाया कीजै ।
अपने जन कहँ दरसन दीजै ॥ ६ ॥
नाम तुम्हार मोहिं है प्यारा ।
सोइ भजे घट भा उजियारा ॥ ७ ॥
जगजीवन चरनन दियो माथ ।
साहब समरथ करहु सनाथ ॥ ८ ॥
॥ शब्द २६ ॥
तेरा नाम सुमिरि ना जाय ।
नहीं बस कछु मोर आहै, करहुँ कौन उपाय ॥ १ ॥
जबहिं चाहत हितू करि कै, लेत चरनन लाय ।
बिसरि जब मन जात आहै, देत सब बिसराय ॥ २ ॥
अजब ख्याल अपार लीला, अंत काहु न पाय ।
जीव जंत पतंग जग महँ, काहु ना बिलगाय ॥ ३ ॥