जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished110 पृष्ठ
पृष्ठ 9, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 9
जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १३ ॥
प्रभुजी का बसि अहै हमारी।
जब चाहत तब भजन करावत,
चाहत देत बिसारी ॥ १ ॥
चाहत पल छिन छूटत नाहीं,
बहुत होत हितकारी ।
चाहत डोरि सूखि पल डारत,
डारि देत संसारी ॥ २ ॥
कहँ लहि बिनय सुनावौं तुम ते,
मैं तो अहौं अनारी।
जगजिवन दास पास रहै चरनन,
कबहुँ करहु न न्यारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द १४ ॥
बंदा कौन बंदगी करई।
रात दिवस मिलि करै बंदगी,
जो पै कबूल न परई ॥ १ ॥
चाहत है मैं रहौं चरन ढिग,
दृढ़ ह्वै धरनी धरई।
साँई चहत मोर है नाहीं,
दूर दूर ह्वै रहई ॥ २ ॥
जोगी जती मुनि जब सब थाके,
करि कै तपस्या मरई।
नाहीं हित करि जानत आपन,
नाहिं काज कछु सरई ॥ ३ ॥
आपु बंदगी करत करावत,
जेहिं पर किरपा करई।