जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजगजीवन साहब की बानी
पढ़ि पुरान गरंथ गीता, बकत कीरति सोय।
नहीं अजपा डोरि लागे, भक्ति कैसे होय ॥ ४ ॥
हो दयाल निहाल कर मोहिं दूजा नाहिन कोय।
जगजीवन को चरन गुरु के, नहीं न्यारा होय ॥ ५ ॥
॥ शब्द १७ ॥
प्रभु जी बुद्धि मोहिं केतानि।
दया जब तुम कीन मो पर, कह्यौ ज्ञान बखानि ॥ १ ॥
भ्रमत रह्यौ अपंथ मारग, पर्यो जाही जानि।
कहाँ लहि मैं कहौं औगुन, महा अघ की खानि ॥ २ ॥
मेटि सकल गुनाह औगुन, सरन लीन्ह्यो आनि।
जानि हित करि आपना मोहिं, और नाहीं मानि ॥ ३ ॥
कहत हौं कर जोरि सुनिये, मोरि अन्तर जानि।
जगजिवन दास तुम्हार आहै, तुमहिं लियो पहिचानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द १८ ॥
मैं तौ दास तुम्हार कहावौं।
तुम तजि और न जानौं कोई,
औरै सीस न नावौं ॥ १ ॥
चरन तुम्हारे लागि रहौं मैं,
और सबै बिसरावौं।
तुम्हीं ते निरबाह हमारा,
तुम्हरी कीरति गावौं ॥ २ ॥
चलौं दीनता ह्वै कै सब ते,
नाहिं बिबाद बढ़ावौं।
जो कोइ कीन १ जानि है मोहीं,
तेहि का दूरि बहावौं ॥ ३ ॥
(१) द्रोही।