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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 19

जगजीवन साहब की बानी
करौं बिनती जोरि दुउ कर, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन गुरु चरन सरनं, ह्वै तुम्हार कहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं तौ अरज करौं दरबार ।
भौसागर तकि भरम होत मोहिं,
अब की उतारहु पार ॥ १ ॥
औगुन बहुंत नहीं गुन एकौ,
काम करत बिन कार ।
पग बिहीन कर नाहीं जिन के,
ताहि खवावत चार ॥ २ ॥
बुद्धि हीन सुधि हीन अहौं मैं,
का करि सकौं बिचार ।
अहौं भरोसे सदा तुम्हारे,
तुम प्रति पालनहार ॥ ३ ॥
सुनियत ग्रंथ पुरान कहत अस,
बहुतन करि निस्तार ।
छिनहिं निहाल किहेउ प्रभु बहुतन,
द्विज के दारिद मार ॥ ४ ॥
अब दाया करिये प्रभु इतनी,
आवै मोहिं इतबार ।
जगजीवन चरनन परि बिनवै,
मन ना बहै हमार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
हम तें चूक परत बहुतेरी ।
मैं तौ दास अहौं चरनन का, हम हूँ तन हरि हेरी ॥ १ ॥