जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ जगजीवन साहब की बानी
जब तुम जन का देत जनाई।
तब मन भजत अहै लौ लाई ॥ ५ ॥
दूजा कौन है काहि बतावौं।
कृपा करहु तब ना बिसरावौं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहै बिनय सुनाई।
सतगुरु चरन बिसरि नहिं जाई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साईं को गति गावै तेरी।
जेहि जस ज्ञान बयान कीन्ह तस,
सूरत बास बसे री ॥ १ ॥
ब्रह्मा सनक सनंदन सक्ती,
संकर सहस फने री।
बिस्नु सत्य रस चाखि मस्त है,
गावत ज्ञान घनेरी ॥ २ ॥
अंत अनंत ध्यान तेहि कीन्हे,
भे सतलोक बसेरी।
नाम अधार बिचारत ज्यों जग,
सन्मुख पलक न फेरी ॥ ३ ॥
जेहि हित जानि दया दुख काट्यौ,
भौजल धार निवेरी।
जगजीवन बिस्वास तुम्हारी,
टूटी भ्रम की बेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
चरन सरन अब आयौं, मैं नहिं जानी रे ॥ टेक ॥
मैं अजान अज्ञान है, कछु सुधि न सँभारी रे।
अंध रह्यौं सूझा नहीं, भूल्यौं संसारी रे ॥ १ ॥