जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 17, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंजगजीवन साहेब की बानी
दुनिया अजब धंध मा लागी,
सुधि बुधि नाहिं सँभारी ।
आये फूटि टूटि गारत भै,
का सों कहौं पुकारी ॥ २ ॥
समुझै बूझै बूझै नाहीं,
शब्द कही कहि हारी ।
सो अँदेस होत मन मोरे,
का धौं करहि बिचारी ॥ ३ ॥
आये कहँ ते फिरि कहँ जैहैं,
कहँ ग्रह ग्राम सँवारी ।
भूले फिरहिं मोह मद माते,
इहँ हहिं दिन दुइ चारी ॥ ४ ॥
जेहिं अपनाइ कै चेत चितायौ,
तिन सत सुरति सँभारी ।
जगजीवन मूरति मा मिलि गे,
नैन सों निरखि निहारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २७ ॥
सतगुरु समरथ साहब चरनन पर वारी ॥ टेक ॥
हौं अज्ञान बुद्धिहीन सुद्धि ना सँभारी ।
कर दोऊ तन सीस दीन्ह्यौ गोद हौं तुम्हारी ॥ १ ॥
राखिये अब सरन अपनी कर्म ना बिचारी ।
नेग१ जन्म भर्म के रे डारिये मिटा री ॥ २ ॥
हौं तुम्हार आदि अन्त देहु ना बिसारी ।
ऐसी भाँति दिनं राति चित्त ते न टारी ॥ ३ ॥
(१) अनेक।