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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 5

जगजीवन साहिब की बानी
॥ शब्द ३ ॥
तुम ते कहै को बारम्बार ।
जानिये हित आपनो, मो राखिये दरबार ॥ १ ॥
टरौं ना मैं करहुँ सेवा, कठिन माया जार ।
समुझि सो डर होत निसु दिन, तारु अब की बार ॥२॥
नहीं गुन कछु अहै एकौ, औगुन अधिकार ।
करहु माफ गुनाह जैसे, मातु पालत वार१ ॥ ३ ॥
जात जानी दयति२ अब, प्रभु मोहिं है इतवार ।
जगजीवन निरबाहिये, प्रभु जवन कीन करार ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
महिं ते करि न बंदगी जाइ ।
सुद्धि तुमहीं बुद्धि तुमहीं, तुमहिं देत लखाइ ॥ १ ॥
केतनि हौं गनती में केतो, कहि न सकौं बनाइ ।
चहे चरन लगाइ राखो, चाहिये बिसराइ ॥ २ ॥
देवता मुनि जती सुर सब, रहे तारी लाइ ।
पढ़ै चारिउ बेद ब्रह्मा, गाइ गाइ सुनाइ ॥ ३ ॥
भस्म अंग लगाइ संकर, रहे जोति मिलाइ ।
कौन जानै गति तुम्हारो, रहे जहँ तहँ छाइ ॥ ४ ॥
जानिये जन आपना मोहिं, कबहुँ ना बिसराइ ।
जगजीवन पर करहु दाया, तबहिं भक्त कहाइ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
अब मैं कवन गनती आउ ।
दियो जबहि लखाइ महि कहँ, तबहिं सुमिरौ नाउ ॥१॥
समुझि ऐसे परत मोहि कहँ, बसे सरबस ठाउँ ।
अहो न्यारे कहूँ३ नाहीं, रूप की बलि जाउँ ॥ २ ॥
(१) बालक । (२) दात, बख्शिश । (३) कभी ।