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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 14

बिनती और प्रार्थना । ५
लीजै राखि भाखि कहौं तुम ते,
केतिक बात लियो अनगन१ तारी ।
जगजीवन के सांई समरथ,
अपने निकट ते कबहुँ न टारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द २२ ॥
सांई मैं नहिं आप का चीन्हा ।
को मैं आहुँ कहाँ ते आयो,
तुम हीं सब कछु कीन्हा ॥ १ ॥
बिंदम बुंद बनायो जामा,
सो पहिराइ कै दीन्हा ।
रहि दस मास अगिन महँ बासा,
तहँ तुम रच्छा कीन्हा ॥ २ ॥
बाहर होत पियत पय बिसरयो,
वह सुधि सब हरि लीन्हा ।
बाल तरुन फिर बृद्ध भये जब,
तबहुँ बिचार न कीन्हा ॥ ३ ॥
अब दाया करि दास जानि कै,
आपन करि कै लीन्हा ।
जगजीवन निरगुन छबि देखै,
चरन कमल चित दीन्हा ॥ ४ ॥
॥ शब्द २३ ॥
तुम सों मन लागो है मोरा ।
हम तुम बैठे रही अटरिया,
भला बना है जोरा ॥ १ ॥
(१) अनगिनत ।