जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती और प्रार्थना । १६
पाँच भ्रमत जहँ तहँ, एक नहिं आयो रे ।
मोरि लागु नहि अहै, ता ते बिसरायो रे ॥ २ ॥
मिलि पचीस तेहि सँग, मोहिं बहुरि दिखायो रे ।
नाचि नाचि मोहि लियो, नाम नहिं आयो रे ॥ ३ ॥
मैं तौ मद माता फिरयों, चित ठहर न आना रे ।
भा गुमान रस पाय तेहि, सुधि बुधि हैवाना रे ॥ ४ ॥
कठिन जार भ्रम फाँसि है जग, बँधा संसारा रे ।
जेहि का तुम दाया करी, तोहि भयो उबारा रे ॥ ५ ॥
न्यारे तुम्हरे दास भे, लिप्त नहिं काहू माहीं रे ।
जगत कहै हम महँ अहैं, वै तुमहीं माहीं रे ॥
औगुन क्रम सब मेटिये, सुनु कृपा-निधाना रे ।
जगजीवन दास तुम्हार है, चरनन लिपटाना रे ।
॥ शब्द ३६ ॥
बिनती सुनिये कृपा-निधान ।
जानत अहौ जनावत तुमहीं, का करि सकौं बयान ॥ १ ॥
खात पियत जो डोलत बोलत, और न दूसर आन ।
ब्यापि रह्यो कहुँ चेत सरन करि, काहू भरम भुलान ॥ २ ॥
माया प्रबल अंत कछु नाहीं, सो मन समुझि डरान ।
अब तो सरन और ना जानौं, करिहौं सो परमान ॥ ३ ॥
सुद्धि बुद्धि कछु नाहीं मोरे, बालक जैसे अजान ।
मात सुतहि प्रतिपाल करत है, राखत हित करि प्रान ॥ ४ ॥
मैं केतानि कवनि गिनती महँ, गावत बेद पुरान ।
जगजीवन का आपन जानहु, चरन रहे लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साँईं मैं तुम्हरी बलिहारी ।
कहौं काह कहि आवत मन तन तुम पर वारी ॥ १ ॥