जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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२४ जगजीवन साहब की बानी
देखत अहौं खरो ताम्रोवर१, झलकै जोति तुम्हारी ।
केहु भरमाय देत माया महँ, केहु करत हितकारी ॥ २ ॥
देखत अहहूँ खेलत सब महँ को करि सकै विचारी ।
करता हरता तुम हीं आहौ अजब बनी फुलवारी ॥ ३ ॥
दासन दास कै मोहि जानिये जानत अहौ हमारी ।
जगजीवन दियो सीस चरन तर कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
साईं मैं अजान अज्ञाना ।
जानों नहीं बूझि नहि आवै भरमत फिरौं भुलाना ॥ १ ॥
हौ समरथ सिद्धि के दाता मोहिं सिखावहु ज्ञाना ।
करौं सो जानि जनाय देव जब धरौं चरन कै ध्याना ॥ २ ॥
दीन लीन सुभ सुमन सुमारग यह बर दौजै दाना ।
आवै दृष्टि दिस देखत रहौं परगट करौं बयाना ॥ ३ ॥
काहूँ२ रहौं सरन नहिं छूटै तुम तजि भजौं न आना ।
जगजीवन कर जोरि