जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 4, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंजगजीवन साहब की बानी
बिनती और प्रार्थना
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु मैं तो अहौं तिहारा ।
पूजा अर्चा नाहीं जानों, जानों नाम पियारा ॥ १ ॥
सो हित सदा होत नहिं अनहित, बास किहे संसारा ।
कहत हौं दीन लीन रहों तुम तें, तुम ब्रत राखनहारा ॥ २ ॥
अंतर ध्यान गगन है मगना, निरखौं रूप तिहारा ।
पुहुप गूँधि कै माला लैके, सो पहिराओं हारा ॥ ३ ॥
पान चून औ खैर सुपारी, गरी जायफर डारा ।
कपुर लाइची मेरिया¹ वा में, पूजा यही हमारा ॥ ४ ॥
कटहर कोआ मेवा लायों, सोऊ पवावों² प्यारा ।
कनक नीर कर ते मुख धोओं, तकि के चरन पखारा ॥ ५ ॥
सो चरनामृत नित्त पियो है, सुभ भा जन्म हमारा ।
जगजीवन को दिहे रहहु यह, दाता होहु हमारा ॥ ६ ॥
॥ शब्द २ ॥
प्रभु गति जानि नाहीं जाइ ।
अहै केतिक बुद्धि केहि महँ, कहै को गति गाइ ॥ १ ॥
सेस सम्भू थके ब्रह्मा, बिस्नु तारी लाइ ।
है अपार अगाध गति प्रभु, कहुँ नाहीं पाइ ॥ २ ॥
भान गन ससि तीनि चौथौ, लिया छिनहिं बनाइ ।
जोति एकै कियौ बिस्तर, जहाँ तहाँ समाइ ॥ ३ ॥
सीस दैकै कहौं चरनन, कबहूँ नहिं बिसराइ ।
जगजीवन के सत्य गुरु तुम, चरन की सरनाइ ॥ ४ ॥
(१) मिलाया। खिलाऊँ।