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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

बिनती और प्रार्थना। ३
नाम का बल दियो जेहि कहँ, राखि निर्भय गाउँ ।
काल को डर नहीं उहवाँ, भला पायो दाउँ ॥ ३ ॥
चरन सीसहिं राखि निरखी, चाखि दरस अघाउँ ।
जगजीवन गुर करहु दाया, दास तुम्हरा आउँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
अब मोहिं जानु आपन दास ॥ टेक ॥
सीस चरन में रहै लागो, और करौं न आस ।
दियो मोहिं उपदेस तुम्हीं, आइ तुम्हरे पास ॥ १ ॥
लियो ढिग बैठाइ कै जग, जानि सबै निरास ।
भला है अस्थान अम्मर, जोति है परगास ॥ २ ॥
करौं बिनती बहुत बिधि ते, दीजिये विस्वास ।
गति तुम्हारी कौन जानै, जगजीवन है दास ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
बिनती लेहु इतनी मानि ।
कहौं का कहि जात नाहीं, कवन अहौं केतानि ॥ १ ॥
कियो जबहीं दया तुम्हीं, लियो संतन छाँनि ।
रूप नीक लखाय दीन्ह्यौ, होत लाभ न हानि ॥ २ ॥
रहत लागे सदा आगे, सब्द कहत बखानि ।
लागि गा सो पागि गा, पुनि गगन चढ़ि ठहरानि ॥ ३ ॥
निरमल जोति निहारि निरखत, होत अनहद बानि१।
जगजिवन गुरु की भई दाया, लियो मन महँ छानि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
साँई को केतानि गुन गावै ।
सूझि बूझि तस आवै तेहि का, जेहि का जौन लखावै ॥ १ ॥
आपुहि भजत है आपु भजावत, आपु अलेख लखावै ।
जेहि कहँ अपनी सरनहिं राखै, सोई भगत कहावै ॥ २ ॥