जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished110 पृष्ठ
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बिनती और प्रार्थना । ६
आदि अन्त का आहौँ संगी,
त्यागि न अन्तै धावौं ।
जब तुम खुसी सुचित्त होत हौँ,
तब मैं सुरति मिलावौं ॥ ४ ॥
अपने अपने रँग रस माते,
केहि केहि राह लगावौं ।
जगजीवन गुरु चरनन परि कै,
नाहीं सीस उठावौं ॥ ५ ॥
॥ शब्द १६ ॥
साईं इतनो बिनती मोरि ।
माँगत हौँ कर जोरि कै तुम ते,
लागि रहै दृढ़ डोरि ॥ १ ॥
रह्योँ अजान नहीं मैं जान्यो,
बहुत हीन मति थोरि ।
जब ते कृपा करि आपन जान्यो,
तब ते सकौँ का तोरि ॥ २ ॥
अब उसवास१ न एकौ मानौँ,
चाखि नाम रस घोरि ।
सदा भरोसा आस तुम्हारी,
भर्म फंद ते तोरि ॥ ३ ॥
चरन ते सीस टरै नहिं टारे,
दीजै हमहि न खोरि ।
जगजिवन दास तुम्हार कहावै,
सतसंगति गहि पोढ़ि ॥ ४ ॥
(१) संसय ।
३