जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३ जगजीवन साहब की बानी
टारत नहीं चरन ते कबहुँ, नहि कबहुँ बिसरावै ।
सूरति खैंचि ऐंचि जब राखत, जोतिहिं जोत मिलावै ॥ ३ ॥
सतगुर कियो गुरुमुखी तेहिकाँ, दूसर नाहिं कहावै ।
जगजीवन ते भे संग बासी, अंत न कोऊ पावै ॥ ४ ॥
॥ 'शब्द ९' ॥
अब मैं करौं कौन बयान ।
चहौ पल में करहु सोई, होय सो परमान ॥ १ ॥
सहस जिभ्या सेस बरनत, कहत वेद पुरान ।
मोहिं जैसो करहु दाया, करहुँ तैसि बखान ॥ २ ॥
संतन काँह सिखाइ लीन्ह्यो, कहत सोई ज्ञान ।
लागि पागि कै रहे अन्तर, मस्त रहत निर्बान ॥ ३ ॥
रहे मिल तुम्ह नहीं न्यारे, कबहुँ नहिं बिलगान ।
जगजीवन धरि सीस चरनन, नहीं भावै आन ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अब मैं कहौं का कछु ज्ञान ।
बुद्धि हीनं सुद्धि हीनं, हौं अजान हैवान ॥ १ ॥
ब्रह्म सेस महेस सुमिरत, गहै अन्तर ध्यान ।
संत तंते रहत लागे, कहत ग्रंथ पुरान ॥ २ ॥
जोति एकै अहै निर्मल, करै सबै बयान ।
जहाँ जैसे भाव आहे, भयो तस परमान ॥ ३ ॥
करौ दाया जानि आपन, नहीं जानहुँ आन ।
जगजीवन दास सत्य समरथ, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
साँई मैं नहीं कछु जाना ॥ टेक ॥
बाल बुद्धि कछु नाहिं जान्यो,
रह्यो सदा हैवाना ।