जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished110 पृष्ठ
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जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द २० ॥
अब मोर मनुवां समुझि डेरात ।
वहि दिन का मोहिं संसा ब्यापत,
कछु गति जानि न जात ॥ १ ॥
काम न आइहि कोउ काहू के,
नारि बंधु पितु मात ।
धोखा देखि सबै कोउ भूला,
थिर नाहीं सब जात ॥ २ ॥
जन्म पाइ जो जानै नाहीं,
कौनि कहौं कुसलात ।
जगजीवन साईं तुम तारहु,
तुमहिं हाथ सब बात ॥ ३ ॥
॥ शब्द २१ ॥
अब सुनि लीजै इतनी हमारी ।
लागी रहै प्रीति निसि बासर,
दास को अपने नाहिं बिसारी ॥ १ ॥
जो मैं चहौं कहि कहँ लौ सुनावों,
औगुन कर्म बहुत अधिकारी ।
सरन चरन की राखि आपनी,
यहु कछु मन में नाहिं बिचारो ॥ २ ॥
काया यहि कर्महिं की आहै,
आपु ते नाहीं जात सँवारो ।
भौसागर हित जानि बूड़ जग,
जेहिं जान्यो तेहिं लियो उबारी ॥ ३ ॥