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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

२६ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ५३ ॥
साँईं यह बिनती सुनु मोरी ॥ टेक ॥
जन्म पाइ कछु जान्यों नाहीं, कछु बसि नाहीं मोरी ।
बाद बिबाद निंदा कुठिलाई, यह सब मोहिं माँखोरी ॥ १ ॥
औगुन अपने कहँ लौं भाखों, गनिन सिराय१ बहु को री ।
महा मोह भव जाल में बंधो, दाया करि कै छोरी ॥ २ ॥
माय सुतहिं दुख देत न कबहुँ, नहिं कुदृष्टि करि हेरी ।
जगजीवन काँ आपन जानहु, प्रीति न कबहुँ तोरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
[L11: मेरी हाथ तुम्हारे डोरी ॥ टेक ॥
है केतनि मति बुद्धि हीन है।
नहिं कछु अहै बूझ मति मोरी ॥ १ ॥
मन कठोर आभाव भाव नांहं ।
करौं कपट अमि भटकौं चोरी ॥ २ ॥
निसु बासर छिन छिन बिसरत है।
नहिं निरखि जात छबि तोरी ॥ ३ ॥
राखहु पास बिस्वास देहु बर, बिनय कहौं कर जोरी ।
जगजीवन चित चरनन दीन्हे, रहै सीस कर जोरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
साँईं नावों तोहिं काँ माथ ।
सत्त गुरु समरथ साँईं, जनहिं करहु सनाथ ॥ १ ॥
सत्त संगं रंग मोहिं मन, जुग बंध अंतर सोय ।
निरखि देखहुँ नैनते छबि, रही सुरति समाय ॥ २ ॥
जलं थलं औ पवन पानी, ब्यापितं है सोय ।
ब्रह्म बिस्नु महेस सेसं, एक दूज न कोय ॥ ३ ॥
(१) पार पावै ।

बिनती और प्रार्थना । २७
जक्त संगति रहैं न्यारे, दास ते जग माहिं ।
कमल मधुकर प्रीति संपुट१ , बिलग होवैं नाहिं ॥ ४ ॥
रहि निरासं नाम आसं, चित्त चरन समाय ।
जगजीवन बिस्वास मन, सो सुरति दरस कराय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
प्रभु जी बसि हमार कछु नाहीं ।
जो तुम चहत करत हौ सोई, ब्यापि रह्यो सब माहीं ॥ १ ॥
कहूँ कबि ज्ञानी ज्ञान कथत हौ, कहूँ पंडित बेद कहानी ।
कहूँ कुमति कहूँ सुमति बिराजत, केहु गति नाहीं जानी ॥ २ ॥
कहूँ चोर कहूँ साह कहावत, कहूँ अदत्त कहूँ दानी ।
कहूँ हरि लेत देत पल छिन माँ, आहै अकथ कहानी ॥ ३ ॥
कहूँ दैत्त कहूँ अहौ देवता, कहूँ बिबाद रचि ठानी ।
कहूँ रुच्छा कहूँ बद्ध करत हौ, केहू करत प्रधानी ॥ ४ ॥
माया प्रबल नचावत नाचत, निर्मल जोत निर्बानी ।
जगजीवन के सतगुरु साहब, चरन सुरति लिपटानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साहब तुम केते अधम उधारी ।
अजब रीझ तुम्हारि आहै, करि को सकै बिचारी ॥ १ ॥
पतित अनंत गनै को कहँ लौं, लीन्ह्यो छिन महँ तारी ।
मैं कह कहौं बरनि नहि आवै, बेद पुरान पुकारी ॥ २ ॥
जेहि काँ आपन हित कर जान्यो, दीन्ह्यो सुख अधिकारी ।
जब जब संकट पर्यो भक्त कहँ, लीन्ह्यो ताहि उबारी ॥ ३ ॥
(१) भँवरा को कँवल से ऐसी प्रीति है कि जब वह उस पर बैठा कोई
सुध बुध नहीं रहती यहाँ तक कि साँझ को जब कँवल बटुर कर संपुट हो जाता है
तो भँवरा उसी के भीतर बंद हो जाता है।

५८ जगजीवन साहब की वानी
जिन केहु गरब कीन भक्तन ते, तिन का गरब निवारी।
निकटहि बसत अहहु अंतर महँ, रहत जोत नहिं न्यारी ॥ ४ ॥
कहौं कर जोरि लेहु सुन मोरी, हमरे टेक तुम्हारी।
जगजीवन गुरु चरन तुम्हारे, कबहुँ न रहौं बिसारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
सांईं मोहि भरोस तुम्हारा।
मोरे बस नहिं अहै एकौ, तुमहिं करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौं बिचारा।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥ २ ॥
बहुतक भवसागर महँ बूड़त तेहि उबारि कै तारा।
बहुतन का जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥ ३ ॥
अब तौ चरन कि सरनहि आयों, गह्यों मैं पच्छ तुम्हारा।
जगजीवन कें साँईं समरथ, मोहिं बल अहै तुम्हारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
साँईं चहहु करहु सो होई।
जस चाहो तस नाम नचावो,
काह करै जग कोई ॥ १ ॥
पैदा करत निपैद करत हौ,
दै हरि लेत हौ सोई।
केहु धन माया बिदित देत हो,
फिर छिन डारत खोई ॥ २ ॥
केहु ह्वै दीन लीन सुमति ते,
अंतर ध्यान चरन रह टोई।
कोई मरै बहै अपंथ महँ,
भे अनाथ नर लोई ॥ ३ ॥

बिनती और प्रार्थना २६
अब बिस्वास आस है तुम्हरी,
तकौँ चरित कहि जात न कोई ।
जगजीवन का आपन जानहु,
सूरति राखौ छबिहिं समोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६० ॥
काह कहौं कहि आवत नाहीं,
मन तन तुम पर वारी ॥ टेक ॥
देखत अहौं दूसरो नाहीं, एकै जोति तुम्हारी ।
केहु भरमाय देत माया महँ, केहु करत हितकारी ॥ १ ॥
देखत आहौं खेलत सब महँ, को करि सकै बिचारी ।
करता हरता तुमहीं आहौ, अजब बनी फुलवारी ॥ २ ॥
दासन दासा मोहिं जानिये, जानत अहौ हमारी ।
जगजीवन दास सोस दियो चरनन, कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६१ ॥
आरति करौं सुनो मेरे प्यारे,
तुम गुनाह के मेटनहारे ॥ टेक ॥
बुद्धि हीन कछु गति नहिं जानौँ,
कृपा करहु तब नाम बखानौँ ॥ १ ॥
सेस महेस ब्रह्म धर ध्याना,
वेहू नहिं करि सकैं बखाना ॥ २ ॥
अंत न खोज अगाध को गावै,
जोहि जस वह तस ध्यान लगावै ॥ ३ ॥
जगजीवन के बस कछु नाहीं,
दाया चरन बसहि मन माहीं ॥ ४ ॥

३० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६२ ॥
प्रभु जी चहौ सो तुम करहु।
होय तुरत बिलंब नाहीं, जौन इच्छा धरहु ॥ १ ॥
चहहु सुमेरहि करहु किनका, कन सुमेरहि करहु।
अह्रै सबै बनाव तुम्हरा, गिरहिं अधरै१ धरहु ॥ २ ॥
तीन लोक बनाउ चौथा, चहहु बिन कर मलहु।
चहहु देहु बढ़ाइ दै कर, चहहु तौ फिर लरहु ॥ ३ ॥
चहहु पाल जियाइ करि कै, चहहु छिन महँ मरहु२।
जगजीवन के सत्त गुरु तुम, बास गगनहिं करहु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६३ ॥
साईं कठिन भक्ति है तेरी।
जिन काहू का सुमिरन आवा, जब किरपा भै तेरी ॥ १ ॥
नहीं कबूलौ परत बंदगी, केतो कहत हौं टेरी।
जिन काँ चहा लहा पैतिन हीं, मिट्यो भरमतेहि केरी ॥ २ ॥
माला मुद्रा तिलक दिहे हैं, करि उपाय बहुतेरी।
बैठि तपस्या करि जंगल माँ, है रह खाक कि ढेरी ॥ ३ ॥
मते मंत्र जेहि काँ कहि दीन्ह्यो, भै सुधि सत्य घनेरी।
जगजीवन सतगुरु मिलि उतरे, बहुरि करहिं नहिं फेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६४ ॥
साहब अजब कुदरत तोर।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मांत है मोर ॥ १ ॥
नचत सब कोउ काछि नाचा, भ्रमत फिर बिन डोर।
होत औगुन आप ते, सब देत साहब खोर३ ॥ २ ॥
कौल कै जग पठै दीन्ह्यो, तौन डार्यो तोर।
करत कपटं संत तेती, कहैं मोरी मोर ॥ ३ ॥
(१) आसमान। (२) मारो। (३) दोष।

चेतावनी ३१
ऐसि जग की रीति आहे, कहा कहिये टेर।
जगजीवन दास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
अरे मन देहु तजि मतवारि।
जे जे आये जगत महँ एहि, गये ते ते हारि ॥ १ ॥
नहीं सुमिरयौ नाम काँ, सब गयो काम बिगारि।
आपु काँ जिन बड़ा जान्यो, काल खायो मारि ॥ २ ॥
जानि आपुहिं छोट जग, रहि रहौ डोरी सँभारि।
बैठि कै चौगान निरखहु, रूप छबि अनुहारि१ ॥ ३ ॥
रहौ थिर सतसंग बासी, देहु सकल बिसारि।
जगजिवन सतगुरु कृपा करि कै, लेहैं सबै सँवारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
अरे मन समुझ करु पहिचान।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, काहे भर्म भुलान ॥ १ ॥
सुधि सँभार बिचार करिकै, बूझु पाछिल ज्ञान।
नाचु एहि दुइ चारि दिन का, अचल नहिं अस्थान ॥ २ ॥
लोक गढ़ एहु कोट काया, कठिन माया बान।
लाग सब कें बचे कोउ नहिं, हरयो सब का ध्यान ॥ ३ ॥
खबरदार बेखबर हो नहि, ओट नाम निर्बान।
जगजिवन सतगुरु राखि लेहैं, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
अरे नर का एहिं तकि बौराना।
मुख परि कौल कीन तेहिं त्यागी,
मन माना मन जाना ॥ १ ॥
(१) देखकर।

३२ जगजीवन साहब की बानी
चला जात कोउ अचल नहीं है,
अबहूँ समझ हैवाना।
धोखा है तकि भूल फूल नहिं,
होइहि सबै बिराना ॥ २ ॥
दिन दुइ चार की संगत सब की,
ह्वैहै अंत चलाना।
एत दिन रहि ईतर भ्रम भीतर,
बिना भजन पछिताना ॥ ३ ॥
लेहु बचाय नचाय नाम गहि,
कहौं नियाये ज्ञाना।
जगजीवन सब बृथा जानि कै,
धरहु चरन कर ध्याना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मनुवाँ ऐसी प्रीति लगाव।
ससि रूप जैसे चकोर निरखत, ऐसे चित्त मिलाव ॥ १ ॥
सूम के हित दाम ज्यों नित, नेम कौड़ी भाव।
अस लागि रहु रस पागि दुनियाँ, धंध सब बिसराव ॥ २ ॥
जुवा कामी रतै कामिनि, रैन दिन भरमाव।
अस रहै लागी नहीं भूलै, दूरि दुबिधा भाव ॥ ३ ॥
बहुत सुत हित बाँझनी के, बसत हिरदय ठावँ।
जगजिवन गुरु के चरन गहि रहु, भक्ति को अस नावँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मन तैं काहे का करत गुमान।
रहहु अधीन नाम वह सुमिरहु, तोहिं सिखावौं ज्ञान ॥ १ ॥
आये जे जे फूलि भूलि गे, फिर पाछे पछितान।
तौ कोई काम न आवा, हैगा जबै चलान ॥ २ ॥

चेतावनी ३३
जो आवा सो खाकहिं मिलिगा, उड़ि उड़ि खेह उड़ान ।
बृथा गयो आय जग जनमें, जो पै नाहीं जान ॥ ३ ॥
सुद्धि सँभारि सँवारि लेहु करि, अधरम करहु अड़ान ।
जगजीवन गुरु चरन गहे रहु, निरगुन तकु निरबान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
मैं तैं जग त्यागि मन चलिय सिर नाई ।
नाम जानि दीन हीन करिये दीनताई ॥ १ ॥
अहंकार गर्ब ते सब गये हैं बिलाई ।
रावन के सीस काटि राम की दोहाई ॥ २ ॥
जिन जिन गुमान कीन मारि गर्दही मिलाई ।
साधि साधि बाँधि प्रीति ताहि पर सहाई ॥ ३ ॥
परसहु गुरु सीस डारि दुनिया बिसराई ।
जगजीवन आस एक टेक रहिये लगाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
अरे मन देहु सबै बिसराय ।
दीन ह्वै लवलीन करि कै नाम रहु लौ लाय ॥ १ ॥
नाम अमृत जपहु रसना गुप्त अंतर पाय ।
मैल छूटि कै होय निर्मल सुद्धि पाछिल आय ॥ २ ॥
निर्गुनं निहारि निरखहु अनत नाहीं जाय ।
सीस दुइ कर परहु चरनन छूटि नाहीं जाय ॥ ३ ॥
सदा रहहु सचेत हेत लगाइ नहिं बिसराय ।
जगजीवन परकास मूरति सूरति सुरति मिलाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
हमारा देखि करै नहिं कोई ।
जो कोइ देखि हमारा करिहै, अंत फजीहति होई ॥ १ ॥
५

३४ जगजीवन साहब की बानी
जस हम चले चलै नहं कोई, करी सो करै न सोई।
मानै कहा कहे जो चलिहै, सिद्ध काज सब होई ॥ २ ॥
हम तो देह धरे जग नाचव, भेद न पाई कोई।
हम आहन सतसंगी बासी, सूरति रही समोई ॥ ३ ॥
कहा पुकारि विचारि लेहु सुनि, बृथा सब्द नहिं होई।
जगजीवन दास सहज मन सुमिरत, विरले यहि जग कोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
साधो समझौ मन ही माहीं।
अजब तमासे हैं दुनिया के, कछु कहिवे को नाहीं ॥ १ ॥
अस्तुति करहिं भाव करि बहु विधि, फिर फिर निंदै कराहीं।
मैं नहिं जानौ साँच कहतु हौं, परिहैं नर्कहिं माहीं ॥ २ ॥
मैं केतानि कौनि गिनती महँ, कहा जात कछु नाहीं।
साहब समरथ दाया करिहैं, नाम बसत जेहि माहीं ॥ ३ ॥
करै न निंदा मैं तैं त्यागै, दीन रहै मन माहीं।
जगजीवन तेहि पर किरपा भै, बैठे अम्मर छाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
दुनिया जानि बूझि बौरानी।
झूठै कहै कपट चतुराई, मनहिं न आनहि कानी ॥ १ ॥
नहिं डरपत है सत्त राम कहं, ऐसे हहिं अभिमानी।
है बिबाद निंदा कहि भाखहिं, तेही पाप ते आगे हानी ॥ २ ॥
जानत हैं मन मानत नाहीं, बड़े कहावत ज्ञानी।
नवहिं नहिं न साधु ते दीनता, बूड़ि मुए बिनु पानी ॥ ३ ॥
मैं तैं त्यागि अंतर माँ सुमिरै, परगट कहौं बखानी।
जगजीवन साधन ते नय चलु, इहै सुखव कै खानी ॥ ४ ॥

चेतावनी ३५
॥ शब्द ११ ॥
साधौ कहा जो मानै कोई ।
जो कोई कहा हमार मानिहै, भला ताहि कै कोई ॥ १ ॥
तजै गरूर पूर कहि बानी, मनहिं दीनता होई ।
तेहि काँ काज सिद्धि कै जानौ, सुखानंद तेहि होई ॥ २ ॥
अन्तर भजु केहुं दुक्ख देह नहि, मैं तैं डारै खोई ।
तेहि काँ राम सदा सुख दायक, सुद्धि ताहि कै लेई ॥ ३ ॥
परगट कहत अहौं गोहराये, जग ते न्यारे वोई ।
जगजीवन मूरति वह निरखा, सूरति रही समोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
दुनिया दुबिधा सबै परी ।
जाहि केर बनाव है सब भजत नाहिं घरी ॥ १ ॥
पाइ दौलत धाम सुख परि मोर मोर करो ।
मारि कै जमदूत खूंदा सबै सुधि बिसरी ॥ २ ॥
मातु पितु सुत साथ ना कोइ चलै लै पकरी ।
महा दुर्गति दूत कीन्ह्यौ सबै सुद्धि हरी ॥ ३ ॥
समुझि बूझि सँभार सूरति नाम चित्त धरो ।
जगजीवन ते पार उतरे नाम बल उबरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मनुवाँ का तकि तैं बौराना ।
झूठे जगत तमासा आहै, सुधि करु कृपानिधाना ॥ १ ॥
देखु विचारि कै फूलु भूलु नहिं, साई बहु निरबारी ।
छिन महँ एक बुन्द ते कीन्ह्यो, जगत सबै बिस्तारी ॥ २ ॥
देखि ऐसी जुक्ति रहिये, पलक नाहीं मारि ।
जैसे ससिहिं चकोर निरखत, दियो तन मन वारि ॥ ३ ॥

रहो दीन आधीन ह्वै कै, तमा¹ तजु कहि मारि ।
साईं का तब दरद आइहि, लैहै सबै सँवारि ॥ ४ ॥
होहु थिर कहूँ बहहु नाहीं, देहु दुबिधा डारि ।
जगजीवन गुरु के चरन परि कै, बिनय करै पुकारि ॥ ५ ॥
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम काहे रसनि बिसराई ।
तब तो रसनि रही रसनी महँ, अब काहे गफिलाई ॥ १ ॥
पाँच प्रचंड संग हैं तेरे, संग पचीस लेवाई ।
इन ते ऐंचि खैंचि नहि आवै, जहाँ तहाँ उठि धाई ॥ २ ॥
जुक्ति बाँधि करि लेहु एक करि, मैं तैं देहु छुड़ाई ।
चलि अस्थान जहाँ गुरु बैठे, रहहु बंदगी लाई ॥ ३ ॥
देखत रहहु दृष्टि नहिं टारहु, निर्मल जोति निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु के चरन गहि, रहिये थिर ठहराई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
बैठि उजियारी देखि ले भाई ॥ टेक ॥
सतगुरु साहब गहे रहहु तुम, त्यागि देहु दुचिताई ।
कर करु ध्यान दिया दाया करु, तेल तत्त भरि लाई ॥ १ ॥
बाती ब्रह्म ताहि में भैंवहु, पारसलाइ अंधियारी जाई ।
जगजीवन अस निरमल निरखहु, काहे काँ जीव डेराई ॥ २ ॥
॥ शब्द १६ ॥
रहु सत साँईं राखु निहार ॥ टेक ॥
दिल खाक करु सब खाक है,
चढ़ु पवन दसहूँ द्वार ।
तहँ सोधि रहु छबि निरखि नैनन,
ससि भानु छबि तेहिं वार ॥ १ ॥
(१) लालच ।

चेतावनी ३७
बैठि तहँ भ्रम ज्याग करिकै,
मूरति अलख अधार ।
जगजीवन यहि जुक्ति रहे तेहिं,
नाहिँ बाँकहि बार१ ॥ २ ॥
॥ शब्द १७ ॥
बौरे जामा पहिरि न जाना ।
को तैं आसि कहाँ ते आइसि,
समुझि न देखसि ज्ञाना ॥ १ ॥
घर वहु कौन जहाँ रह बासा,
तहाँ ते किहेउ पयाना ।
इहाँ तौ रहिहौ दुई चार दिन,
अंत कहाँ कहँ जाना ॥ २ ॥
पाप पुन्न की यह बजार है,
सौदा करु मन माना ।
होइहि कूच ऊँच नहिं जानसि,
भूलसि नाहिं हैवाना ॥ ३ ॥
जो जो आवा रहेउ न कोई,
सब का भयो चलाना ।
कोऊ फूटि टूटि गारत भा,
कोउ पहुँचा अस्थाना ॥ ४ ॥
अब कि सँवारि संभारि विचारि ले,
चूका सो पछिताना ।
जगजीवन दृढ डोरि लाइ रहु,
गहि मन चरन अड़ाना ॥ ५ ॥
( १ ) बाल टेढ़ा न हो ।

३८ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १८ ॥
मन महँ अन्तर सुमिरहु नाम।
कर्म अनेक कटहिं खिन महियाँ, सुफल होहिं दृढ़ काम ॥ १ ॥
तजु परपंच दुष्टई झूठी, झूठे हैं गृह ग्राम।
झूठे हैं सब नाम बिहूना, झूठे हैं धन धाम ॥ २ ॥
मात पिता भगनी भाई सुत, हित कुटुम्ब सुख बाम।
एहि आसा झूठे परि भूले, कोउ नहिं आयो काम ॥ ३ ॥
गहि रहु जुक्ति जगत ते न्यारे, सत संजोग बिस्राम।
जगजीवन निर्मल निर्भय ह्वै, दाग छूटि गा स्याम ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
मन महँ नाहिं बूझत कोय।
नहीं बसि कछु अहै आपन, करै करता होय ॥ १ ॥
कहत मैं तैं सूझि नाहीं, भर्म भूला सोय।
पड़े धारा मोह की बसि, डारि सर्बस खोय ॥ २ ॥
करै निंदा साध की, परि पाप बूड़े सोय।
अंत फजिहत होहिगे, पछिताय रहिहैं रोय ॥ ३ ॥
कहौं समुझि बिचारि कै, गहि नाम दृढ़ धरु टोय।
जगजीवन ह्वै रहहु निर्भय, चरन चित्त समोय ॥ ४ ॥
॥ शब्द २० ॥
मन तैं नाहिं इत उत धाव।
रटत रहु दुइ अच्छर अंतर, अपथ गैल न जाव ॥ १ ॥
उहाँ ते निर्बिन्दु आयो, पिंड बासा गावँ।
चेति सुद्धि सँभार ले तैं, चूकु नाहीं दाव ॥ २ ॥
समुझि फिरि पछिताइ है, परि जोनि बहु डरुपाव।
सत्त सरसौँ बाँटि उपटन, अंग अपने लाव ॥ ३ ॥

चेतावनी ३६
छूटि मैलं होय निर्मल, नूर नीर अन्हाव ।
जगजीवन निर्बान होवै, मिटै सब दुचिताव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २१ ॥
आपु ते डारत आपु नसाई ।
कहूँ बिबाद कीन्ह भक्तन ते, पांछे मन पछिताई ॥ १ ॥
काहू क दोष देइ नहिं कोई, धाइ जरै जो जाई ।
साधु बिबेकी दाया राखत, रामहिं दरद न आई ॥ २ ॥
गर्व-प्रहारी गुमान न राखै, करै जानि जो जाई ।
रावन औ हरनाकुस मारा, कछू बिलम्ब न लाई ॥ ३ ॥
नर केतान कवनि गिनती यहँ, कीट कि नहिं समताई ।
जो भक्तन ते बैर कियो है, अंत रसातल जाई ॥ ४ ॥
नहिं मानै तौ बूझति ले मन, कहत अहौं गोहराई ।
जगजीवन जे दीन लीन मन, तिन पर सदा सहाई ॥ ५ ॥
॥ शब्द २२ ॥
दुनियाँ पार परिपंच न जानी ।
नहिं नय चलहि गुमान लादे, बोलहिं बिष रस बानी ॥ १ ॥
सिद्ध साध कै निंदा करि, नहिं

४० जगजीवन साहब की बानी
थिर ह्वै कोउ रहै न पाइहि,
इहाँ बसेरा है दिन चारि ।
अइहैं दूत बाँधि लै जैहैं,
कोऊ नाहीं लगहि गोहारि ॥ २ ॥
दौलत धाम छूटि सब जाइहि,
छुटिहैं मातु पिता सुत नारि ।
जगजीवन गुरु-चरन गहे रहु,
गाढ़ परिहि तौ लेहैं उबारि ॥ ३ ॥
॥ शब्द २४ ॥
यहि जियने का करु न गुमान ॥ टेक ॥
उतहि जन्म पाय नर देही,
भजन बिना को नहि पछितान ।
दौलत धाम देखि कै भूल्यो,
बिसरि गयो वह पाछिल ज्ञान ॥ १ ॥
ना थिर रहे नहीं थिर रहिहै,
जाइहि अंत करि सबै पयान ।
सेन समेत रावन गे छिन महँ,
तिनहूँ के कछु रह्यो न निसान ॥ २ ॥
अन्त काल सब कछु चलि जाइहिं,
चलि जैहे ससि-गन अरु भान ।
जगजीवन सब कछु चलि जाइहि,
रहिहै इक सत नाम निदान ॥ ३ ॥
॥ शब्द २५ ॥
मनुवाँ समुझि करहु तेवान१ ।
जब तुम आयहु साई पठवा, अब कस भयो हैवान ॥ १ ॥
(१) फिकूर ।

चेतावनी ४१
तब कोउ संग साथ नहिं कोऊ, जग आयहु निरबान ।
अब हित लागि चाखि बिषया फल, फिरत अहहु बौरान ॥ २ ॥
भरमत फिरत नहीं थिर बैठत, बिसरि गयो अस्थान ।
नाहीं सुद्धि पाछिली आवत, ता तें भयो गुमान ॥ ३ ॥
हो सचेत अब जागि उलटि कै, निर्गुन करु पहिचान ।
जगजीवन जुग जुग हहु संगी, सतगुरु चरन प्रमान ॥ ४ ॥
॥ शब्द २६ ॥
सत्त नाम बिना मन कैसे पार तरिहौ ॥ टेक ॥
महा कठिन भर्म जार सूझै नहिं वार पार,
कहौ काह करिहौ ।
जुक्ति करहु चरन सरन लागि पागि,
नहिं तौ फाँसि परिहौ ॥ १ ॥
जे जे जग आये कोऊ नाहिं बाचे,
धीरज कौन धरिहौ ।
जोगी जती सिद्ध साध,
कोऊ नाहिं रहिहौ ॥ २ ॥
मिलि गये अमर भये ते जगत आस,
चित्त ते सब दहिहौ ।
जगजीवन दास गुरू पास,
जुगन जुग संग रहिहौ ॥ ३ ॥
॥ शब्द २७ ॥
अरे मन समुझि बूझहु ज्ञान ।
भजहु अंतर मगन है कै, होउ नहिं हैरान ॥ १ ॥
नाहिं वार औ पार है, करि जात नाहिं बयान ।
रच्यो रचना जानि कै, अस अहैं कृपानिधान ॥ २ ॥
६

४२ जगजीवन साहब की बानी

यहि भाँति ते सुख पाइहौ, नाहिं होइ है तुकसान ।
देखु नैन पसारि कै, कोउ नहिं अहै अजान ॥ ३ ॥
रहु दीन लीनं चरन ते, तजि देहु गर्ब गुमान ।
दिन चारि का जग है बसेरा, अन्त खाक समान ॥ ४ ॥
मरहु जीवत जियहु कछु दिन, मौत अहै निदान ।
जगजीवन ते अमर भे, गुरु चरन मन लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द २८ ॥
सुन सखि तुम ते कहौं समुझाई ॥ टेक ॥
करु न गुमान बहुरि पछितैहै,
काहे क परसि भुलाई ।
तब तैं आइसि कौन कौल करि,
अब कस सुधि बिसराई ॥ १ ॥
जागि लागि लय नात नाह ते,
देहु त्यागि दुचिताई ।
एहु घर दिन दुइ चार का नैहर,
परिहौ पर घर जाई ॥ २ ॥
हँसि कहि बात घात तुम जनिहहु,
रहि मन महँ पछिताई ।
जगजीवन सत पिउ अंतर मिलु,
काहे क जीव डेराई ॥ ३ ॥
॥ शब्द २९ ॥
अरे मन रहहु चरन ते लागि ।
इत उत सकल देहु तुम त्यागि ॥ १ ॥
दुइ कर जोरि कै लीजै माँगि ।
सोवत उठेव मोह ते जागि ॥ २ ॥

चेतावनी ४३
नैन निरखि छबि रहि रस पागि ।
कर्म भर्म सब जैहैं भागि ॥ ३ ॥
जगजीवन अस रहि अनुराग ।
जानु आपने तब हीं भाग ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
अरे मन जपहु मंत्र बिचारि ।
नाहिं कोइ थिर अहै यहि जग, जिवन है दिन चारि ॥ १ ॥
आवत है जग जात आहै, देखु नैन पसारि ।
जीव जंतु पसु पंछी तत्त, तैसेई नर नारि ॥ २ ॥
उठत बैठत रमत ठाढ़े, सोवत जगत सँभारि ।
डोरि ऐसी रहहु लाये, जीति लेहु सँवारि ॥ ३ ॥
त्यागि मैं तैं हठ बिबाद, रहौ नय चलि हारि ।
जगजीवन यहि जुक्ति तेनी१, चलहु आपुहि तारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
जो पै नाम रहै जप लाय ।
तेहि के भागत कुल्ल बलाय ॥ १ ॥
तेहि का बौरा कहै सब लोय ।
वहि का अंत न पावै कोय ॥ २ ॥
बिन बोले जौ रहा न जाय ।
तौ मन नहि अंतर ठहराय ॥ ३ ॥
रस रसना बिरले जन पाय ।
अपने अंतर रहै छिपाय ॥ ४ ॥
पंडित काहे क पढ़े पुरान ।
दुइ अच्छर आहै परमान ॥ ५ ॥
(१) से।

४४ जगजीवन साहब की बानी
राति दिवस लहि करै पुकार ।
सत मत मंत्र न करै बिचार ॥ ६ ॥
जेहि मत अंतर मिल्यो है धाई ।
कथा पुरान पढ़ब बिसराई ॥ ७ ॥
रटनि रसनि जेहि नाम की आई ।
तेहि का कछु जग नाहिं सधाई ॥ ८ ॥
नहीं तपस्या तिरथ अन्हाई ।
तेहि के दरस पाप कटि जाई ॥ ९ ॥
राम संत ते अंतर नाहीं ।
संत ते कबहूँ न्यारे नाहीं ॥१०॥
जगजीवन कहै प्रगट पुकारी ।
अपने मन महँ लेहु बिचारी ॥११॥
॥ शब्द ३२ ॥
साधो जब ते यह तन थाको ॥ टेक ॥
सुत जनमत सुख आस राखिकै, फिर नहिं कोउ काहू को ।
ऐंठि चलहि डरपहि नहिं मन ते, बचन सो मुँह से भाखो ॥ १ ॥
छूटी कानि लोक की मन ते, नारि नीच तन ताको ।
हँसै हँसावै जानि आप को, नहि बिबेक को आँको ॥ २ ॥
नीच प्रसंग रंग ते रातहि, भ्रमत फिरत है डाको१ ।
जो देख्यो सो कहत हौं परगट, नहीं गुप्त मैं राखो ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
हम समान नहिं कोऊ भाई ।
ऐसा जग की रीति देखिये, कहौं तो कहा न जाई ॥ १ ॥
ऐसी मति संसार की आहै, बातन की अधिकाई ।
सपनेहु रामहि जानहि नाहीं, झगरा नितहि बढ़ाई ॥ २ ॥
( १ ) कूदता हुआ ।

चेतावनी ४५
नित उठि करहि दुष्टई सबकै, जिय महँ नाहिं डेराई।
करि बहु पाप कमाई नितहीं, सो पड़े नरक महँ जाई ॥ ३ ॥
कहैं कि हम समान को आहै, थोरे धन इतराई।
गुन त्यागिन औगुन हित लागे, डारिन सबै नसाई ॥ ४ ॥
दौलत दाम धाम सुख भले, वह सुधि गै बिसराई।
परचौ काम जब अंत न पायो, सब तजि चल पछिताई ॥ ५ ॥
समुझि बूझि हक¹ राह चलहु रे, कहत अहौं गोहराई।
जगजीवन सब झूठे आहैं, नाम भजहु चित लाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
अरे मन लटकि अटकि रहु लागी।
तजु परपंच कुशब्वद कुसंगति, ह्वै सचेत उठि जागी ॥ १ ॥
दुनिया अंध धंध परि भूली, कठिन मोह कै आगी।
तेहि परि जरि गै खाक उड़ाइहि, जुक्तिते रँग रहुत्यागी ॥ २ ॥
नर नारी पसु पंछी जे जग, सब छेदा है साँगी।
बचा न कोई बचाये सोई, नाम सरन रहु भागी ॥ ३ ॥
दुइ कर जोरि यहै है अवसर, दरस लेहु बर माँगी।
जगजीवन दै सीस चरन तर, मस्त रहहु रस पागी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
दुनियाँ धंध लागि अरुझानी।
हित मित चित लोभाइ रहत है, पाछिल सुद्धि हेरानी ॥ १ ॥
आयो जहाँ से घर सो भूला, यहु घर रुधिर क पानी।
ताही उद्र साज कियो करता, ताही म आनि समानी ॥ २ ॥
डोरी पोढ़ि लगाइ निरगुन ते, अगिन म भै अस्थानी।
तेहि बल गलै जरै तन नाहीं, राहि दस मास सुखानी ॥ ३ ॥
(१) सत्य।