जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ३५
॥ शब्द ११ ॥
साधौ कहा जो मानै कोई ।
जो कोई कहा हमार मानिहै, भला ताहि कै कोई ॥ १ ॥
तजै गरूर पूर कहि बानी, मनहिं दीनता होई ।
तेहि काँ काज सिद्धि कै जानौ, सुखानंद तेहि होई ॥ २ ॥
अन्तर भजु केहुं दुक्ख देह नहि, मैं तैं डारै खोई ।
तेहि काँ राम सदा सुख दायक, सुद्धि ताहि कै लेई ॥ ३ ॥
परगट कहत अहौं गोहराये, जग ते न्यारे वोई ।
जगजीवन मूरति वह निरखा, सूरति रही समोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १२ ॥
दुनिया दुबिधा सबै परी ।
जाहि केर बनाव है सब भजत नाहिं घरी ॥ १ ॥
पाइ दौलत धाम सुख परि मोर मोर करो ।
मारि कै जमदूत खूंदा सबै सुधि बिसरी ॥ २ ॥
मातु पितु सुत साथ ना कोइ चलै लै पकरी ।
महा दुर्गति दूत कीन्ह्यौ सबै सुद्धि हरी ॥ ३ ॥
समुझि बूझि सँभार सूरति नाम चित्त धरो ।
जगजीवन ते पार उतरे नाम बल उबरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द १३ ॥
मनुवाँ का तकि तैं बौराना ।
झूठे जगत तमासा आहै, सुधि करु कृपानिधाना ॥ १ ॥
देखु विचारि कै फूलु भूलु नहिं, साई बहु निरबारी ।
छिन महँ एक बुन्द ते कीन्ह्यो, जगत सबै बिस्तारी ॥ २ ॥
देखि ऐसी जुक्ति रहिये, पलक नाहीं मारि ।
जैसे ससिहिं चकोर निरखत, दियो तन मन वारि ॥ ३ ॥