जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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चला जात कोउ अचल नहीं है,
अबहूँ समझ हैवाना।
धोखा है तकि भूल फूल नहिं,
होइहि सबै बिराना ॥ २ ॥
दिन दुइ चार की संगत सब की,
ह्वैहै अंत चलाना।
एत दिन रहि ईतर भ्रम भीतर,
बिना भजन पछिताना ॥ ३ ॥
लेहु बचाय नचाय नाम गहि,
कहौं नियाये ज्ञाना।
जगजीवन सब बृथा जानि कै,
धरहु चरन कर ध्याना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मनुवाँ ऐसी प्रीति लगाव।
ससि रूप जैसे चकोर निरखत, ऐसे चित्त मिलाव ॥ १ ॥
सूम के हित दाम ज्यों नित, नेम कौड़ी भाव।
अस लागि रहु रस पागि दुनियाँ, धंध सब बिसराव ॥ २ ॥
जुवा कामी रतै कामिनि, रैन दिन भरमाव।
अस रहै लागी नहीं भूलै, दूरि दुबिधा भाव ॥ ३ ॥
बहुत सुत हित बाँझनी के, बसत हिरदय ठावँ।
जगजिवन गुरु के चरन गहि रहु, भक्ति को अस नावँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मन तैं काहे का करत गुमान।
रहहु अधीन नाम वह सुमिरहु, तोहिं सिखावौं ज्ञान ॥ १ ॥
आये जे जे फूलि भूलि गे, फिर पाछे पछितान।
तौ कोई काम न आवा, हैगा जबै चलान ॥ २ ॥