जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५८ जगजीवन साहब की वानी
जिन केहु गरब कीन भक्तन ते, तिन का गरब निवारी।
निकटहि बसत अहहु अंतर महँ, रहत जोत नहिं न्यारी ॥ ४ ॥
कहौं कर जोरि लेहु सुन मोरी, हमरे टेक तुम्हारी।
जगजीवन गुरु चरन तुम्हारे, कबहुँ न रहौं बिसारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
सांईं मोहि भरोस तुम्हारा।
मोरे बस नहिं अहै एकौ, तुमहिं करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौं बिचारा।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥ २ ॥
बहुतक भवसागर महँ बूड़त तेहि उबारि कै तारा।
बहुतन का जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥ ३ ॥
अब तौ चरन कि सरनहि आयों, गह्यों मैं पच्छ तुम्हारा।
जगजीवन कें साँईं समरथ, मोहिं बल अहै तुम्हारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
साँईं चहहु करहु सो होई।
जस चाहो तस नाम नचावो,
काह करै जग कोई ॥ १ ॥
पैदा करत निपैद करत हौ,
दै हरि लेत हौ सोई।
केहु धन माया बिदित देत हो,
फिर छिन डारत खोई ॥ २ ॥
केहु ह्वै दीन लीन सुमति ते,
अंतर ध्यान चरन रह टोई।
कोई मरै बहै अपंथ महँ,
भे अनाथ नर लोई ॥ ३ ॥