जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ३१
ऐसि जग की रीति आहे, कहा कहिये टेर।
जगजीवन दास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
अरे मन देहु तजि मतवारि।
जे जे आये जगत महँ एहि, गये ते ते हारि ॥ १ ॥
नहीं सुमिरयौ नाम काँ, सब गयो काम बिगारि।
आपु काँ जिन बड़ा जान्यो, काल खायो मारि ॥ २ ॥
जानि आपुहिं छोट जग, रहि रहौ डोरी सँभारि।
बैठि कै चौगान निरखहु, रूप छबि अनुहारि१ ॥ ३ ॥
रहौ थिर सतसंग बासी, देहु सकल बिसारि।
जगजिवन सतगुरु कृपा करि कै, लेहैं सबै सँवारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
अरे मन समुझ करु पहिचान।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, काहे भर्म भुलान ॥ १ ॥
सुधि सँभार बिचार करिकै, बूझु पाछिल ज्ञान।
नाचु एहि दुइ चारि दिन का, अचल नहिं अस्थान ॥ २ ॥
लोक गढ़ एहु कोट काया, कठिन माया बान।
लाग सब कें बचे कोउ नहिं, हरयो सब का ध्यान ॥ ३ ॥
खबरदार बेखबर हो नहि, ओट नाम निर्बान।
जगजिवन सतगुरु राखि लेहैं, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
अरे नर का एहिं तकि बौराना।
मुख परि कौल कीन तेहिं त्यागी,
मन माना मन जाना ॥ १ ॥
(१) देखकर।