जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
DevanagariHindipublished110 पृष्ठ
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चेतावनी ३७
बैठि तहँ भ्रम ज्याग करिकै,
मूरति अलख अधार ।
जगजीवन यहि जुक्ति रहे तेहिं,
नाहिँ बाँकहि बार१ ॥ २ ॥
॥ शब्द १७ ॥
बौरे जामा पहिरि न जाना ।
को तैं आसि कहाँ ते आइसि,
समुझि न देखसि ज्ञाना ॥ १ ॥
घर वहु कौन जहाँ रह बासा,
तहाँ ते किहेउ पयाना ।
इहाँ तौ रहिहौ दुई चार दिन,
अंत कहाँ कहँ जाना ॥ २ ॥
पाप पुन्न की यह बजार है,
सौदा करु मन माना ।
होइहि कूच ऊँच नहिं जानसि,
भूलसि नाहिं हैवाना ॥ ३ ॥
जो जो आवा रहेउ न कोई,
सब का भयो चलाना ।
कोऊ फूटि टूटि गारत भा,
कोउ पहुँचा अस्थाना ॥ ४ ॥
अब कि सँवारि संभारि विचारि ले,
चूका सो पछिताना ।
जगजीवन दृढ डोरि लाइ रहु,
गहि मन चरन अड़ाना ॥ ५ ॥
( १ ) बाल टेढ़ा न हो ।