जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द १८ ॥
मन महँ अन्तर सुमिरहु नाम।
कर्म अनेक कटहिं खिन महियाँ, सुफल होहिं दृढ़ काम ॥ १ ॥
तजु परपंच दुष्टई झूठी, झूठे हैं गृह ग्राम।
झूठे हैं सब नाम बिहूना, झूठे हैं धन धाम ॥ २ ॥
मात पिता भगनी भाई सुत, हित कुटुम्ब सुख बाम।
एहि आसा झूठे परि भूले, कोउ नहिं आयो काम ॥ ३ ॥
गहि रहु जुक्ति जगत ते न्यारे, सत संजोग बिस्राम।
जगजीवन निर्मल निर्भय ह्वै, दाग छूटि गा स्याम ॥ ४ ॥
॥ शब्द १९ ॥
मन महँ नाहिं बूझत कोय।
नहीं बसि कछु अहै आपन, करै करता होय ॥ १ ॥
कहत मैं तैं सूझि नाहीं, भर्म भूला सोय।
पड़े धारा मोह की बसि, डारि सर्बस खोय ॥ २ ॥
करै निंदा साध की, परि पाप बूड़े सोय।
अंत फजिहत होहिगे, पछिताय रहिहैं रोय ॥ ३ ॥
कहौं समुझि बिचारि कै, गहि नाम दृढ़ धरु टोय।
जगजीवन ह्वै रहहु निर्भय, चरन चित्त समोय ॥ ४ ॥
॥ शब्द २० ॥
मन तैं नाहिं इत उत धाव।
रटत रहु दुइ अच्छर अंतर, अपथ गैल न जाव ॥ १ ॥
उहाँ ते निर्बिन्दु आयो, पिंड बासा गावँ।
चेति सुद्धि सँभार ले तैं, चूकु नाहीं दाव ॥ २ ॥
समुझि फिरि पछिताइ है, परि जोनि बहु डरुपाव।
सत्त सरसौँ बाँटि उपटन, अंग अपने लाव ॥ ३ ॥