जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द ५३ ॥
साँईं यह बिनती सुनु मोरी ॥ टेक ॥
जन्म पाइ कछु जान्यों नाहीं, कछु बसि नाहीं मोरी ।
बाद बिबाद निंदा कुठिलाई, यह सब मोहिं माँखोरी ॥ १ ॥
औगुन अपने कहँ लौं भाखों, गनिन सिराय१ बहु को री ।
महा मोह भव जाल में बंधो, दाया करि कै छोरी ॥ २ ॥
माय सुतहिं दुख देत न कबहुँ, नहिं कुदृष्टि करि हेरी ।
जगजीवन काँ आपन जानहु, प्रीति न कबहुँ तोरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
[L11: मेरी हाथ तुम्हारे डोरी ॥ टेक ॥
है केतनि मति बुद्धि हीन है।
नहिं कछु अहै बूझ मति मोरी ॥ १ ॥
मन कठोर आभाव भाव नांहं ।
करौं कपट अमि भटकौं चोरी ॥ २ ॥
निसु बासर छिन छिन बिसरत है।
नहिं निरखि जात छबि तोरी ॥ ३ ॥
राखहु पास बिस्वास देहु बर, बिनय कहौं कर जोरी ।
जगजीवन चित चरनन दीन्हे, रहै सीस कर जोरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
साँईं नावों तोहिं काँ माथ ।
सत्त गुरु समरथ साँईं, जनहिं करहु सनाथ ॥ १ ॥
सत्त संगं रंग मोहिं मन, जुग बंध अंतर सोय ।
निरखि देखहुँ नैनते छबि, रही सुरति समाय ॥ २ ॥
जलं थलं औ पवन पानी, ब्यापितं है सोय ।
ब्रह्म बिस्नु महेस सेसं, एक दूज न कोय ॥ ३ ॥
(१) पार पावै ।