जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 30, कुल 110 में से
संदर्भ में पढ़ेंबिनती और प्रार्थना । २७
जक्त संगति रहैं न्यारे, दास ते जग माहिं ।
कमल मधुकर प्रीति संपुट१ , बिलग होवैं नाहिं ॥ ४ ॥
रहि निरासं नाम आसं, चित्त चरन समाय ।
जगजीवन बिस्वास मन, सो सुरति दरस कराय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
प्रभु जी बसि हमार कछु नाहीं ।
जो तुम चहत करत हौ सोई, ब्यापि रह्यो सब माहीं ॥ १ ॥
कहूँ कबि ज्ञानी ज्ञान कथत हौ, कहूँ पंडित बेद कहानी ।
कहूँ कुमति कहूँ सुमति बिराजत, केहु गति नाहीं जानी ॥ २ ॥
कहूँ चोर कहूँ साह कहावत, कहूँ अदत्त कहूँ दानी ।
कहूँ हरि लेत देत पल छिन माँ, आहै अकथ कहानी ॥ ३ ॥
कहूँ दैत्त कहूँ अहौ देवता, कहूँ बिबाद रचि ठानी ।
कहूँ रुच्छा कहूँ बद्ध करत हौ, केहू करत प्रधानी ॥ ४ ॥
माया प्रबल नचावत नाचत, निर्मल जोत निर्बानी ।
जगजीवन के सतगुरु साहब, चरन सुरति लिपटानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साहब तुम केते अधम उधारी ।
अजब रीझ तुम्हारि आहै, करि को सकै बिचारी ॥ १ ॥
पतित अनंत गनै को कहँ लौं, लीन्ह्यो छिन महँ तारी ।
मैं कह कहौं बरनि नहि आवै, बेद पुरान पुकारी ॥ २ ॥
जेहि काँ आपन हित कर जान्यो, दीन्ह्यो सुख अधिकारी ।
जब जब संकट पर्यो भक्त कहँ, लीन्ह्यो ताहि उबारी ॥ ३ ॥
(१) भँवरा को कँवल से ऐसी प्रीति है कि जब वह उस पर बैठा कोई
सुध बुध नहीं रहती यहाँ तक कि साँझ को जब कँवल बटुर कर संपुट हो जाता है
तो भँवरा उसी के भीतर बंद हो जाता है।