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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 33

३० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६२ ॥
प्रभु जी चहौ सो तुम करहु।
होय तुरत बिलंब नाहीं, जौन इच्छा धरहु ॥ १ ॥
चहहु सुमेरहि करहु किनका, कन सुमेरहि करहु।
अह्रै सबै बनाव तुम्हरा, गिरहिं अधरै१ धरहु ॥ २ ॥
तीन लोक बनाउ चौथा, चहहु बिन कर मलहु।
चहहु देहु बढ़ाइ दै कर, चहहु तौ फिर लरहु ॥ ३ ॥
चहहु पाल जियाइ करि कै, चहहु छिन महँ मरहु२।
जगजीवन के सत्त गुरु तुम, बास गगनहिं करहु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६३ ॥
साईं कठिन भक्ति है तेरी।
जिन काहू का सुमिरन आवा, जब किरपा भै तेरी ॥ १ ॥
नहीं कबूलौ परत बंदगी, केतो कहत हौं टेरी।
जिन काँ चहा लहा पैतिन हीं, मिट्यो भरमतेहि केरी ॥ २ ॥
माला मुद्रा तिलक दिहे हैं, करि उपाय बहुतेरी।
बैठि तपस्या करि जंगल माँ, है रह खाक कि ढेरी ॥ ३ ॥
मते मंत्र जेहि काँ कहि दीन्ह्यो, भै सुधि सत्य घनेरी।
जगजीवन सतगुरु मिलि उतरे, बहुरि करहिं नहिं फेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६४ ॥
साहब अजब कुदरत तोर।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मांत है मोर ॥ १ ॥
नचत सब कोउ काछि नाचा, भ्रमत फिर बिन डोर।
होत औगुन आप ते, सब देत साहब खोर३ ॥ २ ॥
कौल कै जग पठै दीन्ह्यो, तौन डार्यो तोर।
करत कपटं संत तेती, कहैं मोरी मोर ॥ ३ ॥
(१) आसमान। (२) मारो। (३) दोष।