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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 37

३४ जगजीवन साहब की बानी
जस हम चले चलै नहं कोई, करी सो करै न सोई।
मानै कहा कहे जो चलिहै, सिद्ध काज सब होई ॥ २ ॥
हम तो देह धरे जग नाचव, भेद न पाई कोई।
हम आहन सतसंगी बासी, सूरति रही समोई ॥ ३ ॥
कहा पुकारि विचारि लेहु सुनि, बृथा सब्द नहिं होई।
जगजीवन दास सहज मन सुमिरत, विरले यहि जग कोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ९ ॥
साधो समझौ मन ही माहीं।
अजब तमासे हैं दुनिया के, कछु कहिवे को नाहीं ॥ १ ॥
अस्तुति करहिं भाव करि बहु विधि, फिर फिर निंदै कराहीं।
मैं नहिं जानौ साँच कहतु हौं, परिहैं नर्कहिं माहीं ॥ २ ॥
मैं केतानि कौनि गिनती महँ, कहा जात कछु नाहीं।
साहब समरथ दाया करिहैं, नाम बसत जेहि माहीं ॥ ३ ॥
करै न निंदा मैं तैं त्यागै, दीन रहै मन माहीं।
जगजीवन तेहि पर किरपा भै, बैठे अम्मर छाहीं ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
दुनिया जानि बूझि बौरानी।
झूठै कहै कपट चतुराई, मनहिं न आनहि कानी ॥ १ ॥
नहिं डरपत है सत्त राम कहं, ऐसे हहिं अभिमानी।
है बिबाद निंदा कहि भाखहिं, तेही पाप ते आगे हानी ॥ २ ॥
जानत हैं मन मानत नाहीं, बड़े कहावत ज्ञानी।
नवहिं नहिं न साधु ते दीनता, बूड़ि मुए बिनु पानी ॥ ३ ॥
मैं तैं त्यागि अंतर माँ सुमिरै, परगट कहौं बखानी।
जगजीवन साधन ते नय चलु, इहै सुखव कै खानी ॥ ४ ॥