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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

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पृष्ठ 39

रहो दीन आधीन ह्वै कै, तमा¹ तजु कहि मारि ।
साईं का तब दरद आइहि, लैहै सबै सँवारि ॥ ४ ॥
होहु थिर कहूँ बहहु नाहीं, देहु दुबिधा डारि ।
जगजीवन गुरु के चरन परि कै, बिनय करै पुकारि ॥ ५ ॥
॥ शब्द १४ ॥
मन तुम काहे रसनि बिसराई ।
तब तो रसनि रही रसनी महँ, अब काहे गफिलाई ॥ १ ॥
पाँच प्रचंड संग हैं तेरे, संग पचीस लेवाई ।
इन ते ऐंचि खैंचि नहि आवै, जहाँ तहाँ उठि धाई ॥ २ ॥
जुक्ति बाँधि करि लेहु एक करि, मैं तैं देहु छुड़ाई ।
चलि अस्थान जहाँ गुरु बैठे, रहहु बंदगी लाई ॥ ३ ॥
देखत रहहु दृष्टि नहिं टारहु, निर्मल जोति निरथाई ।
जगजीवन सतगुरु के चरन गहि, रहिये थिर ठहराई ॥ ४ ॥
॥ शब्द १५ ॥
बैठि उजियारी देखि ले भाई ॥ टेक ॥
सतगुरु साहब गहे रहहु तुम, त्यागि देहु दुचिताई ।
कर करु ध्यान दिया दाया करु, तेल तत्त भरि लाई ॥ १ ॥
बाती ब्रह्म ताहि में भैंवहु, पारसलाइ अंधियारी जाई ।
जगजीवन अस निरमल निरखहु, काहे काँ जीव डेराई ॥ २ ॥
॥ शब्द १६ ॥
रहु सत साँईं राखु निहार ॥ टेक ॥
दिल खाक करु सब खाक है,
चढ़ु पवन दसहूँ द्वार ।
तहँ सोधि रहु छबि निरखि नैनन,
ससि भानु छबि तेहिं वार ॥ १ ॥
(१) लालच ।