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जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

जगजीवन साहेब की बानी
दुनिया अजब धंध मा लागी,
सुधि बुधि नाहिं सँभारी ।
आये फूटि टूटि गारत भै,
का सों कहौं पुकारी ॥ २ ॥
समुझै बूझै बूझै नाहीं,
शब्द कही कहि हारी ।
सो अँदेस होत मन मोरे,
का धौं करहि बिचारी ॥ ३ ॥
आये कहँ ते फिरि कहँ जैहैं,
कहँ ग्रह ग्राम सँवारी ।
भूले फिरहिं मोह मद माते,
इहँ हहिं दिन दुइ चारी ॥ ४ ॥
जेहिं अपनाइ कै चेत चितायौ,
तिन सत सुरति सँभारी ।
जगजीवन मूरति मा मिलि गे,
नैन सों निरखि निहारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द २७ ॥
सतगुरु समरथ साहब चरनन पर वारी ॥ टेक ॥
हौं अज्ञान बुद्धिहीन सुद्धि ना सँभारी ।
कर दोऊ तन सीस दीन्ह्यौ गोद हौं तुम्हारी ॥ १ ॥
राखिये अब सरन अपनी कर्म ना बिचारी ।
नेग१ जन्म भर्म के रे डारिये मिटा री ॥ २ ॥
हौं तुम्हार आदि अन्त देहु ना बिसारी ।
ऐसी भाँति दिनं राति चित्त ते न टारी ॥ ३ ॥
(१) अनेक।

बिनती और प्रार्थना । १५
बिनय करि कै कहत हौं सुनि लीजिये हमारी ।
जगजीवन का और ना पनाह है तुम्हारो ॥ ४ ॥
॥ शब्द २८ ॥
बालक बुद्धि हीन मति मोरी ।
भरमत फिरौं नाहिं दृढ़ डोरी ॥ १ ॥
सूरति राखौ चरनन मोरी ।
लागि रहै कबहुँ नहिं तोरी ॥ २ ॥
निरखत रहौं जाउँ बलिहारी ।
दास जानि कै नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
तुमहिं सिखाय पढ़ायो ज्ञाना ।
तब मैं धर्यौ चरन का ध्याना ॥ ४ ॥
साईं समरथ तुम हौ मोरे ।
बिनती करौं ठाढ़ कर जोरे ॥ ५ ॥
अब दयाल ह्वै दाया कीजै ।
अपने जन कहँ दरसन दीजै ॥ ६ ॥
नाम तुम्हार मोहिं है प्यारा ।
सोइ भजे घट भा उजियारा ॥ ७ ॥
जगजीवन चरनन दियो माथ ।
साहब समरथ करहु सनाथ ॥ ८ ॥
॥ शब्द २६ ॥
तेरा नाम सुमिरि ना जाय ।
नहीं बस कछु मोर आहै, करहुँ कौन उपाय ॥ १ ॥
जबहिं चाहत हितू करि कै, लेत चरनन लाय ।
बिसरि जब मन जात आहै, देत सब बिसराय ॥ २ ॥
अजब ख्याल अपार लीला, अंत काहु न पाय ।
जीव जंत पतंग जग महँ, काहु ना बिलगाय ॥ ३ ॥

जगजीवन साहब की बानी
करौं बिनती जोरि दुउ कर, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन गुरु चरन सरनं, ह्वै तुम्हार कहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३० ॥
मैं तौ अरज करौं दरबार ।
भौसागर तकि भरम होत मोहिं,
अब की उतारहु पार ॥ १ ॥
औगुन बहुंत नहीं गुन एकौ,
काम करत बिन कार ।
पग बिहीन कर नाहीं जिन के,
ताहि खवावत चार ॥ २ ॥
बुद्धि हीन सुधि हीन अहौं मैं,
का करि सकौं बिचार ।
अहौं भरोसे सदा तुम्हारे,
तुम प्रति पालनहार ॥ ३ ॥
सुनियत ग्रंथ पुरान कहत अस,
बहुतन करि निस्तार ।
छिनहिं निहाल किहेउ प्रभु बहुतन,
द्विज के दारिद मार ॥ ४ ॥
अब दाया करिये प्रभु इतनी,
आवै मोहिं इतबार ।
जगजीवन चरनन परि बिनवै,
मन ना बहै हमार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३१ ॥
हम तें चूक परत बहुतेरी ।
मैं तौ दास अहौं चरनन का, हम हूँ तन हरि हेरी ॥ १ ॥

बिनती और प्रार्थना । १७
बाल-ज्ञान प्रभु अहै हमारा, झूठ साँच बहुतेरी ।
सो औगुन गुन का कहौं तुम तें, भौसागर तें निबेरी ॥ २ ॥
भव तें भागि आयौं तुव सरनै, कहत अहौं अस टेरी ।
जगजीवन की बिनती सुनिये, राखौ पत जन केरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३२ ॥
अब तुम होहु दयाल तुम्हारी पैयाँ परौं ॥टेक॥
सूझत नहिं मैं भ्रमत फिरत हौं,
पर्यों मोह के जाल ॥ १ ॥
नाम तुम्हार सुमिरि नहिं आवै,
जग संगति जंजाल ॥ २ ॥
आवत जब सुधि वहै समय की,
ब्याकुल होहुँ बेहाल ॥ ३ ॥
हाथ पाँव मेरे बल नाहीं है,
तुमहिं करहु प्रतिपाल ॥ ४ ॥
जगजीवन कौ दरसन दीजै,
अब मोहिं करहु निहाल ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३३ ॥
बार बार कहि बिनय सुनावौं ।
तुम्हरी कृपा तें सुरति लगावौं ॥ १ ॥
अनत न जाउँ जाउँ बलिहारी ।
सूरति कबहुँ रहै न न्यारी ॥ २ ॥
जब तुम चहहु रहौं तब पासा ।
कृपा करहु तब बसि बिस्वासा ॥ ३ ॥
दास केर बस एकौ नाहीं ।
तुम जानौ जानै मन माहीं ॥ ४ ॥
३

प्रथम भाग: साखी संग्रह (सतनाम, गुरु व विचार अंग)

१८ जगजीवन साहब की बानी
जब तुम जन का देत जनाई।
तब मन भजत अहै लौ लाई ॥ ५ ॥
दूजा कौन है काहि बतावौं।
कृपा करहु तब ना बिसरावौं ॥ ६ ॥
जगजीवन कहै बिनय सुनाई।
सतगुरु चरन बिसरि नहिं जाई ॥ ७ ॥
॥ शब्द ३४ ॥
साईं को गति गावै तेरी।
जेहि जस ज्ञान बयान कीन्ह तस,
सूरत बास बसे री ॥ १ ॥
ब्रह्मा सनक सनंदन सक्ती,
संकर सहस फने री।
बिस्नु सत्य रस चाखि मस्त है,
गावत ज्ञान घनेरी ॥ २ ॥
अंत अनंत ध्यान तेहि कीन्हे,
भे सतलोक बसेरी।
नाम अधार बिचारत ज्यों जग,
सन्मुख पलक न फेरी ॥ ३ ॥
जेहि हित जानि दया दुख काट्यौ,
भौजल धार निवेरी।
जगजीवन बिस्वास तुम्हारी,
टूटी भ्रम की बेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३५ ॥
चरन सरन अब आयौं, मैं नहिं जानी रे ॥ टेक ॥
मैं अजान अज्ञान है, कछु सुधि न सँभारी रे।
अंध रह्यौं सूझा नहीं, भूल्यौं संसारी रे ॥ १ ॥

बिनती और प्रार्थना । १६
पाँच भ्रमत जहँ तहँ, एक नहिं आयो रे ।
मोरि लागु नहि अहै, ता ते बिसरायो रे ॥ २ ॥
मिलि पचीस तेहि सँग, मोहिं बहुरि दिखायो रे ।
नाचि नाचि मोहि लियो, नाम नहिं आयो रे ॥ ३ ॥
मैं तौ मद माता फिरयों, चित ठहर न आना रे ।
भा गुमान रस पाय तेहि, सुधि बुधि हैवाना रे ॥ ४ ॥
कठिन जार भ्रम फाँसि है जग, बँधा संसारा रे ।
जेहि का तुम दाया करी, तोहि भयो उबारा रे ॥ ५ ॥
न्यारे तुम्हरे दास भे, लिप्त नहिं काहू माहीं रे ।
जगत कहै हम महँ अहैं, वै तुमहीं माहीं रे ॥
औगुन क्रम सब मेटिये, सुनु कृपा-निधाना रे ।
जगजीवन दास तुम्हार है, चरनन लिपटाना रे ।
॥ शब्द ३६ ॥
बिनती सुनिये कृपा-निधान ।
जानत अहौ जनावत तुमहीं, का करि सकौं बयान ॥ १ ॥
खात पियत जो डोलत बोलत, और न दूसर आन ।
ब्यापि रह्यो कहुँ चेत सरन करि, काहू भरम भुलान ॥ २ ॥
माया प्रबल अंत कछु नाहीं, सो मन समुझि डरान ।
अब तो सरन और ना जानौं, करिहौं सो परमान ॥ ३ ॥
सुद्धि बुद्धि कछु नाहीं मोरे, बालक जैसे अजान ।
मात सुतहि प्रतिपाल करत है, राखत हित करि प्रान ॥ ४ ॥
मैं केतानि कवनि गिनती महँ, गावत बेद पुरान ।
जगजीवन का आपन जानहु, चरन रहे लिपटान ॥ ५ ॥
॥ शब्द ३७ ॥
साँईं मैं तुम्हरी बलिहारी ।
कहौं काह कहि आवत मन तन तुम पर वारी ॥ १ ॥

२४ जगजीवन साहब की बानी
देखत अहौं खरो ताम्रोवर१, झलकै जोति तुम्हारी ।
केहु भरमाय देत माया महँ, केहु करत हितकारी ॥ २ ॥
देखत अहहूँ खेलत सब महँ को करि सकै विचारी ।
करता हरता तुम हीं आहौ अजब बनी फुलवारी ॥ ३ ॥
दासन दास कै मोहि जानिये जानत अहौ हमारी ।
जगजीवन दियो सीस चरन तर कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३८ ॥
साईं मैं अजान अज्ञाना ।
जानों नहीं बूझि नहि आवै भरमत फिरौं भुलाना ॥ १ ॥
हौ समरथ सिद्धि के दाता मोहिं सिखावहु ज्ञाना ।
करौं सो जानि जनाय देव जब धरौं चरन कै ध्याना ॥ २ ॥
दीन लीन सुभ सुमन सुमारग यह बर दौजै दाना ।
आवै दृष्टि दिस देखत रहौं परगट करौं बयाना ॥ ३ ॥
काहूँ२ रहौं सरन नहिं छूटै तुम तजि भजौं न आना ।
जगजीवन कर जोरि

बिनती और प्रार्थना। २९
तुम हीं करता तुम हीं हरता, सृष्टी तुमहिं बनाई।
जगजीवन के सत्तगुरु तुम, कौन कहै गोहराई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४० ॥
मेरे गुनाह माफ करिये अब साईं ॥ टेक ॥
जैसे मातु सुतहिं पालत छीर दै पियाई ।
लिये गोद रहै निसु दिन कबहुँ ना घिनाई ॥ १ ॥
रहै सुखित दुख नाहिं कर ते ले उठाई ।
कंठ लावै मुख चूमै हुलसि के हँसाई ॥ २ ॥
सुतहिं दुख दुखित मातु कछु ना सुहाई ।
इहै मोर बिनती जानु राखु ऐसी नाईं ॥ ३ ॥
पतित अनेक तारि लीन्हे गनत ना सिराई ।
मेटि औगुन छिनक माहिं लयो है अपनाई ॥ ४ ॥
सुने ते बिस्वास आवत बेद सब्द गाई ।
सूझि सत मत परा जबहीं दियो तबहिं लखाई ॥ ५ ॥
बुद्धि केतनि अहै मोहिं माँ करौं का कबिताई ।
जगजीवन का करहु आपन चरनन में लिपटाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
अब मैं करौं धौं कौन उपाई ।
मैं चाहौं निस बासर सुमिरौं, तुम डारत बिसराई ॥ १ ॥
तुम जब जानत तब मैं जानत, तब हीं मोहिं सुधि आई ।
सूझत बूझत जानि परै तब, रहत हौं सुरति लगाई ॥ २ ॥
है केतनि मति कहौं कहाँ लहि, तुम ते कहा छिपाई ।
जल थल घट घट सबके मन महँ, जहँ तहँ रह्यो समाई ॥ ३ ॥
ब्रह्मा सिव औ बिस्नु के राचित, वहि मन रह्यौ समाई ।
जगजीवन जब कृपा तुम्हारी, चरन रह्यो लिपटाई ॥ ४ ॥

जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ४२ ॥
नैना चरनन राखहुँ लाय ।
केतो रूप अनूपम आहै, देऊँ सब बिसराय ॥ १ ॥
राति दिना औ सोवत जागत, मोहीं इहै सोहाय ।
नहीं पल पल तजौं कबहूँ, अनत१ नाहीं जाय ॥ २ ॥
मोरि बस कछु नाहि है, जब देत तुमहिं बहाय ।
चहत खैंचि कै ऐंचि राखत, रहत हौं ठहराय ॥ ३ ॥
दियो नाथ सनाथ करि अब, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन के सच गुरु तुम, सदा रहहु सहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
भइउँ मैं सनाथ आइ कै ॥ टेक ॥
महा मोह सोवत रहिउँ ।
उठिउँ चौंकि जागि कै ॥ १ ॥
मोहिं उपदेस दियो मते महँ ।
चरन कमल रहिउँ लागि कै ॥ २ ॥
जग को देखि मोहिं डेरु लाग्यो ।
आइउँ सरन में भागि कै ॥ ३ ॥
जगजीवन छबि निरखि देखि रहि ।
मस्त भइउँ रस पागि कै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
साईं मोहिं और न भावै ।
जो मैं चहौं रहौं चरनन ढिग, जगत भेख भरमावै ॥ १
कानि न मानत जानत आहै, नहिं बिबेक मन आवै ।
जेहिं के मन माँ जैसी आवत, सो तैसे गुन गावै ॥ २
(१) और कहीं।

बिनती और प्रार्थना । २३
अद्भुत ख्याल तुम्हारे आहें, बिन कर नाच नचावै ।
कहुँ उपदेस अँदेस मिटावै, केहूँ दूरि बहावै ॥ ३ ॥
अब सरनाय चरन की राखौ, सूरति नहिं भरमावै ।
जगजीवन जो बूझै जैसे, तेहि का तैसे भावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
प्रभु जी बख्सहु चूकि हमारी ।
जो पुरबुज अपने कर्मन ते, डारयो सर्ब मिटा री ॥ १ ॥
राखहु पास सदा चरनन के, निकट ते नाहीं टारी ।
जानत रहहु सदाँ हित आपन, कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ २ ॥
पाँच पचीस बड़े पर पंची, यह डारत संसारी ।
येई पल छिन छिनहिं अभावत, नाहीं लागु हमारी ॥ ३ ॥
अब मन लागि पागि रह तुम ते, सूरति रहै न न्यारी ।
जगजीवन को भक्ति बर दीजै, जुग जुग आस तुम्हारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
अब मैं कहौं कहाँ लगि ज्ञान ।
सहस मुख सों सेस बरनत, मैं अहौं केतान ॥ १ ॥
बिस्नु सुमिरत सिवं सक्ती, ब्रह्म बेद बखान ।
सर्ब मई बिराज रही है, जोति वह निर्बान ॥ २ ॥
चहौ सो करि लेहु पल में, अहै सो न प्रमान ।
कृपा करि जेहिं लियो छिन में, जानि आपु समान ॥ ३ ॥
करौं बिनती बहुत बिधि ते, हौं अजान हैवान ।
जगजीवन गुरु अहै समरथ, चरन हौं लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४७ ॥
प्रभु तुम सों मन लागा मोरा ।
नेग१ जन्म के कर्म काटो, माँगौं दरसन तोरा ॥ १ ॥
(१) अनेक ।

२४ जगजीवन साहब की बानी
मोहिं ते तौ कछु कहि नहिं आवै, मैं पापी हौं चोरा ।
निसु दिन तुम कहँ सुमिरत राहौं, इतना मानु निहोरा ॥ २ ॥
यह अरदास१ मानि ले सांई, तनिक देखिये कोरा ।
जगजीवन काँ जानु आपना, तोरु प्रीत नहिं डोरा ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४८ ॥
मेरी बिनय सुनिये राम ।
भरमत हौं दिन रात छिन छिन, कैसे सुमिरौं नाम ॥ १ ॥
महा अहै अपार माया, मोह सुख परि काम ।
छूटि गे सत टूटि डोरी, लागि हित धन धाम ॥ २ ॥
मेटु सर्ब गुनाह मेरे, पाप कर्म हराम ।
जगजीवन काँ जानु आपन, चरन केर गुलाम ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
पर्यौं मैं जार२ कैसे जानौं रे ।
जो तुम कौल कीन तब हमसे, अब कैसे सुधिआनौ रे ॥ १ ॥
निस बासर मैं भ्रमत फिरत रहि, केहि विधि मन थिर आनौं रे ।
दे उपदेस अँदेस मिटावो, तौन ठान मैं ठानौं रे ॥ २ ॥
लागि रहै मोहिं टूटै नाहीं, माँगि माँगि रस सानौं रे ।
जगजीवन बिनती करि माँगै, चरन कमल अनुरागौं रे ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५० ॥
साँईं मेरे हम हैं दास तुम्हारे ।
तुम्हरी कृपा ते सुमिरौं निसु दिन, कबहुँ न रहौं बिसारे ॥ १ ॥
लागी रहै प्रीति चरनन ते, होउँ न कबहूँ न्यारे ।
नहिं बसि अहै मोर बपुरे३ को, रहिये आपु सँभारे ॥ २ ॥
बालक बुद्धि अजान जान नहिं, जननी केर दुलारे ।
खेलत सुभ औ असुभ न जानत, हितकरि गोद लिया रे ॥ ३ ॥
(१) अरजदाश्त, प्रार्थना । (२) जाल । (३) गरीब ।

बिनती और प्रार्थना । २५
अस्थान लाग पियत पय हित करि, नहीं कुदृष्टि निहारे ।
सुनिय कहौं कर जोरि मोरि यह, बिनय सों करौं पुकारे ॥ ४ ॥
छबि मूरति निरखत देखत रहौं, नाहीं और निहारे ।
जगजीवन काँ आपन जानहु, औगुन सर्ब मिटारे ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५१ ॥
साईं मैं नहिं आपु क जाना ।
को मैं आहुँ कहाँ ते आयौं, फिरत हौं कहाँ भुलाना ॥ १ ॥
काया कंचन लोक बनायो, तेहि का अंत न जाना ।
बूझौं कहँ अस्थान कौन है, सर्ब अंग ठहराना ॥ २ ॥
देखत हौं काहू नहिं न्यारा, समुझत आहौं ज्ञाना ।
कौन जुक्ति जग बंध निकरिये, कैसे है मस्ताना ॥ ३ ॥
मैं जानौं मन तुम हीं साहब, ता ते मन बिलगाना ।
तेहिका रूप अनूप अमूरति, गगन मँडल अस्थाना ॥ ४ ॥
तेहि ते मूरति फूटी तेहि माँ, गुरू अलख करि माना ।
चेला है कै करहुँ बंदगी, सीस करहुँ कुरबाना ॥ ५ ॥
तुम ते मैं संतुष्टा है हौं, अहहु मूर्ति निर्बाना ।
जगजीवन पर दाया कीन्हो, तब ते अब पहिचाना ॥ ६ ॥
॥ शब्द ५२ ॥
मोहिं का बार बार भटकायो ।
भूला फिरयौं अनेक जन्म लहि, अंत जानि नहिं पायो ॥ १ ॥
काया धरि धरि नाच्यौं बहु बिधि, आसा बँधि बिसरायो ।
जो सुधि रही सुख हरि मोरी, चेत नहीं कछु आयो ॥ २ ॥
आवत सुधि मोहिं कबहुँ कबहु, साँचु मैं नाहीं पायो ।
थिर नहिं बास भई नहिं काहूँ, अवत जात दुख पायो ॥ ३ ॥
करि करुना अघ करम मिटायो, अपनि सरन लै आयो ।
जगजीवन अब संसै नाहीं, चरनन सीस चढ़ायो ॥ ४ ॥
४

२६ जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ५३ ॥
साँईं यह बिनती सुनु मोरी ॥ टेक ॥
जन्म पाइ कछु जान्यों नाहीं, कछु बसि नाहीं मोरी ।
बाद बिबाद निंदा कुठिलाई, यह सब मोहिं माँखोरी ॥ १ ॥
औगुन अपने कहँ लौं भाखों, गनिन सिराय१ बहु को री ।
महा मोह भव जाल में बंधो, दाया करि कै छोरी ॥ २ ॥
माय सुतहिं दुख देत न कबहुँ, नहिं कुदृष्टि करि हेरी ।
जगजीवन काँ आपन जानहु, प्रीति न कबहुँ तोरी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५४ ॥
[L11: मेरी हाथ तुम्हारे डोरी ॥ टेक ॥
है केतनि मति बुद्धि हीन है।
नहिं कछु अहै बूझ मति मोरी ॥ १ ॥
मन कठोर आभाव भाव नांहं ।
करौं कपट अमि भटकौं चोरी ॥ २ ॥
निसु बासर छिन छिन बिसरत है।
नहिं निरखि जात छबि तोरी ॥ ३ ॥
राखहु पास बिस्वास देहु बर, बिनय कहौं कर जोरी ।
जगजीवन चित चरनन दीन्हे, रहै सीस कर जोरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५५ ॥
साँईं नावों तोहिं काँ माथ ।
सत्त गुरु समरथ साँईं, जनहिं करहु सनाथ ॥ १ ॥
सत्त संगं रंग मोहिं मन, जुग बंध अंतर सोय ।
निरखि देखहुँ नैनते छबि, रही सुरति समाय ॥ २ ॥
जलं थलं औ पवन पानी, ब्यापितं है सोय ।
ब्रह्म बिस्नु महेस सेसं, एक दूज न कोय ॥ ३ ॥
(१) पार पावै ।

बिनती और प्रार्थना । २७
जक्त संगति रहैं न्यारे, दास ते जग माहिं ।
कमल मधुकर प्रीति संपुट१ , बिलग होवैं नाहिं ॥ ४ ॥
रहि निरासं नाम आसं, चित्त चरन समाय ।
जगजीवन बिस्वास मन, सो सुरति दरस कराय ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
प्रभु जी बसि हमार कछु नाहीं ।
जो तुम चहत करत हौ सोई, ब्यापि रह्यो सब माहीं ॥ १ ॥
कहूँ कबि ज्ञानी ज्ञान कथत हौ, कहूँ पंडित बेद कहानी ।
कहूँ कुमति कहूँ सुमति बिराजत, केहु गति नाहीं जानी ॥ २ ॥
कहूँ चोर कहूँ साह कहावत, कहूँ अदत्त कहूँ दानी ।
कहूँ हरि लेत देत पल छिन माँ, आहै अकथ कहानी ॥ ३ ॥
कहूँ दैत्त कहूँ अहौ देवता, कहूँ बिबाद रचि ठानी ।
कहूँ रुच्छा कहूँ बद्ध करत हौ, केहू करत प्रधानी ॥ ४ ॥
माया प्रबल नचावत नाचत, निर्मल जोत निर्बानी ।
जगजीवन के सतगुरु साहब, चरन सुरति लिपटानी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५७ ॥
साहब तुम केते अधम उधारी ।
अजब रीझ तुम्हारि आहै, करि को सकै बिचारी ॥ १ ॥
पतित अनंत गनै को कहँ लौं, लीन्ह्यो छिन महँ तारी ।
मैं कह कहौं बरनि नहि आवै, बेद पुरान पुकारी ॥ २ ॥
जेहि काँ आपन हित कर जान्यो, दीन्ह्यो सुख अधिकारी ।
जब जब संकट पर्यो भक्त कहँ, लीन्ह्यो ताहि उबारी ॥ ३ ॥
(१) भँवरा को कँवल से ऐसी प्रीति है कि जब वह उस पर बैठा कोई
सुध बुध नहीं रहती यहाँ तक कि साँझ को जब कँवल बटुर कर संपुट हो जाता है
तो भँवरा उसी के भीतर बंद हो जाता है।

५८ जगजीवन साहब की वानी
जिन केहु गरब कीन भक्तन ते, तिन का गरब निवारी।
निकटहि बसत अहहु अंतर महँ, रहत जोत नहिं न्यारी ॥ ४ ॥
कहौं कर जोरि लेहु सुन मोरी, हमरे टेक तुम्हारी।
जगजीवन गुरु चरन तुम्हारे, कबहुँ न रहौं बिसारी ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५८ ॥
सांईं मोहि भरोस तुम्हारा।
मोरे बस नहिं अहै एकौ, तुमहिं करो निस्तारा ॥ १ ॥
मैं अज्ञान बुद्धि है नाहीं, का करि सकौं बिचारा।
जब तुम लेत पढ़ाय सिखावत, तब मैं प्रगट पुकारा ॥ २ ॥
बहुतक भवसागर महँ बूड़त तेहि उबारि कै तारा।
बहुतन का जब कष्ट भयो है, तिन कै कष्ट निवारा ॥ ३ ॥
अब तौ चरन कि सरनहि आयों, गह्यों मैं पच्छ तुम्हारा।
जगजीवन कें साँईं समरथ, मोहिं बल अहै तुम्हारा ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५६ ॥
साँईं चहहु करहु सो होई।
जस चाहो तस नाम नचावो,
काह करै जग कोई ॥ १ ॥
पैदा करत निपैद करत हौ,
दै हरि लेत हौ सोई।
केहु धन माया बिदित देत हो,
फिर छिन डारत खोई ॥ २ ॥
केहु ह्वै दीन लीन सुमति ते,
अंतर ध्यान चरन रह टोई।
कोई मरै बहै अपंथ महँ,
भे अनाथ नर लोई ॥ ३ ॥

बिनती और प्रार्थना २६
अब बिस्वास आस है तुम्हरी,
तकौँ चरित कहि जात न कोई ।
जगजीवन का आपन जानहु,
सूरति राखौ छबिहिं समोई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६० ॥
काह कहौं कहि आवत नाहीं,
मन तन तुम पर वारी ॥ टेक ॥
देखत अहौं दूसरो नाहीं, एकै जोति तुम्हारी ।
केहु भरमाय देत माया महँ, केहु करत हितकारी ॥ १ ॥
देखत आहौं खेलत सब महँ, को करि सकै बिचारी ।
करता हरता तुमहीं आहौ, अजब बनी फुलवारी ॥ २ ॥
दासन दासा मोहिं जानिये, जानत अहौ हमारी ।
जगजीवन दास सोस दियो चरनन, कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
॥ शब्द ६१ ॥
आरति करौं सुनो मेरे प्यारे,
तुम गुनाह के मेटनहारे ॥ टेक ॥
बुद्धि हीन कछु गति नहिं जानौँ,
कृपा करहु तब नाम बखानौँ ॥ १ ॥
सेस महेस ब्रह्म धर ध्याना,
वेहू नहिं करि सकैं बखाना ॥ २ ॥
अंत न खोज अगाध को गावै,
जोहि जस वह तस ध्यान लगावै ॥ ३ ॥
जगजीवन के बस कछु नाहीं,
दाया चरन बसहि मन माहीं ॥ ४ ॥

३० जगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ६२ ॥
प्रभु जी चहौ सो तुम करहु।
होय तुरत बिलंब नाहीं, जौन इच्छा धरहु ॥ १ ॥
चहहु सुमेरहि करहु किनका, कन सुमेरहि करहु।
अह्रै सबै बनाव तुम्हरा, गिरहिं अधरै१ धरहु ॥ २ ॥
तीन लोक बनाउ चौथा, चहहु बिन कर मलहु।
चहहु देहु बढ़ाइ दै कर, चहहु तौ फिर लरहु ॥ ३ ॥
चहहु पाल जियाइ करि कै, चहहु छिन महँ मरहु२।
जगजीवन के सत्त गुरु तुम, बास गगनहिं करहु ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६३ ॥
साईं कठिन भक्ति है तेरी।
जिन काहू का सुमिरन आवा, जब किरपा भै तेरी ॥ १ ॥
नहीं कबूलौ परत बंदगी, केतो कहत हौं टेरी।
जिन काँ चहा लहा पैतिन हीं, मिट्यो भरमतेहि केरी ॥ २ ॥
माला मुद्रा तिलक दिहे हैं, करि उपाय बहुतेरी।
बैठि तपस्या करि जंगल माँ, है रह खाक कि ढेरी ॥ ३ ॥
मते मंत्र जेहि काँ कहि दीन्ह्यो, भै सुधि सत्य घनेरी।
जगजीवन सतगुरु मिलि उतरे, बहुरि करहिं नहिं फेरी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६४ ॥
साहब अजब कुदरत तोर।
देखि गति कहि जात नाहीं, केतिक मांत है मोर ॥ १ ॥
नचत सब कोउ काछि नाचा, भ्रमत फिर बिन डोर।
होत औगुन आप ते, सब देत साहब खोर३ ॥ २ ॥
कौल कै जग पठै दीन्ह्यो, तौन डार्यो तोर।
करत कपटं संत तेती, कहैं मोरी मोर ॥ ३ ॥
(१) आसमान। (२) मारो। (३) दोष।

चेतावनी ३१
ऐसि जग की रीति आहे, कहा कहिये टेर।
जगजीवन दास चरन गुरू के, सुरत करिये पोढ़ ॥ ४ ॥
॥ चेतावनी ॥
॥ शब्द १ ॥
अरे मन देहु तजि मतवारि।
जे जे आये जगत महँ एहि, गये ते ते हारि ॥ १ ॥
नहीं सुमिरयौ नाम काँ, सब गयो काम बिगारि।
आपु काँ जिन बड़ा जान्यो, काल खायो मारि ॥ २ ॥
जानि आपुहिं छोट जग, रहि रहौ डोरी सँभारि।
बैठि कै चौगान निरखहु, रूप छबि अनुहारि१ ॥ ३ ॥
रहौ थिर सतसंग बासी, देहु सकल बिसारि।
जगजिवन सतगुरु कृपा करि कै, लेहैं सबै सँवारि ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
अरे मन समुझ करु पहिचान।
को तैं अहसि कहाँ ते आयसि, काहे भर्म भुलान ॥ १ ॥
सुधि सँभार बिचार करिकै, बूझु पाछिल ज्ञान।
नाचु एहि दुइ चारि दिन का, अचल नहिं अस्थान ॥ २ ॥
लोक गढ़ एहु कोट काया, कठिन माया बान।
लाग सब कें बचे कोउ नहिं, हरयो सब का ध्यान ॥ ३ ॥
खबरदार बेखबर हो नहि, ओट नाम निर्बान।
जगजिवन सतगुरु राखि लेहैं, चरन रहु लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
अरे नर का एहिं तकि बौराना।
मुख परि कौल कीन तेहिं त्यागी,
मन माना मन जाना ॥ १ ॥
(१) देखकर।

३२ जगजीवन साहब की बानी
चला जात कोउ अचल नहीं है,
अबहूँ समझ हैवाना।
धोखा है तकि भूल फूल नहिं,
होइहि सबै बिराना ॥ २ ॥
दिन दुइ चार की संगत सब की,
ह्वैहै अंत चलाना।
एत दिन रहि ईतर भ्रम भीतर,
बिना भजन पछिताना ॥ ३ ॥
लेहु बचाय नचाय नाम गहि,
कहौं नियाये ज्ञाना।
जगजीवन सब बृथा जानि कै,
धरहु चरन कर ध्याना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४ ॥
मनुवाँ ऐसी प्रीति लगाव।
ससि रूप जैसे चकोर निरखत, ऐसे चित्त मिलाव ॥ १ ॥
सूम के हित दाम ज्यों नित, नेम कौड़ी भाव।
अस लागि रहु रस पागि दुनियाँ, धंध सब बिसराव ॥ २ ॥
जुवा कामी रतै कामिनि, रैन दिन भरमाव।
अस रहै लागी नहीं भूलै, दूरि दुबिधा भाव ॥ ३ ॥
बहुत सुत हित बाँझनी के, बसत हिरदय ठावँ।
जगजिवन गुरु के चरन गहि रहु, भक्ति को अस नावँ ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
मन तैं काहे का करत गुमान।
रहहु अधीन नाम वह सुमिरहु, तोहिं सिखावौं ज्ञान ॥ १ ॥
आये जे जे फूलि भूलि गे, फिर पाछे पछितान।
तौ कोई काम न आवा, हैगा जबै चलान ॥ २ ॥

चेतावनी ३३
जो आवा सो खाकहिं मिलिगा, उड़ि उड़ि खेह उड़ान ।
बृथा गयो आय जग जनमें, जो पै नाहीं जान ॥ ३ ॥
सुद्धि सँभारि सँवारि लेहु करि, अधरम करहु अड़ान ।
जगजीवन गुरु चरन गहे रहु, निरगुन तकु निरबान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
मैं तैं जग त्यागि मन चलिय सिर नाई ।
नाम जानि दीन हीन करिये दीनताई ॥ १ ॥
अहंकार गर्ब ते सब गये हैं बिलाई ।
रावन के सीस काटि राम की दोहाई ॥ २ ॥
जिन जिन गुमान कीन मारि गर्दही मिलाई ।
साधि साधि बाँधि प्रीति ताहि पर सहाई ॥ ३ ॥
परसहु गुरु सीस डारि दुनिया बिसराई ।
जगजीवन आस एक टेक रहिये लगाई ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
अरे मन देहु सबै बिसराय ।
दीन ह्वै लवलीन करि कै नाम रहु लौ लाय ॥ १ ॥
नाम अमृत जपहु रसना गुप्त अंतर पाय ।
मैल छूटि कै होय निर्मल सुद्धि पाछिल आय ॥ २ ॥
निर्गुनं निहारि निरखहु अनत नाहीं जाय ।
सीस दुइ कर परहु चरनन छूटि नाहीं जाय ॥ ३ ॥
सदा रहहु सचेत हेत लगाइ नहिं बिसराय ।
जगजीवन परकास मूरति सूरति सुरति मिलाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
हमारा देखि करै नहिं कोई ।
जो कोइ देखि हमारा करिहै, अंत फजीहति होई ॥ १ ॥
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