जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजगजीवन साहब की बानी
॥ शब्द ४२ ॥
नैना चरनन राखहुँ लाय ।
केतो रूप अनूपम आहै, देऊँ सब बिसराय ॥ १ ॥
राति दिना औ सोवत जागत, मोहीं इहै सोहाय ।
नहीं पल पल तजौं कबहूँ, अनत१ नाहीं जाय ॥ २ ॥
मोरि बस कछु नाहि है, जब देत तुमहिं बहाय ।
चहत खैंचि कै ऐंचि राखत, रहत हौं ठहराय ॥ ३ ॥
दियो नाथ सनाथ करि अब, कहत अहौं सुनाय ।
जगजीवन के सच गुरु तुम, सदा रहहु सहाय ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४३ ॥
भइउँ मैं सनाथ आइ कै ॥ टेक ॥
महा मोह सोवत रहिउँ ।
उठिउँ चौंकि जागि कै ॥ १ ॥
मोहिं उपदेस दियो मते महँ ।
चरन कमल रहिउँ लागि कै ॥ २ ॥
जग को देखि मोहिं डेरु लाग्यो ।
आइउँ सरन में भागि कै ॥ ३ ॥
जगजीवन छबि निरखि देखि रहि ।
मस्त भइउँ रस पागि कै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४४ ॥
साईं मोहिं और न भावै ।
जो मैं चहौं रहौं चरनन ढिग, जगत भेख भरमावै ॥ १
कानि न मानत जानत आहै, नहिं बिबेक मन आवै ।
जेहिं के मन माँ जैसी आवत, सो तैसे गुन गावै ॥ २
(१) और कहीं।