जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती और प्रार्थना । २५
अस्थान लाग पियत पय हित करि, नहीं कुदृष्टि निहारे ।
सुनिय कहौं कर जोरि मोरि यह, बिनय सों करौं पुकारे ॥ ४ ॥
छबि मूरति निरखत देखत रहौं, नाहीं और निहारे ।
जगजीवन काँ आपन जानहु, औगुन सर्ब मिटारे ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५१ ॥
साईं मैं नहिं आपु क जाना ।
को मैं आहुँ कहाँ ते आयौं, फिरत हौं कहाँ भुलाना ॥ १ ॥
काया कंचन लोक बनायो, तेहि का अंत न जाना ।
बूझौं कहँ अस्थान कौन है, सर्ब अंग ठहराना ॥ २ ॥
देखत हौं काहू नहिं न्यारा, समुझत आहौं ज्ञाना ।
कौन जुक्ति जग बंध निकरिये, कैसे है मस्ताना ॥ ३ ॥
मैं जानौं मन तुम हीं साहब, ता ते मन बिलगाना ।
तेहिका रूप अनूप अमूरति, गगन मँडल अस्थाना ॥ ४ ॥
तेहि ते मूरति फूटी तेहि माँ, गुरू अलख करि माना ।
चेला है कै करहुँ बंदगी, सीस करहुँ कुरबाना ॥ ५ ॥
तुम ते मैं संतुष्टा है हौं, अहहु मूर्ति निर्बाना ।
जगजीवन पर दाया कीन्हो, तब ते अब पहिचाना ॥ ६ ॥
॥ शब्द ५२ ॥
मोहिं का बार बार भटकायो ।
भूला फिरयौं अनेक जन्म लहि, अंत जानि नहिं पायो ॥ १ ॥
काया धरि धरि नाच्यौं बहु बिधि, आसा बँधि बिसरायो ।
जो सुधि रही सुख हरि मोरी, चेत नहीं कछु आयो ॥ २ ॥
आवत सुधि मोहिं कबहुँ कबहु, साँचु मैं नाहीं पायो ।
थिर नहिं बास भई नहिं काहूँ, अवत जात दुख पायो ॥ ३ ॥
करि करुना अघ करम मिटायो, अपनि सरन लै आयो ।
जगजीवन अब संसै नाहीं, चरनन सीस चढ़ायो ॥ ४ ॥
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