जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४ जगजीवन साहब की बानी
मोहिं ते तौ कछु कहि नहिं आवै, मैं पापी हौं चोरा ।
निसु दिन तुम कहँ सुमिरत राहौं, इतना मानु निहोरा ॥ २ ॥
यह अरदास१ मानि ले सांई, तनिक देखिये कोरा ।
जगजीवन काँ जानु आपना, तोरु प्रीत नहिं डोरा ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४८ ॥
मेरी बिनय सुनिये राम ।
भरमत हौं दिन रात छिन छिन, कैसे सुमिरौं नाम ॥ १ ॥
महा अहै अपार माया, मोह सुख परि काम ।
छूटि गे सत टूटि डोरी, लागि हित धन धाम ॥ २ ॥
मेटु सर्ब गुनाह मेरे, पाप कर्म हराम ।
जगजीवन काँ जानु आपन, चरन केर गुलाम ॥ ३ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
पर्यौं मैं जार२ कैसे जानौं रे ।
जो तुम कौल कीन तब हमसे, अब कैसे सुधिआनौ रे ॥ १ ॥
निस बासर मैं भ्रमत फिरत रहि, केहि विधि मन थिर आनौं रे ।
दे उपदेस अँदेस मिटावो, तौन ठान मैं ठानौं रे ॥ २ ॥
लागि रहै मोहिं टूटै नाहीं, माँगि माँगि रस सानौं रे ।
जगजीवन बिनती करि माँगै, चरन कमल अनुरागौं रे ॥ ३ ॥
॥ शब्द ५० ॥
साँईं मेरे हम हैं दास तुम्हारे ।
तुम्हरी कृपा ते सुमिरौं निसु दिन, कबहुँ न रहौं बिसारे ॥ १ ॥
लागी रहै प्रीति चरनन ते, होउँ न कबहूँ न्यारे ।
नहिं बसि अहै मोर बपुरे३ को, रहिये आपु सँभारे ॥ २ ॥
बालक बुद्धि अजान जान नहिं, जननी केर दुलारे ।
खेलत सुभ औ असुभ न जानत, हितकरि गोद लिया रे ॥ ३ ॥
(१) अरजदाश्त, प्रार्थना । (२) जाल । (३) गरीब ।