जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)
Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad
सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिनती और प्रार्थना । २३
अद्भुत ख्याल तुम्हारे आहें, बिन कर नाच नचावै ।
कहुँ उपदेस अँदेस मिटावै, केहूँ दूरि बहावै ॥ ३ ॥
अब सरनाय चरन की राखौ, सूरति नहिं भरमावै ।
जगजीवन जो बूझै जैसे, तेहि का तैसे भावै ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४५ ॥
प्रभु जी बख्सहु चूकि हमारी ।
जो पुरबुज अपने कर्मन ते, डारयो सर्ब मिटा री ॥ १ ॥
राखहु पास सदा चरनन के, निकट ते नाहीं टारी ।
जानत रहहु सदाँ हित आपन, कबहुँ नाहिं बिसारी ॥ २ ॥
पाँच पचीस बड़े पर पंची, यह डारत संसारी ।
येई पल छिन छिनहिं अभावत, नाहीं लागु हमारी ॥ ३ ॥
अब मन लागि पागि रह तुम ते, सूरति रहै न न्यारी ।
जगजीवन को भक्ति बर दीजै, जुग जुग आस तुम्हारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४६ ॥
अब मैं कहौं कहाँ लगि ज्ञान ।
सहस मुख सों सेस बरनत, मैं अहौं केतान ॥ १ ॥
बिस्नु सुमिरत सिवं सक्ती, ब्रह्म बेद बखान ।
सर्ब मई बिराज रही है, जोति वह निर्बान ॥ २ ॥
चहौ सो करि लेहु पल में, अहै सो न प्रमान ।
कृपा करि जेहिं लियो छिन में, जानि आपु समान ॥ ३ ॥
करौं बिनती बहुत बिधि ते, हौं अजान हैवान ।
जगजीवन गुरु अहै समरथ, चरन हौं लिपटान ॥ ४ ॥
॥ शब्द ४७ ॥
प्रभु तुम सों मन लागा मोरा ।
नेग१ जन्म के कर्म काटो, माँगौं दरसन तोरा ॥ १ ॥
(१) अनेक ।