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सर्वकोश
जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

जगजीवन साहिब की बानी: प्रथम भाग (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सतनामी सम्प्रदाय)

Jagjivan Sahib Ki Bani: Belvedere Press Allahabad

सन्त जगजीवन साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished110 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 110 में से

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पृष्ठ 24

बिनती और प्रार्थना। २९
तुम हीं करता तुम हीं हरता, सृष्टी तुमहिं बनाई।
जगजीवन के सत्तगुरु तुम, कौन कहै गोहराई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४० ॥
मेरे गुनाह माफ करिये अब साईं ॥ टेक ॥
जैसे मातु सुतहिं पालत छीर दै पियाई ।
लिये गोद रहै निसु दिन कबहुँ ना घिनाई ॥ १ ॥
रहै सुखित दुख नाहिं कर ते ले उठाई ।
कंठ लावै मुख चूमै हुलसि के हँसाई ॥ २ ॥
सुतहिं दुख दुखित मातु कछु ना सुहाई ।
इहै मोर बिनती जानु राखु ऐसी नाईं ॥ ३ ॥
पतित अनेक तारि लीन्हे गनत ना सिराई ।
मेटि औगुन छिनक माहिं लयो है अपनाई ॥ ४ ॥
सुने ते बिस्वास आवत बेद सब्द गाई ।
सूझि सत मत परा जबहीं दियो तबहिं लखाई ॥ ५ ॥
बुद्धि केतनि अहै मोहिं माँ करौं का कबिताई ।
जगजीवन का करहु आपन चरनन में लिपटाई ॥ ६ ॥
॥ शब्द ४१ ॥
अब मैं करौं धौं कौन उपाई ।
मैं चाहौं निस बासर सुमिरौं, तुम डारत बिसराई ॥ १ ॥
तुम जब जानत तब मैं जानत, तब हीं मोहिं सुधि आई ।
सूझत बूझत जानि परै तब, रहत हौं सुरति लगाई ॥ २ ॥
है केतनि मति कहौं कहाँ लहि, तुम ते कहा छिपाई ।
जल थल घट घट सबके मन महँ, जहँ तहँ रह्यो समाई ॥ ३ ॥
ब्रह्मा सिव औ बिस्नु के राचित, वहि मन रह्यौ समाई ।
जगजीवन जब कृपा तुम्हारी, चरन रह्यो लिपटाई ॥ ४ ॥