हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
वरमें अपने रूपकी परछाईं देखो, तो देखोगे कि तुम वही आर्य-
सिंह हो जो संसारके अन्य बड़े बड़े राष्ट्रोंके नामशेष होनेपर
भी, अबतक जीते हो ; जो युगयुगान्तरोंसे विद्या, वैभव और
पराक्रमके प्रकाशसे संसारको शिक्षा, दीक्षा और दंड देते चले
आ रहे हो ! हां, इन अगणित वर्षोंके इतिहासमें इधर हजार-बारह
सौ वर्ष तुम्हारे कभी दासत्वमें और कभी उस दासत्वको नष्ट
करनेके प्रयत्नमें बीते हैं ! पर यह हजार बारह सौ वर्षका इति-
हास ही तुम्हारा इतिहास नहीं है, इसके पूर्व न जाने कितने
हजार वर्ष तुम्हारे पराक्रमके प्रखर प्रकाशमें बीते हैं। और इन
हजार-बारह सौ वर्षका इतिहास भी तुम्हारे दासत्वका इतिहास
नहीं, बल्कि दासत्वको नष्ट करनेके लिये संग्रामपर संग्राम करते
रहनेका ही इतिहास है। यह इसी कालका इतिहास है कि अरबके
रेगिस्तानसे रेतीके कणोंके समान असंख्य अरब आक्रमणका-
रियोंने ईरान, शाम, फिलस्तीन आदि देशोंमें रहनेवाली जातियों-
को निःशेष कर मुसलमान बना डाला और उसी विजयोन्मादकी
अप्रतिहत लहरें छठी शताब्दीके अन्तमें सिन्धुके तट-प्रदेशपर
आकर गिरने लगीं, तब तुम्हीं तो थे जिन्होंने वहीं उन्हें रोक
रखा। और किस देश या जातिने यह नमूना संसारको दिखाया
कि पृथ्वीको पादाक्रांत करते चले आते आक्रमणकारियोंसे इस
तरह जूझे कि दस-बीस वर्ष नहीं, सौ-पचास भी नहीं, चार सौ
वर्षतक उन्हें सिन्धमें अटके रह जाना पड़ा, आक्रमणकारी आगे
नहीं बढ़ सके ? संसारमें और कोई शक्ति जिसे नहीं रोक सकी,
॥६
उसे रोका तो हिन्दू-जातिने ही रोका और उस जमानेमें रोका
जब दैव प्रतिकूल था। सिन्धपर आक्रमण करनेके पश्चात् चार
सौ वर्षतक मुसलमान सिन्ध और मुल्तानके आगे न बढ़ सके।
इस समय मुसलमानोंने सारे यूरोपको पादाक्रांत करके स्पेन
देशमें अपना झंडा फहराया था, पर हिन्दुस्थानमें उन्हें सीमापर
ही ४ सदियोंतक लड़ना पड़ा। अन्तको दसवीं शताब्दीके
अन्तमें और ११ वीं शताब्दीके आरंभमें महमूद गजनी पश्चिमो-
त्तर सीमा लांघकर हिन्दुस्थानमें घुसा। उसने बारह बार आक्रमण
किया। बार बार हारनेपर भी हिन्दूओने उसके सामने सिर नहीं
झुकाया, उससे युद्ध ही बराबर करते रहे, और महमूद गजनी-
को सोमनाथकी लूटके बाद हिन्दू राजा भीमदेवकी सेनाके
भयसे सिन्धके रेगिस्तानके रास्ते हिन्दुस्थानसे भाग जाना पड़ा-
सम्मुख युद्धमें उसका साहस नहीं था जो सामना करता। मह-
मूद गजनीके साथ ये जो युद्ध हुए, इनमें समग्र हिन्दू-राजा संघ-
टित होकर नहीं लड़े, यद्यपि उनमें हिन्दुत्वका भाव था। वे संघ-
टनकी आवश्यकता अनुभव नहीं करते थे। एक-एक राजा इतना
बलशाली था कि संगठनका किसीको ध्यान नहीं रहा और
इसका परिणाम यह हुआ कि सिन्धपर आक्रमण होनेके ४ सौ
वर्ष पश्चात् आधा पंजाब प्रान्त मुसलमानोंके अधिकारमें चला
गया। पर अधिकारमें चला गया इसका यह मतलब नहीं है कि
मुसलमानोंका स्वामित्व स्वीकार करके हिन्दू हाथपर हाथ धरके
बैठ गये। इसके बाद ११६१ में महम्मद गोरीने भारतपर चढ़ाई
की। हिंदूपति पृथ्वीराजके तेजस्वी खड्गने समरमें यवन-सेनाका
संहार करके महम्मदको कैद किया। इसने पृथ्वीराजसे अपने
प्राणोंकी भिक्षा माँगी। हिंदूपतिने उसे छोड़ दिया। पर इस कृतघ्न-
ने अपना वचन भंग करके सन् ११६३ में फिर हिन्दुस्थानपर
अकस्मात् आक्रमण कर दिल्लीका सिंहासन भ्रष्ट किया! इस तरह
लगातार ६ सौ वर्ष लड़नेके पश्चात् हिन्दुस्थान परतंत्र हुआ!
संसारमें कौनसी ऐसी जाति है जो अपनी स्वतंत्रताके लिये पीढ़ी
दर पीढ़ी लगातार ६ शताब्दियोंतक रणचण्डीको अपने पुत्रोंकी
भेंट चढ़ा सकी हो? पर यह संग्राम यहीं समाप्त नहीं हुआ।
पृथ्वीराजकी हारके पश्चात् १०० वर्षतक मुसलमान दक्षिण-
भारतमें प्रवेश नहीं कर सके। १२६३ में अलाउद्दीनने दक्षिणपर
चढ़ाई की। असावधान और असंघटित यादव-राज्य यवन-कूट-
नीतिको न समझकर पहली ही चढ़ाईमें छिन्न-भिन्न हो गया।
यादवराज रामदेवरावने दिल्लीके बादशाहका प्रभुत्व स्वीकार
किया। पर हिंदुओंको यह स्वीकार नहीं था। रामदेवरावके
पुत्र शंकरदेवने हिन्दू-स्वातंत्र्यका झंडा फहराया और यवनसेनासे
लड़कर समरांगणमें अपना शरीर छोड़ा। यादवराजकी राजधानी
देवगिरि मुसलमानोंके अधिकारमें गयी और महाराष्ट्र पराधीन
हुआ! पर फिर रामदेवरावके जामाता हरपालदेवने महाराष्ट्रको
स्वाधीन किया। मुसलमानोंसे युद्ध जारी ही था। सन् १३१८ में
हरपालदेव मारा गया। देवगिरिका राज्य नष्ट हुआ, पर हिन्दू-
वीर्य नष्ट नहीं हुआ। दक्षिण-भारतके राज्यभ्रष्ट हिन्दू राजा और
॥-
हिन्दू वीर दक्षिणमें तुंगभद्रा नदीके तटपर, उस प्राचीन परम
पुनीत पंपासरोवरके वारिप्रपातरम्य पर्वत-प्रदेशमें हिन्दू-शक्तिके
संघटनके लिये एकत्र होने लगे। सन् १३३५ में “योगेश्वर” श्री
विद्यारण्य स्वामीके उपदेश और “धनुर्द्धर” श्री हरिहर और
बुक्कके पराक्रमसे उस विजयानगर-राज्यकी स्थापना हुई जिसने
हिन्दू-विजयजयंती, हिन्दू-संस्कृति और हिन्दू-धर्मकी रक्षा
की। समग्र हिन्दू-जातिकी ओरसे इस विजयानगर राज्यने
आक्रमण-कारियोंके साथ संग्राम जारी रखा। ढाई सौ वर्ष-
तक इसने अपना काम किया। अन्तको दक्षिणके सब
मुसलमान राज्योंने मिलकर इससे घोर संग्राम किया और
सन् १५६४ में तालिकोटके उस समर-यज्ञमें विजयानगर
राज्यकी आहुति पड़ी—विजयानगर राज्य नष्ट हुआ; पर
मानो उसके चिता-भस्मसे ही, इस संग्रामके ५० वर्ष बाद ही
महाराष्ट्रने हिन्दू-शक्तिकी विजयवैजयन्ती अपने हाथमें ली और
समर्थ रामदास और छत्रपति शिवाजी उत्पन्न हुए जिन्होंने महा-
राष्ट्रको स्वाधीन करके वही संग्राम जारी रखा जो सन् ७१२ में
सिन्धु नदीके तटपर आरंभ हुआ था और एक शताब्दीके अन्दर
ही हिन्दुस्थानमें एक बार फिर “हिन्दूपदपादशाही” स्थापित कर
दी। इसीके सिलसिलेमें आगे सिखोंका उत्थान हुआ और
दक्षिण ओरसे मराठोंने, उत्तरमें सिखोंने और बीचमें राजपूतोंने
हिन्दू राज्य स्थापित करनेका जो अलग अलग उद्योग किया
वह हिन्दुत्वकी रक्षाका ही उद्योग था।
अंगरेजी राज्य स्थापित होनेके पूर्व हिन्दुस्थानमें हिन्दुओंका
राज्य था जिसकी स्वाधीनताके लिये वे ११ सौ वर्षतक लड़ते रहे
और लड़कर उन्होंने जिसे फिर पाया। दैवसंयोगसे वह स्वा-
धीनताश्री फिर हरण हुई। पर ११ सौ वर्षका यह इतिहास
संग्रामका इतिहास हैं और इसका फल प्रत्यक्ष है। हिन्दू-जाति
जीवित है। उसकी संस्कृति जीवित है। उसका इतिहास जीवित
है। उसका शुद्ध रक्त वही रक्त है जिसने विक्रम और शालि-
वाहन, दाहिर और अनंगपाल, भीमदेव और पृथ्वीराज, जयपाल
और प्रताप, विद्यारण्य और बुक्कराय, रामदास और शिवाजी, गुरु
गोविन्द और छत्रसाल, बाजीराव और माधवराव, नाना और
महादजीको उत्पन्न किया जिन्होंने हिन्दुत्वकी रक्षाका व्रत अखंड
रखा और जिनके नाम और काम आज भी हिन्दू-जातिको अपने
पवित्र व्रत और अपनी अप्रतिम शक्तिका अमोघ उपदेश देकर उसे
अपने सिंहरूपकी पहचान करा देते हैं। वही हिन्दू-जाति है।
कौन कहता है, हिन्दू कायर हैं? कौन कहता है, हिन्दू-जाति
एक नहीं है? कौन कहता है, हिन्दू दुर्बल हैं? हिन्दुओंका
हिन्दुत्व प्रत्येक हिन्दूकी शक्तिका अखंड स्रोत है। यहां नैराश्य
और भय कहाँ? यहां तो वह अजेय शक्ति है जिसने उस शक्तिको
भी जीत लिया जिसके सामने अरबसे स्पेनतक उस समय कोई
ठहर न सका। यह वह अजेय दैवी शक्ति है जिसे कोई जीत नहीं
सकता; क्योंकि यह शक्ति संसारके संहारके लिये नहीं, संसारके
उद्धारके लिये है—संसारको मनुष्योंके, मनुष्योंकी तरह, रहने-
योग्य बनानेके लिये है।
हिन्दुओंके “हिन्दुत्व” की रक्षाका यह पिछला इतिहास हिन्दुओं-
के खड्गका इतिहास है, पर यह खड्ग निरपराधियोंके रक्तसे रंगा हुआ
नहीं है। उसने मनुष्यत्वकी हत्या नहीं की है, सांप्रदायिक अहं-
कारके शैतानकी उपासना नहीं की है। यह वही हिन्दू-जाति है
जिसने ही पहलेपहल संसारमें अहिंसा-धर्मका प्रचार किया, जिसने
ही संसारको खड्गसे नहीं, अमरत्वके सनातन शांतिप्रद उपदेशसे
अपना शिष्य और अंकित बनाया, जिसने अहिंसा धर्मका यहां-
तक प्रचार किया कि पशु-पक्षोको मारना भी दंडनीय अपराध
माना, जिसके शांतिप्रद श्रेष्ठ जीवनको देखकर विदेशियोने ही
इसे “इंदु” की उपमा दी और आज भी आधेसे अधिक जगत
जिसकी जन्मभूमिको अपनी पुण्यभूमि मानता है। इस हिन्दू-
जातिकी विजय संसारमें सत्यकी विजय है। हिन्दू-जातिका
यही मिशन है। इसीके लिये उसे अपने “हिन्दुत्व”-रक्षाका व्रत
अखंड रखना है। अब वह परिस्थिति नहीं है जो पहले थी; पर
संग्राम अब भी है। अब उसका रूप दूसरा है—प्राण वही है।
इस इतिहाससे हमें हिन्दू-जातिके अनन्त धैर्य, अनुपम शौर्य और
अद्भुत जीवनी शक्तिका परिचय मिलता है; पर इस धैर्य, शौर्य और
जीवनी शक्तिके साथ एक बात यदि और होती तो हिन्दुस्थानके
इतिहासमें यह थोड़ासा काल जो पराभव और परदास्यमें बीता,
यह भी इस तरह न बीतता। जिस बातकी कसर आज स्पष्ट
दिखायी देती है वह बात है संघटन। यह एक ऐतिहासिक सत्य
है कि हिन्दुस्थानमें आकर कोई भी विदेशी सेना कभी किसी
संघटित हिन्दू-शक्तिका पराभव नहीं कर सकी। जब और जहां
हिन्दू विघटित हुए तब और वहां ही विदेशियोंको अवसर मिला
और इसी तरहसे हिन्दुस्थान पराधीन हुआ। सिन्धपर मुसलमा-
नोंका जो सबसे पहले आक्रमण हुआ और जिसने भारतवर्षमें
विदेशी राज्यकी नींव डाली वह आक्रमण भी कभी सफल न
होता, कभी विदेशी राज्यकी वह नींव न पड़ती यदि सिन्धके हिन्दू
एक होते और वहांके बौद्ध और सनातनधर्मावलम्बी आपसमें ही
न झगड़ते। परन्तु यह इतिहास है जो बदल नहीं सकता। हां,
इससे जो शिक्षा मिलती है वह यही है कि हिन्दू धैर्य, शौर्य और
जीवनीशक्तिमें संसारकी किसी भी जातिसे हीन नहीं, बल्कि सब
जातियोंसे श्रेष्ठ ही प्रमाणित हुए हैं और यदि यही जाति संघटित
हो तो फिरसे यह संसारकी सिरमौर बने। हिन्दू-जातिका पिछला
सहस्रों वर्षका इतिहास संसारकी किसी भी जातिसे अधिक
उज्ज्वल है और इसलिये इसका भावी इतिहास भी संसारमें सबसे
अधिक उज्ज्वल होनेवाला है।
हिन्दुत्वकी रक्षाके लिये हिन्दू-संगठन आवश्यक है। हिन्दुत्व-
की रक्षा और हिन्दुस्थानके सर्वजनसमाज-सुखदायी स्वराज्यके
लिये ही हिन्दू संगठन हो रहा है। हिन्दू-जातिको जो आत्मवि-
स्मृति हुई है उसे नष्ट करके उसे आत्मस्मरण करा देना है।
इसलिये हिन्दुत्व क्या है, यही सबसे पहले जानना और जनाना
होगा जिसमें एक हिन्दू दूसरे हिन्दूको देखते ही हिन्दुत्वके
प्राणसे समप्राण हो जाय और अहिन्दू भी अपने हिन्दू रूपको
Uploaded By Rajesh Tanti.
॥४॥
देख लें तथा हिन्दू-संस्कृति के इन्दुवत सुशीतल स्वच्छ प्रकाश का
आनन्द लें । हिन्दू जैसे पहले थे, वैसे फिर हो जायं । हिन्दुत्व
ही हिन्दू-जातिका प्राण है और यह प्राण ही संघटन का आधार
है । इसलिये जिस लेखक ने हिन्दुत्व के लक्षण बतलानेवाली यह
शास्त्रीय पुस्तक लिखी है उसने सचमुच ही हिन्दू-संघटनकी
आधारभूमि ही दिखा दी है। आओ, इस आधारभूमिपर हम
आप खड़े हो जायं, हिन्दुत्व के झंडे के नीचे एक हो जायं, और
इस स्मृतिवचन को सार्थक करें कि,
येनास्य पितरो याता येन याताः पितामहाः
तेन यायात्सतां मार्गं तेन गच्छन्न रिष्यते।
-लक्ष्मणनारायण गर्दे
सूचना—मूल पुस्तककी भाषा बहुत ही सुन्दर और ओजस्विनी है।
भाषान्तरमें जो कोई दोष हों वे मेरे हैं और गुण मूल ग्रन्थकारके। प्रथम
अध्यायके भाषान्तरमें वह अंश निकाल दिया गया है जिसमें "हिन्दुइज्म"
शब्दका ही विचार है; क्योंकि भाषांतरमें इस शब्दके विचारकी कोई आव-
श्यकता भाषांतरकारको नहीं प्रतीत हुई। अन्य सब अध्यायोंका संपूर्ण
भाषांतर है। पुस्तकके प्रत्येक अध्यायपर जो शीर्षक है वह मूल पुस्तकमें
नहीं है । शीर्षक बैठानेमें जो कोई दोष हुआ हो, वह मेरा है।
ल० ना० गर्दे
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हिन्दुत्व
( १ )
हिन्दू नाममें क्या है ?
हम हिन्दू हैं और हिन्दू ही बने रहना चाहते हैं।
हिन्दू नामके साथ हमारी यह आसक्ति देखकर कुछ लोग,
वेरोनाकी उस रूपवती कन्याके समान, जिसने अपने प्रेमीसे प्रेमके
नामपर अपना नाम बदल देनेकी याचना की थी, उसीके मुखसे
निकले हुए उद्गार इस प्रकार दोहरा सकते हैं कि, "नाममें क्या
है ? नाम हाथ नहीं है, पैर नहीं है, बाँह नहीं है, चेहरा नहीं हैं,
मनुष्य-शरीरका कोई अवयव नहीं है; फिर इसमें है ही क्या जो
हम इस नामकी पूजा करें—उसे छोड़ न सकें ! वस्तु है तो
नामकी क्या परवा ? गुलाबको गुलाब न कहकर उसे और
किसी नामसे पुकारें तो इससे उसकी सुगन्ध तो कहीं नहीं
जाती !” एक ही वस्तु है, पर भिन्न-भिन्न भाषाओंमें उसके भिन्न-
भिन्न नाम हैं। इसीसे यह सन्देह दूर हो जाता है कि शब्द विशेष
और उससे निकलनेवाले अर्थका परस्पर कोई स्वाभाविक अवि-
च्छिन्न सम्बन्ध है। परन्तु वस्तु और वस्तुवाचक शब्दका पर-
स्पर सम्बन्ध जितना ही दृढ़ और पुराना होता है उतना ही उस
शब्द और उसके अर्थका परस्पर सम्बन्ध अविच्छिन्न हो जाता है।
२ हिन्दुत्व
और उस अर्थ या अभिप्रायको व्यक्त करनेकी मनोवस्थामें , वह
शब्द स्वाभाविक रीतिसे मुखसे निकल पड़ता है और उस शब्दसे
वही अर्थ ध्यानमें आ जाता है। इसके साथ ही जब उस शब्दके
साथ और भी अनेक भावनाएँ उदय होती हैं, जिनका उदय होना
उस शब्दके उच्चारणके साथ हम नहीं रोक सकते, तब तो उस
शब्द या नामका उतना ही महत्व है, जितना उस वस्तुका।
इसलिये जो लोग ऐसा कहें कि नाममें क्या है, उन्हें उदाहरणके
तौरपर अपने ही मनसे यह प्रश्न करना चाहिये कि क्या हम अपने
उपास्य दैवत राम या कृष्णका नाम बदलकर महम्मद या ईसा
रख सकते हैं? नाम हाथ, पैर, या और कोई अवयव नहीं है—
नाम तो उस वस्तुका सर्वस्व है। नामकी महिमा ऐसी है कि वह
भावना विशेषका प्रतीक हो जाता है और वह भावना मर्त्य मनुष्यों-
की कई पीढ़ियोंके बाद भी जीवित रहती हैं। राम और कृष्ण इस
मर्त्यलोकको छोड़कर चले गये, पर उनके नामकी महिमा नहीं
घटी, उस नाममें जो भाव सन्निहित हैं, वे आज भो उस नामको
लेते ही उदय हो जाते हैं। नाममें क्या रखा है? अयोध्याको
अयोध्या न कहकर होनालूलू कहें तो क्या ऐसा कह सकते हैं?
क्या शिवाजीका नाम बाटू और वाशिंगटनका नाम चंगेजखाँ रख
सकते हैं? क्या कोई मुसलमान अपनेको शौकसे यहूदी कह
सकता है? नहीं, इन नामोंमें इतिहास भरा हुआ है, आत्मगौरव
भरा हुआ है। प्रत्यक्ष जीवन भरा हुआ है। इन नामोंमें जीवनी-
शक्ति भरी हुई है।
हिन्दू नाममें क्या है ३
ऐसे जीवनप्रद और कर्तव्यसूचक तथा गौरववाचक नामोंमें
एक नाम हिन्दुत्व है, जिसके अर्थका विचार हम इस पुस्तकमें
करना चाहते हैं। इस नाममें इतनी भावनाएं और संस्थाएं छिपी
हुई हैं और वे भावनाएँ और संस्थाएँ इतनी बलवती और गम्भीर
हैं कि इस नामका विश्लेषण करना असम्भव हो जाता है।
यदि अधिक नहीं तो चालीस शताब्दियोंका इतिहास इस नाममें
भरा हुआ है—इस नामका जो अभिप्राय है उस अभिप्रायको
व्यक्त करनेकी शक्ति इसे प्राप्त करनेमें ४० शताब्दियाँ लगी हैं।
बड़े-बड़े अवतारी पुरुष और कवि, शास्त्री पण्डित और धर्मव्यव-
स्थापक, योद्धा और इतिहासकार इस नामके लिये जीये, इस
नामके लिये लड़े और इस नामपर मर मिटे ! यह नाम क्या
हमारी जातिके असंख्य कार्योंका ही परिणाम नहीं है ? कभी
युद्ध, कभी मिलाप और कभी परस्पर सहयोगके रूपमें हिन्दू
जातिने जो कुछ किया वह सब इस नाममें है। हिन्दुत्व केवल
एक शब्द नहीं है, एक सम्पूर्ण इतिहास है। हिन्दुत्वसे अभि-
प्राय किसी संप्रदायका संप्रदायधर्म नहीं हो सकता। हिन्दुत्व
हमारी हिन्दू जातिका संपूर्ण इतिहास है। हिन्दुत्वका सम्पूर्ण
भाव हृदयङ्गम करनेके लिये हमें 'हिन्दू' शब्दका ही वास्तविक अर्थ
पहले समझना होगा और यह जानना होगा कि करोड़ों मनुष्यों-
के हृदयमें इस नामका साम्राज्य कैसे प्रतिष्ठित हुआ और कैसे
इस वीर हिन्दू जातिने यह नाम धारण किया।
( २ )
हिन्दू नामकी उत्पत्ति
अभी इतना ऐतिहासिक अनुसन्धान नहीं हुआ है कि यह
निश्चित रूपसे बताया जा सके कि पहले-पहल आर्य लोग सिन्धु
नदीके किनारे कब आकर बसे और कब उन्होंने वहां अपना
अग्निहोत्र स्थापित किया। परन्तु यह निश्चित है कि प्राचीन
मिश्रवासी और बैबिलनवालोंकी जिस सभ्यताका संसारमें
इतना नाम हुआ उस सभ्यताका जब पता भी नहीं था, तभी पवित्र
सिन्धुसलिलकी कलकल ध्वनिके साथ यज्ञीय धूमकी सुगन्ध
भी प्रवाहित हुआ करती थी और वह तट-प्रदेश वेदघोषसे गूँजा
करता था, जिससे आर्योंके अन्तःकरणमें आध्यात्मिक ज्योति
प्रज्वलित रहा करती थी। ये लोग पराक्रमी थे, वीर थे, सत्या-
नुसन्धान करते हुए इन्होंने अत्यन्त गम्भीर तत्वोंका अनुभव
किया था। ये लोग ऐसे थे, इसीलिये ये एक महान् और स्थायी
संस्कृतिकी नींव डालनेमें समर्थ हो सके। अपने और पड़ोसियों-
से, खासकर ईरानियोंसे, जिस समय इनका सम्बन्ध टूट चुका
था, उस समयतक ये सातों सिन्धु—सप्तसिन्धुमें फैल चुके थे;
और इनमें राष्ट्रीयताकी भावना केवल विकसित हीं नहीं हुई
थी, प्रत्युत उन्होंने उसका स्थान और नाम भी निर्दिष्ट कर दिया
था। नदियोंसे घिरे और सींचे जानेवाले इस देशमें रहते हुए
हिन्दू नामकी उत्पत्ति ५
और इन स्थायी नदियोंसे सदा ही जीवनी शक्ति प्राप्त करते हुए,
इन लोगोंने कृतज्ञताबुद्धिसे अपना नाम भी सप्तसिन्धु रख लिया,
जो सप्तसिन्धु नाम संसारके सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेदमें आता
है और जो समूचे वैदिक भारतवर्षका नाम था। आर्य लोग
कृषिको सदासे ही प्रधान वृत्ति मानते आये हैं। ( सर्वोत्तमंकर्ष-
णमाहुरायार्याः ), और आर्य कृषक ही थे, इससे स्वभावतः
ही इन सात नदियोंके परम भक्त थे और सिन्धुप्रधान ये सातों
नदियाँ उनके लिये उनकी राष्ट्रीयता और संस्कृतिके चिह्नस्वरूप
ही थीं—"इमा आपः शिवतमा इमा राष्ट्रस्य भेषजीः। इमा राष्ट्र-
स्य वर्धनीरिमा राष्ट्र भृतोपमाः॥"
यहांसे आर्य जब और आगे बढ़े तब उन्हें ऐसी ही परमोप-
कारिणी नदियाँ अनेक मिलीं, परंतु सप्तसिन्धुओंपर उनकी श्रद्धा
और भक्ति कम नहीं हुई। और कम होती भी कैसे,जब इन्हीं सप्त-
सिन्धुओंने उन्हें एक राष्ट्र बनाया था और उन्हें वह नाम दिया
था, जिसके द्वारा वे अपनी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकताको
प्रकट करते थे। आजभी प्रत्येक हिन्दू, चाहे वह कहींका हो,
कृतज्ञताके साथ सप्तसिन्धुओंका स्मरण करता और आत्मशुद्धि-
के लिये उनका आवाहन करता है। “इमं मे गंगे यमुने सरस्वति
शुतुद्रिस्तोमं सचना परुष्णया। असिक्न्या मरुद्वृधे वितस्तयार्जी-
कीये शृणुह्या सुषोमया ॥ गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेस्मिन् सन्निधिं कुरु॥"
ये लोग अपने आपको "सिन्धु” कहते थे, यही नहीं, बल्कि
६ हिन्दुत्व
हमारे पास इस बातके पक्के प्रमाण हैं कि आसपासके राष्ट्र इन्हें
“सप्तसिन्धु” के नामसे ही जानते थे । संस्कृतका “स” भारतीय
तथा भारतीयेतर प्राकृतोंमें आकर प्रायः “ह” हो जाता है ।
उदाहरणार्थ, सप्त शब्द भारतीय प्राकृतोंमें ही हप्त नहीं हो गया
है प्रत्युत यूरोपियन भाषाओंमें भी वह हप्त हो गया है; “सप्ताह”
को हिन्दुस्थानमें “हफ्ता” और यूरोपमें “हेप्तार्की” कहते हैं ।
संस्कृतका “केसरी” शब्द पुरानी हिन्दीमें “केहरी” हो गया
है । “सरस्वती” शब्द ईरानी भाषामें “हरहवती” हो गया है और
“असुर” का रूपान्तर हुआ है “अहुर” । और तो और, हमारे
राष्ट्रका वैदिक नाम “सप्तसिन्धु” प्राचीन ईरानियोंके “अवेस्ता”
में “हप्तहिन्दु” करके लिखा गया है । इस प्रकार इतिहासके उषः-
कालमें ही हम देखते हैं कि हम “सिन्धु” याने “हिन्दू” राष्ट्रके
थे और यह बात पौराणिक युगमें भी हमारे पण्डितवर्गको
अच्छी तरह मालूम थी । भविष्य-पुराणमें जहाँ म्लेच्छ-भाषाओंको
संस्कृतकी ही शाखाएं कहा गया है, वहां यह बात स्पष्ट रूपसे
कही गयी है और आगे लिखा है—
संस्कृतस्यैव वाणी तु भारतं वर्षमुह्यताम् ।
अन्यखण्डे गता सैव म्लेच्छाद्यानंदिनोऽभवन् ।
पितृ पैतर भ्राताच बादरः पतिरेवच ।
सेति सा यावनी भाषा ह्यश्वश्चास्यस्तथा पुनः ।
जानुस्थाने जैनु शब्दः सप्तसिन्धुस्तथैव च ।
हप्तहिन्दुर्यावनीच पुनज्ञेया गुरुंडिका॥ (प्रतिसर्ग पर्व अ०५)
हिन्दू नामकी उत्पत्ति ७
ईरानी वैदिक आर्योंको “हिन्दू” नामसे ही जानते थे। यह
एक बात हुई। दूसरी बात यह है कि किसी विदेशी और अज्ञात
जातिको हम उसी नामसे जानते हैं जो नाम उनका उन लोगोंमें
लिया जाता हो, जिन लोगोंद्वारा हमें उस जातिका परिचय
मिलता है। इन दो बातोंसे हम यह कह सकते हैं कि दूर-दूरके
राष्ट्र भी ईरानियोंके समान हमारे देश और जातिको हिन्दू ही
कहते थे। यही नहीं, बल्कि सप्तसिन्धुओंके देशमें जो आदिम
जातियां यत्र-तत्र बिखरी हुई थीं, वे भी अपनी-अपनी बोलीमें
उसी भाषाशास्त्रके नियमसे आर्योंको हिन्दू ही कहती होंगी।
इसके पश्चात् वैदिक संस्कृतसे ज्यों-ज्यों प्राकृत भाषाएं उत्पन्न
होने लगीं और इन सिन्धुओंके वंशजोंमें तथा जिन आदिम निवा-
सियोंको इन्होंने अपने अन्दर मिला लिया, उनके वंशजोंमें उनका
प्रचार होने लगा, त्यों-त्यों ये लोग बाहर देशवालोंके प्रभावके
बिना ही अपने आपको हिन्दू कहने लगे होंगे। कारण संस्कृत
“स” का रूप भारतीयेतर भाषाओंमें जिस तरह “ह” हो जाता
है, उसी तरह वह भारतीय प्राकृतोंमें भी “ह” हो जाता है। इस
प्रकार ग्रन्थान्तर्गत पक्के प्रमाणोंसे यह निर्विवाद सिद्ध है कि
हमारा सबसे पहला नाम, यह कहिये कि हमारे पूर्व पुरुषोंने
हमारे पालनेमें हमारा जो नाम रखा, वह सप्तसिन्धु या सप्तहिन्दू
है और उस समयके समस्त ज्ञात संसारके सब देश हमें इसी
“सिंधु” या “हिंदू” नामसे जानते थे।
यहां तक हम ग्रंथोंके आधारपर ही चले, पर अब अनुमान-
८ हिन्दुत्व
क्षेत्रकी थोड़ी सैर करेंगे । आर्योंका आदि वासस्थान कौन था-
इस विषयमें अभी हमने कोई सिद्धान्त नहीं माना है। परन्तु
हिन्दुस्थानमें उनके प्रवेशके संबंधमें जो सिद्धांत बहुतोंने मान
लिया है, उसे हम स्वीकार कर लें तो स्वभावतः यह जिज्ञासा होती
है कि उन्होंने इस देशको अपनी मातृभूमि मानकर उसके दृश्योंके
जो नाम रखे, उनकी उत्पत्ति कहाँसे हुई । क्या ये सब नाम
उन्होंने अपनी भाषासे ही नयी शब्दसृष्टि करके रखे ? जब हम
कोई नया दृश्य देखते या किसी नवीन देशमें प्रवेश करते हैं, तब
क्या यह बात सच नहीं है कि हम उस दृश्य या देशका वही
नाम लेते हैं, जो नाम वहांके लोग लेते हों ? नामके उच्चारणमें
अपनी-अपनी उच्चारण-क्षमता या रुचिके अनुसार थोड़ा भेद हो
सकता है, पर नाम तो वही रहता है जो वहाँके अधिवासियों-
द्वारा लिया जाता है। हां, कभी-कभी ऐसा भी होता है कि
अपने यहाँके पुराने प्रिय नामोंका उपयोग नये देशकी नयी
वस्तुओंके लिये किया जाता है, खासकर जब नये उपनिवेश
कायम किये जाते हैं। परन्तु यह तभी होता है जब पुराने देशमें
वे नाम व्यवहृत होते हों जो नये देशकी नयी वस्तुओंको दिये
गये। परन्तु इस अवस्थामें भी जिन वस्तुओंके जहाँ जो नाम
हैं, उन्हींका उपयोग करनेकी रीति अधिक प्रचलित है। अब
सप्तसिंधुके प्रदेशका विचार कीजिये । हम सब यह निश्चितरूपसे
जानते हैं कि इस प्रदेशमें अनेक जातियाँ अलग-अलग रहती
थीं । इनमेंसे कुछने नवागन्तुकोंके साथ अच्छा व्यवहार किया
हिन्दू नामकी उत्पत्ति ६
और बहुतोंने इस नये देशके नये दृश्य आर्योंको दिखानेमें पथ-
प्रदर्शकका काम किया, क्योंकि आर्य इस देशमें नये थे। विद्याधर,
अप्सरा, यक्ष, रक्ष, गन्धर्व, किन्नर आदि सभी आर्यों के पूर्णतया
शत्रु थे यह बात नहीं, क्योंकि अनेक स्थानोंमें इनके सुखभा-
वादिका वर्णन है। इस प्रकार यह बहुत सम्भव है कि इस देशके
आदिम निवासियोने यहाँकी महानदियोंके जो नाम इन्हें बताये,
उन्हीं नामोंको संस्कृत रूप देकर इन्होंने स्वीकार कर लिया।
जाति और भाषाको मिला लेनेकी इस प्रवृत्तिका विस्तार हमें
आगे बहुत दिखाई देता है—शलकंटकटा, मलय, मिलिंद, अलसंदा
( अलेकजण्ड्रिया ), सुलूम ( सेल्यूकस ) आदि शब्दोंको देखिये।
यदि यह सच हो कि इस प्रकार अन्य भाषाओंके शब्दोंको संस्कृत
रूप देकर अपनी भाषामें मिला लेनेकी प्रवृत्ति पहलेसे चली
आती है, तो यह बहुत सम्भव है कि हमारे देशके आदिम निवासी
“सिन्धु” नदीको “हि'दू” ही कहते हों और आर्यों की विशिष्ट
उच्चारण-पद्धतिके कारण यह नाम “हि'दू” से “सिंधु” हो गया।
इस प्रकार इस देश और इस देशमें रहनेवाली जातिका नाम
अत्यंत प्राचीनकालसे “हिंदू” ही है—यहांतक कि “सिंधु” जो
वैदिक नाम हैं, वह भी उसका उसके पीछेका रूप है। यदि “सिन्धु”
शब्द इतना प्राचीन है कि इतिहासकालके अरुणोदयमें उसका मूल
मिलता है तो “हि'दू” शब्द उससे भी इतना अधिक प्राचीन है
कि प्राचीन गाथाएं भी उसके मूलका पता लगानेमें असमर्थ हैं।
सिन्धुओं या हिन्दुओं जैसे पराक्रमी लोग पंचनद या पञ्जाब-
१० हिन्दुत्व
के अन्दर ही बन्द रहें यह संभव नहीं था। पञ्चनदके आगेकी
विशाल और उर्वरा भूमि ऐसी पराक्रमी जातिकी मानो प्रतीक्षा
ही कर रही थी। एक-एक करके अनेक हिन्दू वंश इस सिन्धु-
प्रदेशसे निकले। उनका उद्देश्य महान् था और उस उद्देश्यका
चिह्न यज्ञीय अग्नि उनके साथ था। वह विशाल भूमि सघन
बनसे परिपूर्ण थी। मनुष्योंकी बसती बहुत कम थी । इन्होंने
जंगल काटकर साफ किया। कृषिका विस्तार हुआ। जनपद
और राज्य निर्माण हुए। इन कामोंको करते हुए आर्योंने अपनी
वैयक्तिक प्रवृत्ति तथा नवीन परिस्थितिके अनुसार ऐसी राज-
नीति निर्मित और विकसित की, जिसमें केन्द्रीकरणकी व्यवस्था
तो थी पर वह वैसी दृढ़ नहीं थी। समयके साथ-साथ ज्यों-ज्यों
नये-नये उपनिवेश होने लगे और उनका परस्पर स्थानांतर बढ़ने
लगा तथा वे आर्य अनेक उच्च संस्कृति-संपन्न भिन्न-भिन्न जाति-
योंका समावेश अपनी संस्कृतिके अन्दर करने लगे, त्यों-त्यों इन
भिन्न-भिन्न जनपदोंके राजनीतिक जीवनके केन्द्र भी बहुत कुछ
भिन्न-भिन्न हो गये अर्थात् प्रत्येक राज्य अपनी राजनीतिका
आप ही केन्द्र बनने लगा। नवीन स्नेह-संबंध स्थापित हुए और
यद्यपि वे पुराने संबन्धोंको मिटा नहीं सके तथापि उनका प्रभाव
बढ़ने लगा और कुछ काल बाद प्राचीन नाम भी बदल गये और
नये नाम आये। कुछ लोग अपनेको कुरु, कुछ काशी और, कुछ
मगध कहने लगे और मूलवंशका सिन्धू या हिन्दू नाम पहले
इन नामोंसे दब गया और पीछे भूल-सा ही गया। यह बात नहीं
हिन्दू नामको उत्पत्ति ११
कि राष्ट्रीय और सांस्कृतिक एकताकी भावना ही नष्ट हो गयी
हो, पर इस भावनाने नये नाम-रूप धारण किये। ऐसे नवीन
नाम-रूपोंमें राजनीतिशः सबसे महत्वपूर्ण संस्था “चक्रवर्ती”
की थी। अंतको हिन्दुओंने एक देश और एक राष्ट्र स्थापित
करनेका जो महान् उद्देश्य धारण किया था उसकी भौगोलिक
मर्यादा स्थापित हो गयी, जब राजकुमार रामचन्द्रने विजयी
होकर लंकामें प्रवेश किया और हिमालयसे लेकर समुद्रपर्यन्त
समग्र देश एक राजछत्रके नीचे ले आये। जिस दिन विजयका
अश्व बेरोक अयोध्यामें लौट आया और आदर्श नृपति राजा
रामचन्द्रके सिंहासनपर सार्वभौम राजका श्वेत छत्र लगा तथा
केवल आर्यवंशके राजाओंने ही नहीं प्रत्युत दक्षिणके हनुमान-
सुग्रीव-विभीषणने भी उनका सार्वभौमत्व स्वीकार किया—वही
दिन हमारी हिन्दू-जातिका वास्तविक जन्मदिन था। वास्तवमें
वह हमारा राष्ट्रीय दिन था; क्योंकि आर्य और अनार्य दोनों एक
होकर एक राष्ट्र बन गये। पूर्वके लोगोंने इसके पूर्व जो कुछ
प्रयत्न किये, उन सबका एकीकरण हुआ और राजनीतिशः उन
प्रयत्नोंकी पूर्णता हुई। सबका एक लक्ष्य हुआ, एक राष्ट्रीय
झंडा हुआ, एक ही उद्योग हुआ जिसके लिये इसके बादके लोग
पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाने-बेजाने लड़ते और अपने प्राणोंको उत्सर्ग
करते रहे।
एकीभवनकी कोई भी भावना अपने लिये यथोचित
व्यापक और पूर्ण बोधक संज्ञा या नाम पाकर बहुत दृढ़ हो
१२ हिन्दुत्व
जाती है। जिस विशाल एकीभवनके उद्योगमें सिन्धुसे समुद्र
पर्यन्त इस संपूर्ण महादेशका समावेश हुआ था और इसे एक
राष्ट्र बना देनेका जिसका लक्ष्य था, उसके लिये "आर्यावर्त"
और "ब्रह्मावर्त" पूर्ण बोधक नाम नहीं थे। प्राचीन ग्रन्थकारोंके
लेखानुसार आर्यावर्त वह देश था जो हिमालय और विन्ध्याके
बीचमें था—"आर्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यं विन्ध्यहिमालयोः" जिस
अवस्थामें यह नामकरण हुआ उस अवस्थामें यह ठीक भी था;
परन्तु जब आर्यावर्तवासिनी आर्य-जातिने आर्य और अनार्य
दोनोंको मिलाकर एक राष्ट्र निर्माण कर दिया और नतशिखर
विन्ध्याद्रीके भी पार दूर दूरतक अपनी संस्कृतिका प्रचार कर
लिया, तब ऐसी जातिके लिये यह नाम बहुत ही अपूर्ण था।
आवश्यकता थी एक ऐसे नामकी जो भारतीय राष्ट्रकी व्यापक
भावनाका बोधक हो। अत्यधिक रूपमें यह प्रयोजन तब सिद्ध
हुआ जब भरत-वंशका समस्त पृथिवीपर राज हुआ। यह भरत
कौन थे—यह वैदिक थे या जैन थे—अथवा यह कब हुए
इत्यादि बातोंके संबन्धमें कल्पना-सागरमें गोते लगाना छोड़
इतना ही जानना हमारे लिये यहाँ पर्याप्त होगा कि आर्यावर्त
और दक्षिणापथके लोगोंने अपनी मातृभूमिका यह नाम केवल
स्वीकार ही नहीं किया, प्रत्युत इस नामसे अपनी मातृभूमि और
अपनी संस्कृतिके साम्राज्यको पुकारनेमें उन्हें स्नेहपूर्ण आनंद
आता था। ज्यों-ज्यों दक्षिणकी ओर अन्तरिक्षका पट खुल गया,
त्यों-त्यों हम देखते हैं कि जातिके गुरुत्वाकर्षणका केन्द्र सप्त-