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सर्वकोश
हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 18, कुल 167 में से

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२ हिन्दुत्व
और उस अर्थ या अभिप्रायको व्यक्त करनेकी मनोवस्थामें , वह
शब्द स्वाभाविक रीतिसे मुखसे निकल पड़ता है और उस शब्दसे
वही अर्थ ध्यानमें आ जाता है। इसके साथ ही जब उस शब्दके
साथ और भी अनेक भावनाएँ उदय होती हैं, जिनका उदय होना
उस शब्दके उच्चारणके साथ हम नहीं रोक सकते, तब तो उस
शब्द या नामका उतना ही महत्व है, जितना उस वस्तुका।
इसलिये जो लोग ऐसा कहें कि नाममें क्या है, उन्हें उदाहरणके
तौरपर अपने ही मनसे यह प्रश्न करना चाहिये कि क्या हम अपने
उपास्य दैवत राम या कृष्णका नाम बदलकर महम्मद या ईसा
रख सकते हैं? नाम हाथ, पैर, या और कोई अवयव नहीं है—
नाम तो उस वस्तुका सर्वस्व है। नामकी महिमा ऐसी है कि वह
भावना विशेषका प्रतीक हो जाता है और वह भावना मर्त्य मनुष्यों-
की कई पीढ़ियोंके बाद भी जीवित रहती हैं। राम और कृष्ण इस
मर्त्यलोकको छोड़कर चले गये, पर उनके नामकी महिमा नहीं
घटी, उस नाममें जो भाव सन्निहित हैं, वे आज भो उस नामको
लेते ही उदय हो जाते हैं। नाममें क्या रखा है? अयोध्याको
अयोध्या न कहकर होनालूलू कहें तो क्या ऐसा कह सकते हैं?
क्या शिवाजीका नाम बाटू और वाशिंगटनका नाम चंगेजखाँ रख
सकते हैं? क्या कोई मुसलमान अपनेको शौकसे यहूदी कह
सकता है? नहीं, इन नामोंमें इतिहास भरा हुआ है, आत्मगौरव
भरा हुआ है। प्रत्यक्ष जीवन भरा हुआ है। इन नामोंमें जीवनी-
शक्ति भरी हुई है।