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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 167 में से

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१० हिन्दुत्व
के अन्दर ही बन्द रहें यह संभव नहीं था। पञ्चनदके आगेकी
विशाल और उर्वरा भूमि ऐसी पराक्रमी जातिकी मानो प्रतीक्षा
ही कर रही थी। एक-एक करके अनेक हिन्दू वंश इस सिन्धु-
प्रदेशसे निकले। उनका उद्देश्य महान् था और उस उद्देश्यका
चिह्न यज्ञीय अग्नि उनके साथ था। वह विशाल भूमि सघन
बनसे परिपूर्ण थी। मनुष्योंकी बसती बहुत कम थी । इन्होंने
जंगल काटकर साफ किया। कृषिका विस्तार हुआ। जनपद
और राज्य निर्माण हुए। इन कामोंको करते हुए आर्योंने अपनी
वैयक्तिक प्रवृत्ति तथा नवीन परिस्थितिके अनुसार ऐसी राज-
नीति निर्मित और विकसित की, जिसमें केन्द्रीकरणकी व्यवस्था
तो थी पर वह वैसी दृढ़ नहीं थी। समयके साथ-साथ ज्यों-ज्यों
नये-नये उपनिवेश होने लगे और उनका परस्पर स्थानांतर बढ़ने
लगा तथा वे आर्य अनेक उच्च संस्कृति-संपन्न भिन्न-भिन्न जाति-
योंका समावेश अपनी संस्कृतिके अन्दर करने लगे, त्यों-त्यों इन
भिन्न-भिन्न जनपदोंके राजनीतिक जीवनके केन्द्र भी बहुत कुछ
भिन्न-भिन्न हो गये अर्थात् प्रत्येक राज्य अपनी राजनीतिका
आप ही केन्द्र बनने लगा। नवीन स्नेह-संबंध स्थापित हुए और
यद्यपि वे पुराने संबन्धोंको मिटा नहीं सके तथापि उनका प्रभाव
बढ़ने लगा और कुछ काल बाद प्राचीन नाम भी बदल गये और
नये नाम आये। कुछ लोग अपनेको कुरु, कुछ काशी और, कुछ
मगध कहने लगे और मूलवंशका सिन्धू या हिन्दू नाम पहले
इन नामोंसे दब गया और पीछे भूल-सा ही गया। यह बात नहीं