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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 23, कुल 167 में से

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पृष्ठ 23

हिन्दू नामकी उत्पत्ति ७
ईरानी वैदिक आर्योंको “हिन्दू” नामसे ही जानते थे। यह
एक बात हुई। दूसरी बात यह है कि किसी विदेशी और अज्ञात
जातिको हम उसी नामसे जानते हैं जो नाम उनका उन लोगोंमें
लिया जाता हो, जिन लोगोंद्वारा हमें उस जातिका परिचय
मिलता है। इन दो बातोंसे हम यह कह सकते हैं कि दूर-दूरके
राष्ट्र भी ईरानियोंके समान हमारे देश और जातिको हिन्दू ही
कहते थे। यही नहीं, बल्कि सप्तसिन्धुओंके देशमें जो आदिम
जातियां यत्र-तत्र बिखरी हुई थीं, वे भी अपनी-अपनी बोलीमें
उसी भाषाशास्त्रके नियमसे आर्योंको हिन्दू ही कहती होंगी।
इसके पश्चात् वैदिक संस्कृतसे ज्यों-ज्यों प्राकृत भाषाएं उत्पन्न
होने लगीं और इन सिन्धुओंके वंशजोंमें तथा जिन आदिम निवा-
सियोंको इन्होंने अपने अन्दर मिला लिया, उनके वंशजोंमें उनका
प्रचार होने लगा, त्यों-त्यों ये लोग बाहर देशवालोंके प्रभावके
बिना ही अपने आपको हिन्दू कहने लगे होंगे। कारण संस्कृत
“स” का रूप भारतीयेतर भाषाओंमें जिस तरह “ह” हो जाता
है, उसी तरह वह भारतीय प्राकृतोंमें भी “ह” हो जाता है। इस
प्रकार ग्रन्थान्तर्गत पक्के प्रमाणोंसे यह निर्विवाद सिद्ध है कि
हमारा सबसे पहला नाम, यह कहिये कि हमारे पूर्व पुरुषोंने
हमारे पालनेमें हमारा जो नाम रखा, वह सप्तसिन्धु या सप्तहिन्दू
है और उस समयके समस्त ज्ञात संसारके सब देश हमें इसी
“सिंधु” या “हिंदू” नामसे जानते थे।
यहां तक हम ग्रंथोंके आधारपर ही चले, पर अब अनुमान-