सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 167 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73

हिन्दवानेकी ढाल ५७
"शहास तुम्ही आपली बेमानगिरो करीत नाहीं। आदि
कुलदेव स्वयंभू। त्यांनीं आम्हांस यश दिलें व पुढें तो
मनोरथ हिन्दवी स्वराज्य करून पुरविणार आहे हें राज्य
व्हावें हें श्रीचे मनांत फार आहे।"
अर्थात् "आप शाहसे बेईमानी नहीं करेंगे (अच्छी बात है) !
हमारे आदि कुलदेव (तो) स्वयंभू हैं। उन्होंने हमें यश दिया
है और आगे भी वे हमारा मनोरथ हिन्दवी स्वराज्य करके
पूरा करनेवाले हैं। यह राज्य स्थापित हो ऐसी श्रीकी उत्कट
इच्छा है।"
श्रीयुत राजवाडे महोदयके पास इस चिट्ठीकी असली नकल
है, जिससे यह पता लगता है कि १७ वीं और १८ वीं शताब्दीमें
हिन्दू-जातिने जो महदुद्योग किया, उसकी मूल भावना क्या थी।
यह कोई क्षुद्र उद्योग नहीं था—कोई संकुचित भाव इसमें नहीं
था—यह हिन्दवी स्वराज्य—हिन्दू-साम्राज्यकी स्थापनाका
महान् उद्योग था। इसी प्रेरणासे शिवाजीके सब काम हुए जब
वह केवल एक बालक थे। इसका प्रमाण हमें उनके शब्दोंमें
मिलता है।
परंतु जब राणा जयसिंह दिल्लीपतिकी ओरसे शिवाजीका
दमन करनेके लिये आये, तब स्वभावतः ही उनका सामना करने-
वाले खड्गकी धार कुंद हो गयी। जो राजपूत हिंदुत्वकी रक्षा करने-
वाले हिंदुओंकी ढाल थे, उन्हीं राजपूतोंको अपना और अपने
सहधर्मी और हिन्दू-भाइयोंका रक्त गिरानेपर उद्यत देखकर और