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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

पृष्ठ 61, कुल 167 में से

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हिन्दवानेकी ढाल [४५]


अखंडताकी भावनाको व्यक्त करनेका वैसा सामर्थ्य नहीं था जैसा
कि “हिन्दुस्थान” नाममें। सिन्धुके इस पार रहनेवाले सब लोग
जो सिन्धुनदीसे सिन्धु-समुद्रपर्यन्त अपनी जन्मभूमि मानते थे, इस
एक “हिन्दुस्थान” नाममें अपना अस्तित्व अनुभव करते थे। हमारे
शत्रु हमें हिन्दू कहकर हमारा तिरस्कार करते थे और हिन्दुस्तान-
की सब जातियां, सब संप्रदाय,सब पंथ,अटकसे कटकपर्यन्तः एक
शरीर,एक मन,एक राष्ट्र हो गये । इस मौकेपर हमसे यह कहे बिना
नहीं रहा जाता कि अबतक सन् १३००से सन् १८०० तक काश्मीरसे
लेकर सिंहलद्वीपतक और सिन्धसे बंगालतक भिन्न भिन्न प्रदेशोंमें
हिन्दुओंके जो उद्योग कभी एक साथ और कभी अलग अलग होते
रहे उनका, सम्पूर्ण हिन्दूजातिके इतिहासकी दृष्टिसे अबतक किसी-
ने विचार ही नहीं किया है । इस कालमें संपूर्ण राष्ट्रके सामने
हिन्दुत्वकी रक्षा,हिन्दूजातिके मान और मर्यादाकी रक्षाका एकसा
प्रश्न था और इसके लिये सैकड़ों रणक्षेत्र बन रहे थे और अन्य
प्रयत्न भी हो रहे थे । यही एक शब्द था—“हिन्दुत्व” जो हमारे
राष्ट्रके मनोमय शरीरके मेरुदंडका काम कर रहा था । इसी
हिन्दुत्वके कारण काश्मीरके ब्राह्मणोंपर होनेवाले अत्याचारोंकी
वेदना मद्रासके नायरोंने नहीं सही जाती थी। हिन्दुओंकी हार
देखकर हमारे भाट रोते थे, हमारे आचार्य हिन्दुओंको बढ़ावा देते
थे, हमारे वीर हिन्दुओंकी लड़ाइयां लड़ते थे, हमारे साधु
महात्मा हिन्दुओंको आशीर्वाद देते थे, हमारे राजनीतिज्ञ
हिन्दुओंके भाग्यका विधान करते थे, हमारी माताएँ हिन्दुओं-