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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३१
कितना ही महान् हो, समय बीतनेके साथ क्षीण हो ही जाता है।
जिस नाममें वैयक्तिक गौरव और पराक्रम ही भरा हुआ है, वह
नाम राष्ट्रकी कृतज्ञता-बुद्धि और आत्मगौरव जब बढ़ने
लगता है, तब उस राष्ट्रके चित्तका वैसा समाधान नहीं कर
सकता, जैसा कि कोई ऐसा नाम करे जिसमें राष्ट्रीय पराक्रम भरा
हो, जिसमें राष्ट्रके पूर्व पुरुषोंकी स्मृति संरक्षित हो और इसके साथ
जो कोई उत्तम और स्थायी प्राकृतिक पावन दृश्य नेत्रोंके सामने
उपस्थित करता हो। महाराज भरत आये और चले गये। ऐसे
और भी कितने ही महान् राजा हो गये !—पर सिन्धु अभीतक
वर्तमान है और सदा ऐसी ही वर्तमान रहेगी, हमारी कृतज्ञता-
बुद्धिको सदा इसी प्रकार जगाती और बढ़ाती रहेगी, हमारे
आत्मसम्मानकी इसी प्रकार वृद्धि करती रहेगी, हमारे पूर्वजोंकी
स्मृतिका संचार करती रहेगी—हमारी भवितव्यतापर उसका
पहरा रहेगा। यही हमारे राष्ट्रके कालशरीरका वह मेरुदण्ड
है, जो अति प्राचीनके साथ सुदूर भविष्यका सम्बन्ध रखता
है। जो नाम हमारे राष्ट्रको एक नदीके साथ सम्बद्ध करता
और उसके साथ मिला देता है, वह प्रकृतिको हमारी तरफ ला
देता है और हमारे राष्ट्रीय जीवनको एक ऐसे आधारपर स्था-
पित करता है, जो आधार (जहांतक मानवी दृष्टिकी पहुँच है)
चिरस्थायी है। ये सब बातें हमारे पूर्वजोंके ध्यानमें आयी होंगी
और इन्हींसे प्रेरित होकर उन्होंने हमारे राष्ट्र और देशका नाम
“सिन्धुस्थान” रखा होगा।

३२ हिन्दुत्व
“सिन्धुस्थान” वैदिक नाम तो है ही, पर इससे एक और
विचित्र लाभ हुआ है । अवश्य ही यह संयोग मात्र है, पर उसकी
उपेक्षा नहीं कर सकते । संस्कृत भाषामें “सिन्धु” केवल सिन्धु
नदीका ही नाम नहीं है, समुद्रका भी है जो दक्षिण द्वीप कलाकी
मेखला—समुद्ररशना—है । इस तरह इस अकेले “सिन्धु”
शब्दके उच्चार-मात्रसे हमारे देशकी चतुःसीमा निर्दिष्ट हो जाती
है । यदि हम इस दन्तकथाको न भी मानें कि पूर्ववाहिनी ब्रह्मपुत्रा
इसी सिन्धुकी शाखा है और इस प्रकार सिन्धु ही हिमाचलके
पश्चिम और पूर्व दोनों उतारोंपर प्रवाहित होती है और इसलिये
हमारी पश्चिम सीमाकी तरह पूर्व सीमा भी सिन्धु ही है—यदि
इस बातको हम न भी मानें—तौभी इसमें कोई संदेह नहीं कि
उत्तर और पश्चिम ओरसे इसी नदीने इस देशको घेरा है और
इसलिये सिन्धुस्थान कहनेसे, सिन्धु-नदीसे सिन्धु (समुद्र)
पर्यन्त हमारी मातृ-भूमिकी सम्पूर्ण प्रतिमा हमारे नेत्रोंके सामने
आ जाती है ।
पर कोई यह न समझे कि “सिन्धु” नाम केवल भौगोलिक सुबीता
देखकर ही ग्रहण किया गया । इस शब्दसे जो भावना उत्पन्न
होती थी, वह केवल भौगोलिक नहीं बल्कि राष्ट्रीय थी । सिन्धुस्थान
केवल एक भूखण्डका ही नाम नहीं था बल्कि एक राष्ट्र था ।
सिन्धुस्थानमें जिस संस्कृतिका प्रचार था, वह “सिन्धु” थी और
सिन्धुस्थानके अधिवासी भी वैदिक कालसे ही “सिन्धु” थे ।
सिन्धुस्थान “राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम्” था और इसके परे विदेशियों-

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३३
का म्लेच्छस्थान था। सिन्धुस्थानकी यह परिभाषा किसी
पौराणिक लेखकके शब्दोंके बालकी खाल खींचकर या धार्मिक
उन्मादसे नहीं की गयी है। भविष्यपुराणान्तर्गत उक्त श्लोकोंमें
"आर्य" शब्दका अर्थ ही उन सब लोगोंसे है जो सिन्धुके इस पार
एक राष्ट्र और एक जातिके अखण्ड अङ्ग हो गये थे—वैदिक-
अवैदिक, ब्राह्मण-चांडाल, सबका उसमें समावेश था और सब-
की एक संस्कृति थी, सबको एक जाति थी, एक देश था, एक
राजनीति थी; "म्लेच्छ" शब्द "सिन्धुस्थान" के मुकाबले विदे-
शियोंका बोधक है जिनका राष्ट्र और जाति भिन्न है—धर्म चाहे
एक हो या भिन्न हो ।
यह राजाज्ञा, सिन्धुस्थानकी अन्य राजाज्ञाओंके समान,
सब लोगोंके ही विचार और उद्योगका फल था। यदि ऐसा न
हो तो अटक स्थानको लोग जो परंपरासे अपने देशका सीमान्त
या "अटक" मानते आये इसका कारण क्या है ? कारण यही
है कि ऐसी ही राष्ट्रीय भावना थी कि यह सिन्धुओंके देशकी
सीमा और विदेशियोंकी गतिकी अटक है। सब लोग—राजा-
रंक—जो अबतक यही मानते चले आये हैं इसीसे यह मालूम
होता है कि इस तरहकी कोई राजाज्ञा निकली होगी और
उसमें हमारे देशकी सीमा "सिन्धु" और हमारे देश और
राष्ट्रका नाम सिन्धुस्थान घोषित किया गया होगा। और इस
राजाज्ञा तथा सर्वजनेच्छाका सबसे श्रेष्ठ धार्म्मिक संस्कार भी
कराया गया होगा जिससे हमारे देशका प्राचीन वैदिक नाम

३४ हिन्दुत्व
फिरसे स्थापित करनेका प्रयत्न पूर्ण सफल हुआ । अवश्य ही, इन
सिन्धु और सिन्धुस्थान नामका हमारे देश और राष्ट्रपर ऐसा
प्रभाव कि हमारे राष्ट्रका संपूर्ण विचार उस नामसे रंग जाय
और राष्ट्र उसे अपनी चिररक्षित संपत्ति समझे — पूर्ण
रूपसे स्थापित होनेमें कई शताब्दियां लगी होंगी। और आज हम
यह देखते हैं कि “आर्यावर्त” और “भारतवर्ष” इन नामोंका
अर्थ बहुतोंको नहीं मालूम है, पर प्रत्येक मनुष्य — अदनासे
अदना मनुष्य यह जानता है कि हिन्दू हमारा नाम है और हिन्दु-
स्थान हमारा देश है।*
❄ भविष्य पुराणसे जो श्लोक ऊपर दिये गये हैं वे पूर्ण विश्वसनीय
प्रतीत होते हैं; कारण एक तो उनमें परंपरासे सुनी हुई बातका ही उल्लेख
किया गया है; दूसरे हमारे इतिहासकी सामान्य गतिसे भी यही अनुमान
होता है कि उन श्लोकोंमें वर्णित घटनाएं अवश्य हुई होंगी; तीसरे हमें जो
बात यहां दिखलानी है उसके लिये यह कोई बात नहीं है कि उल्लिखित
राजाज्ञाकी तिथि अथवा वह राजाज्ञा निकालनेवाले राजाका नाम न मालूम
हो तो काम न चले; और चौथे, ग्रन्थकार जिस बातका वर्णन कर रहा है वह
अटकल-पच्चू नहीं बता रहा है, उसके विषयमें उसका निश्चय है। विक्रमा-
दित्यकी जो वंशावली उसने ग्रन्थके अन्य भागमें दी है वह यहां दी हुई
वंशावलीसे पूरे तौरपर मिलती है। जो ग्रन्थकार यह वंशावली जानता है वह
उस वंशके प्रमुख राजाओंके चरित्रोंकी मुख्य बातें भी अवश्य जानता
होगा।
और फिर हमारे इतिहासके मुख्य साधन भी तो ये ही परंपरासे सुनी हुई
बातें हैं जो हमारे पुराणोंमें, रामायण और महाभारतमें तथा अन्य प्राचीन
ग्रन्थोंमें ग्रथित हैं। इन बातोंके ब्यौरेपर भले ही कोई संदेह करे, उसकी
तिथियां निश्चित करे या गलत बता दे पर ब्यौरेकी इन त्रुटियोंसे अथवा
आलंकारिक वर्णनोंसे घबराकर हम इन ग्रन्थोंमें वर्णित बातोंको निर्माल्यवत्

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३५
अब इस “हिन्दू” नामके इतिहासकी और बातें लिखनेके
पूर्व हम अपने ही चित्तके समाधानके लिये कुछ निवेदन करना
चाहते हैं। इस परिच्छेदको लिखते हुए हमने अपने ही हृदयको
चोट पहुंचाई है। इसलिये हम यह बतलाना चाहते हैं कि भारत-
वर्षने बौद्धमतका किस राजनीतिक संकटको दूर करनेके लिये
परित्याग किया। उसका विवेचन करते हुए हमने कुछ कठोर शब्दों-
का प्रयोग किया है पर उनसे कोई यह न समझे कि बौद्ध नामके
विषयमें हमारे हृदयमें बहुत आदर नहीं है। नहीं, नहीं, उस महान्
और पवित्र संघके हम भी वैसे ही श्रद्धालु और उपासक हैं जैसे
कोई बौद्धमतानुयायी हो। संसारमें सबसे पवित्र संघ बौद्धसंघ
है। हमने इस संघकी दीक्षा नहीं ली, इसलिये नहीं कि संघको
हम अपने सम्मिलित होने योग्य न समझते हों; बल्कि इसलिये
कि उस दिव्य मन्दिरकी सीढियोंपर पैर रखनेके हम योग्य
परित्याग नहीं कर सकते; क्योंकि मानव-जातिके प्राचीन कार्यकलापके ये
ही तो वर्णन हैं। विशेष करके उन बातोंको छोड़ देनेका तो कोई कारण नहीं
है जो असंभव या अस्वाभाविक कोटिकी नहीं हैं और जो ऐसी घटनाएँ
है जो अन्य प्रकारसे भी प्रमाणित होती हैं। पुराणोंमें जो कुछ लिखा है वह
सब मिथ्या है जबतक उसकी सत्यता किसी विदेशी प्रमाणसे सिद्ध न हो,
यह जो कुछ लोगोंका ख्याल हो गया है वह बिलकुल वाहियात है। ठीक
रास्ता तो यह है कि इन पुराण ग्रन्थोंमें जो घटनाएँ वर्णित हैं उन्हें हम
सत्य मानें, वे सत्य ही हैं जबतक उनके विरुद्ध कोई ऐसा प्रमाण नहीं मिलता
जो पूर्ण विश्वसनीय हो। केवल किसीके तर्कके भरोसेपर पुराणोंकी बातें झूठ
कह देना कोई युक्तिसंगत बात नहीं है। भविष्य पुराणका ही उदाहरण
लीजिये, क्योंकि इसमें कुछ त्रुटियां और असम्भवसी बातें हैं। और क्या

३६ हिन्दुत्व
नहीं हैं। चट्टानोंपर उठे हुए राजमहलोंकी अपेक्षा बुद्धिगत सिद्धा-
न्तोंपर उठा हुआ यह मन्दिर अधिक दीर्घजीवी है। मनुष्यके
अंदर जो स्वाभाविक पाशविक वृत्ति है उससे मनुष्यको स्वतंत्र
करनेका महान् और बहुत कुछ सफल उद्योग उन अर्हतों और
भिक्षुओंने ही सर्वप्रथम किया जो भारतवर्षमें उत्पन्न हुए, जो
भारतवर्षमें ही पले और जो भारतवर्षको ही अपनी धर्मभूमि
समझते थे। इस बातका ख्याल हमें है और इससे हमारे हृदयमें
जो भाव उठते हैं उन्हें हम शब्दों द्वारा नहीं व्यक्त कर सकते।
जब संघके बारेमें हमारे हृदयमें ये भाव हैं तब उस संघके संस्था-
पक भगवान बुद्धदेवके संबन्धमें हम कह ही क्या सकते हैं? हम
क्षुद्रसे क्षुद्र मनुष्य हैं। तथागत! हम अज्ञ हैं, हम कुछ भी
प्लटार्क ऐसी बातोंसे खाली है ? भविष्यपुराणमें सिकंदरशाहके जन्मकी
कथाका अस्वाभाविक वर्णन है। इसलिये क्या यह मानना होगा कि
सिकंदरशाह कोई आदमी ही नहीं हुआ ? यां ये बातें बिलकुल मिथ्या है
कि चन्द्रगुप्तने सेल्युकसकी कन्यासे विवाह किया जैसा कि भविष्यपुराणके
इस श्लोकमें वर्णित है ?—
चन्द्रगुप्तस्तस्य सुतः पौरस्त्याधिपतेः सुताम् ।
सुलवस्य तथोद्वाह्य यावनों बाद्धतत्पर : (?) ॥
सच बात तो यह है कि इन पुराण ग्रन्थोंका हमारे ऊपर बड़ा भारी ऋण
है जो इन्होंने हमारी जातिके पराक्रमोंकी बातें ऐसे ऐसे विप्लवोंसे सुरक्षित
रखी हैं जिन विप्लवोंने अन्य देशोंमें तो समूचे राष्ट्रों और उनकी सभ्यताके
नामतकको मिटा दिया है। हम तो यह कहते हैं कि पाश्चात्य विद्वानोंके
जिन आधुनिक "पुराणों" ने यह आविष्कार किया है कि रामायण ग्रन्थ
तो विजयनगर राज्यकी स्थापनाका ही गीत है अथवा गौतमबुद्धका वर्णन
तो सूर्योदयका ही रूपक है उनकी अपेक्षा हमारे ये प्राचीन पुराण और इति-
हास अधिक सच्चे, अधिक दुरुस्त और अधिक विश्वसनीय हैं।

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३७
नहीं जानते। यही भाव है जिससे हम आपकी पूजा करते हैं।
आपके शब्दोंका अभिप्राय हृदयंगम करनेमें हम असमर्थ हैं, पर
हम यह जानते हैं कि आप जो कहते हैं वही सत्य है; कारण
आपके शब्द ईश्वरके मुखसे निकले हुए हैं, और हमारे शब्द इस
जड़ जगतके कोलाहलके हैं। शायद आपने इस धरातलपर
अवतीर्ण होकर अपना झंडा फहरानेमें बहुत जल्दी की; क्योंकि
संसार अभी बच्चा है ! आपकी बातको वह नहीं समझता और
आपके प्रकाशसे उसकी आंखें चकाचौंध हो जाती हैं-वह आपके
उपदेशको पूर्णरूपमें अपनी दृष्टिके सामने नहीं रख सकता । जब-
तक संसारमें प्राणियोंके परस्पर व्यवहारका यही नियम चलता
है कि—
चलानामचला भक्ष्या दंष्ट्रिणामप्यदंष्ट्रिणः ।
अहस्तानां सहस्ताश्च शूराणां चैव भीरवः ॥ (मनु)
और यह इतना प्रत्यक्ष है कि आकाशमें चमकनेवाले नक्षत्रोंके
समान साधुताके मनोहर उपदेशोंके सुन्दर दृश्योंसे उसका अस्ति-
त्व कोई अस्वीकार नहीं कर सकता, तबतक राष्ट्रीयताका झंडा
विश्वबन्धुत्वकी वेदीपर बलि नहीं दिया जा सकता । देवीदेवता-
ओंने भी इस झंडेकी पूजा की है। शाक्यसिंह भी इस झंडेके नीचे
न लाये जाते तो इसके गौरवमें उतनी ही हीनता रह जाती। परन्तु
हे तथागत ! आप हमारे हैं जैसे श्रीरामचन्द्र या श्रीकृष्णचन्द्र
अथवा श्रीमहावीर हमारे हैं; और आपके शब्द हमारी ही राष्ट्रीय
आत्माकी भावनाओंकी प्रतिध्वनि हैं, आपके दिव्यलोकदर्शन

३८ हिन्दुत्व
हमारे ही स्वप्न हैं और यदि इस मृत्युलोकमें कभी साधुताका
ही नियम चला तो हे तथागत ! आप देखेंगे कि जिस भूमिके
पालनेमें आप पले, जिस जातिने आपको दूध पिलाया वही उस
नियमको सिद्ध करनेमें सबके आगे रहेगी। यह बात इसके पूर्व
भी सिद्ध हो चुकी है।
( ४ )
“हिन्दवानेकी ढाल”
यहां तक हमने संस्कृत ग्रन्थोंके आधारपर सिन्धु शब्दकी
उत्पत्तिका पता चलाया और इस बाततक पहुँचे कि भारतीय
राष्ट्रकी कल्पना ज्यों-ज्यों व्यापक हुई त्यों-त्यों अन्य सब शब्दों
की अपेक्षा सिन्धुस्थान शब्द उस कल्पनाका अधिक द्योतक
हुआ। आर्यावर्त आदि शब्दोंके समान यह शब्द संप्रदाय विशेष
की ही संज्ञा नहीं है; उदाहरणार्थ, एक ग्रन्थकारने आर्यावर्तकी
परिभाषा यों दी है—
चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततः परम् ॥
यह परिभाषा है तो ठीक, पर यह स्थायी होनेवाली नहीं है।
कोई संस्था या संप्रदाय समाजके लिये होता है न कि समाज
उस 'स्था या संप्रदायके लिये । “चातुर्वर्ण्यव्यवस्थानं” रह भी
सकता है अथवा अपना काम पूरा करके नष्ट भी हो सकता ;
पर उससे हमारा देश “म्लेच्छदेश”—विदेशियोंका देश—नहीं
जायगा। संन्यासी, आर्यसमाजी, सिख तथा और भी कई संप्रदाय

हिन्दुवानेकी ढाल ३६
चातुर्वर्ण्यव्यवस्था नहीं मानते पर इससे क्या वे म्लेच्छ या विदेशी
हो गये ? ईश्वर न करे ऐसा हो ! उनका और हमारा रक्त एक है,
जाति एक है, देश एक है, और ईश्वर तो एक है ही । इसकी
अपेक्षा अच्छी परिभाषा तो यही है कि
“तं वर्षं भारतं नाम भारती यत्र संततिः ॥”
हम हिन्दू सब एक हैं, एक ही जाति हैं, क्योंकि सबका रक्त
एक है—सब भारती संतति हैं।
इस समयके इतिहासमें, बौद्धमतके उत्थान और पतनके साथ
साथ भारतमें प्राकृत भाषाओंका बड़ी तेजीके साथ प्रचार और
विस्तार हो रहा था और संस्कृत केवल पण्डितोंकी भाषा हो रही थी,
यहां तक कि नवीन कल्पनाओं और नवीन नामोंका संस्कृतीकरण
करना पड़ता था और तब किसी प्रामाणिक ग्रन्थमें उन्हें स्थान
मिलता था । इससे समाजका नित्यनैमित्तिक जीवन प्रचलित
प्राकृतों द्वारा ही प्रकट होता था। फलतः सिन्धु और सिन्धुस्थान
शब्द कहीं कहीं संस्कृत ग्रन्थोंमें मिलते हैं सही, पर संस्कृत ले-
खक भारत शब्दको ही परंपरागत या अधिक प्रौढ़ मानते थे और
उसीका प्रयोग करते थे। इसी प्रकार प्राकृतोंमें देखिये तो 'भारत'
या 'आर्यावर्त' इन प्राचीन और प्रिय नामोंके स्थानमें सर्वत्र हिंदु-
स्थान ( सिन्धुस्थान ), इस प्रचलित और जीवित नामका प्रयोग
किया गया है। यहां यह पिष्टपेषण करनेकी आवश्यकता नहीं कि
संस्कृतका 'स' प्रायः प्राकृतमें 'ह' हो जाता है। इससे हम देखते
हैं, भारतके वर्तमान प्राकृत साहित्यमें सर्वत्र हिन्दुस्थान या

हिन्दुओंका वर्णन है। संस्कृत भाषा हमारी जातिकी परम पवित्र
सम्पत्ति है और वह सदा वैसी ही रहेगी, उससे हमारी जाति
मूलतः एक है यह बात सामने रहेगी, उससे जीवनकी समृद्धिके
साधन प्राप्त होते रहेंगे, उससे हमारे आदर्श उच्च होंगे, हमारा
जीवन पवित्र रहेगा—यह सब होगा; परन्तु हमारी जातिकी प्रच-
लित जीवित भाषा होनेका सम्मान उस प्राकृतको ही प्राप्त हुआ
है जो संस्कृतकी सबसे बड़ी बेटी है और वह हिन्दी या
हिन्दुस्थानी ही कहलाती भी है। प्राचीन सिन्धुओं या हिन्दुओंके
वर्तमान वंशजोंकी राष्ट्रीय और सांस्कृतिक भाषा यही है। हिन्दु-
स्थानी ही हिन्दुस्थानकी भाषा है। हिन्दीको राष्ट्रभाषाके उच्चपद-
पर बैठानेका प्रयत्न नवीन भी नहीं है और कृत्रिम भी नहीं है।
हिन्दुस्थानमें ब्रिटिश राज्य स्थापित होनेकेकई शताब्दियां पूर्व अपने
इतिहास ग्रन्थोंमें हम यह लिखा हुआ पाते हैं कि भारतवर्षभरमें
यही माध्यम भाषा थी। कोई साधु या सौदागर रामेश्वरसे चल-
कर हरद्वारतक जाते हुए इसी भाषाके द्वारा अपनी बात दूसरोंको
समझाता और दूसरोंकी बात स्वयं समझता था। संस्कृत भाषा-
के द्वारा कोई भी पण्डितोंकी सभा और राजाओंके दरबारमें
पहुंच सकता था, परन्तु बाजारसे लेकर राजसभातक सर्वत्र
अनायास पहुंचनेके लिये हिन्दी भाषा ही आम परवाना थी।
नानक, चैतन्य, रामदास देशभरमें वैसी ही स्वच्छन्दताके साथ
भ्रमण करते थे जैसे वे अपने अपने प्रदेशमें करते और सबको
इसी भाषाके द्वारा अपने उपदेश सुनाते थे। हमारी इस वास्त-

[Header] हिन्दवानेकी ढाल ४१

त्रिक राष्ट्रभाषाकी उत्पत्ति और वृद्धि उसी समयसे हुई है जिस
समयसे सिन्धुस्थान या हिन्दुस्थान और सिन्धु या हिन्दू इन
प्राचीन नामोंका पुनः स्थापन और प्रचार हुआ है और इसलिये
स्वभावतः ही जो भाषा संपूर्ण राष्ट्रकी अपनी भाषा थी वह
हिन्दुस्थानो या हिन्दी कहलायी ।
हूणों और शकोंको मार भगानेके पश्चात् सिन्धुस्थानके क्षात्र-
बलकी बदौलत कई शताब्दियोंतक यहां शान्ति विराजती रही
और एक बार फिर हिन्दुस्थानने सुख और समृद्धिका बड़ा
जमाना देखा । स्वाधीनताका सुख राजा और रङ्क सभीको समा-
नरूपसे प्राप्त हुआ। देशभक्तग्रन्थकारोंने हमारे इतिहासके इस बड़े
भारी अध्यायमें सहस्राधिक वर्षव्यापी तत्कालीन गौरव और सुखा-
नुभवका देशाभिमानसे मस्त होकर इस प्रकार वर्णन किया है—
ग्रामे ग्रामे स्थितो देवः देशे देशे स्थितो मखः ।
गेहे गेहे स्थितं द्रव्यं धर्मश्चैव जने जने ॥
( भविष्यपुराण प्रतिसर्ग पर्व )
सिंहलद्वीपसे काश्मीरपर्यन्त एक ही राजवंशके राजपूतोंका
राज्य था और सब राजा परस्परमे विवाह-बन्धनसे बंधे थे;
इससे भी अधिक सबकी संस्कृति, धर्म और पूर्व-परंपरा एक थी,
समस्त राष्ट्रका जीवन एकरस था। वह जितना समृद्ध था उत-
नाही पवित्र था। और सबकी एक राष्ट्रभाषा थी। राष्ट्रभाषाकी
यह एकता हमारे राष्ट्रीय जीवनकी आन्तरिक एकताका ही
बाह्य रूप था।

४२ हिन्दुत्व
परन्तु इतिहासमें यह प्रायः देखा जाता है कि अकंटक सुख
और समृद्धिसे गफलत आ जाती है और राष्ट्रको स्वप्न देखते हुए
पड़े रहनेका अभ्याससा हो जाता है। सिन्धुस्थानकी यही गति
हुई । सिन्धुराष्ट्र स्वप्न देखता रहा। अन्तको महम्मद गजनवी
सिन्धुस्थानकी सीमा-रेखा सिन्धु नदी पार करके सिन्धुस्थानपर
चढ़ आया। तब आंखें मलता हुआ हिन्दुस्थान जागा। जीवन-
मरणका संग्राम उस दिन आरम्भ हुआ। आत्म-चैतन्य अना-
त्मके साथ युद्ध करनेसे ही बहुत अच्छी तरहसे प्रकट होता है।
समस्त राष्ट्रको एक करनेकी शक्ति जितनी समान शत्रुके आक्रम-
णके दृश्यमें है उतनी और किसीमें नहीं। द्वेष परस्परको बिल-
गाता और एक भी करता है। हिन्दुस्थानके अखंड, अभेद्य और
एक होनेका वह उत्तम अवसर था जब वह दुर्द्दिन उपस्थित हुआ
कि उस मूर्ति-भंजक म्लेच्छने सिन्धुको पार किया। कासिमकी
मुसलमान सेनाने भी सिन्धुको पार किया था, पर उसकी
चोट गहरी नहीं थी, उससे हृदयमें घाव नहीं हुआ, हृदयपर उसने
वार भी नहीं किया। सच्चा संग्राम तो महम्मद गजनवीके साथ ही
आरम्भ हुआ—(और समाप्त कब हुआ ?—अब्दालीके साथ ?)
वर्षानुवर्ष बीत चले, शताब्दियां उलट गयीं और संग्राम जारी
रहा। अरब-स्थान जो कुछ था वह नहीं रहा, ईरान नष्ट हो
गया; मिश्र, शाम, अफगानिस्तान, बलूचिस्तान, तारतरी-ग्रना-
डासे गजनी तक—सब राष्ट्र अपनी संस्कृतिके साथ इस्लामके
खड्गके सामने ढेर हो गये। परन्तु हिन्दुस्थानमें उस खड्गने वार तो
किया पर वह उसे मार न सका। प्रत्येक वारके साथ उस खड्गकी

हिन्दवानेकी ढाल ४३
धार कुन्द होती गयी। प्रत्येक चोट पहलेसे अधिक गहरी हुई,
पर फिरसे वार करनेके लिये खड्ग उस जखमसे निकालकर ज्योंही
ऊपर उठाया जाता त्योंही घाव भर जाता। वार करनेवालेकी
जीवनी शक्तिसे वार सहनेवालेकी जीवनी शक्ति अधिक प्रमा-
णित हुई। संग्राम बराबरीवालोंमें नहीं था। किसी एक जाति
या राष्ट्रके साथ हिन्दुस्थानको नहीं लड़ना पड़ रहा था। प्रायः
समस्त एशिया आक्रमणकारी सेनाके पीछे खड़ा था और
उसके पीछे लगभग सारा यूरोप था। अरबोंने सिन्धमें
प्रवेश किया। अकेले वे इससे अधिक और कर ही क्या सकते
थे ! कुछ कालके बाद वे अपने ही देशकी स्वाधीनताकी
रक्षा नहीं कर सके और इसके बाद अरब जातिका नाम भी नहीं
सुना गया। परन्तु यहां अकेले हिन्दुस्थानको अरबों, ईरानियों,
पठानों, बलूचियों, तारतरों, तुर्कों और मुगलोंका सामना करना
पड़ा—सहारेके रेगिस्तानने मानों मानवी सेनाका रूप धारण
किया था और उसमें अकेले फंसे हुए हिन्दुस्थानपर सारी दुनि-
याका तूफान उठा था ! "धर्म" में गति देनेकी बड़ी भारी शक्ति
है। लूटमारमें भी ऐसी ही शक्ति है। परन्तु जहां धर्मपर लूटमार-
का अंकुश रहता है और धर्मके नामपर लूटमार होती है वहां इन
दोनोंके संयोगकी शक्ति बड़ी ही भयानक होती है और उसका
परिणाम भी वैसा ही भयानक होता है—जहांतहां हाहाकार मच
जाता है। स्वर्ग और नरक दोनों एक हो गये थे और बड़ा ही
भयानक रूप धारण कर महम्मदने सिन्धुको पार कर हिंदुस्थानपर

४४ हिन्दुत्व
अकस्मात् आक्रमण किया। उस दिनसे जो संग्राम आरम्भ हुआ
वह कई शताब्दियोंतक जारी रहा और हिन्दुस्थान अकेला लड़ता
रहा—युद्ध नैतिक क्षेत्रमें भी था और रणक्षेत्रमें भी। नैतिक क्षेत्रमें
जो संपत्ति मुसलमानोंकी छिन गयी उसे लौटा लानेके लिये औरं-
गजेबने पागलपनका उद्योग आरम्भ किया। उससे रणक्षेत्रमें भी
उनकी हार होनेका दिन और भी निकट आ गया। अन्तको भाऊ-
साहेबने मुगलोंकी राजधानीका छत्र भङ्गकर उसके टुकड़े टुकड़े
कर डाले, पानीपतका दिन उदय हुआ, हिन्दू उस खास लड़ाईमें
हारे, पर दीर्घ कालसे चले आये हुए संग्राममें जीते। फिर किसी
पठानने दिल्लीपर आक्रमण करनेकी हिम्मत नहीं की। हिन्दुओंकी
जो विजय वैजयंती मराठोंने अटकमें फहरायी उसे हमारे सिख
और आगे बढ़कर सिन्धु पार करके काबुलके तटपर फहरा आये।
इस दीर्घकालीन संग्राममें हिन्दुओंको इस बातकी पूरी पह-
चान हुई कि हम हिन्दू हैं और यह हिन्दूराष्ट्र ऐसा अखंड बन
गया कि इसके पूर्व ऐसी अखंडता नहीं देखनेमें आयी थी। यह
स्मरण रहे कि हम समग्र हिन्दूजातिकी बात कह रहे हैं, किसी
खास संप्रदाय या पंथकी नहीं। सनातनी, सतनामी, सिख, आर्य,
अनार्य, मराठे, मद्रासी, ब्राह्मण और पंचम—सब हिन्दूके नाते हारे
और हिन्दूके नाते जीते। क्या मित्र और क्या शत्रु—दोनों, और
सब नामोंको दबाकर हिन्दू और हिन्दुस्थान—इन नामोंको बढ़ानेमें
सहायक हुए। आर्यावर्त और दक्षिणापथ, जंबुद्वीप और भारत-
वर्ष—इन नामोंमें हिन्दुओंकी उस राजनीतिक और सांस्कृतिक

हिन्दवानेकी ढाल [४५]


अखंडताकी भावनाको व्यक्त करनेका वैसा सामर्थ्य नहीं था जैसा
कि “हिन्दुस्थान” नाममें। सिन्धुके इस पार रहनेवाले सब लोग
जो सिन्धुनदीसे सिन्धु-समुद्रपर्यन्त अपनी जन्मभूमि मानते थे, इस
एक “हिन्दुस्थान” नाममें अपना अस्तित्व अनुभव करते थे। हमारे
शत्रु हमें हिन्दू कहकर हमारा तिरस्कार करते थे और हिन्दुस्तान-
की सब जातियां, सब संप्रदाय,सब पंथ,अटकसे कटकपर्यन्तः एक
शरीर,एक मन,एक राष्ट्र हो गये । इस मौकेपर हमसे यह कहे बिना
नहीं रहा जाता कि अबतक सन् १३००से सन् १८०० तक काश्मीरसे
लेकर सिंहलद्वीपतक और सिन्धसे बंगालतक भिन्न भिन्न प्रदेशोंमें
हिन्दुओंके जो उद्योग कभी एक साथ और कभी अलग अलग होते
रहे उनका, सम्पूर्ण हिन्दूजातिके इतिहासकी दृष्टिसे अबतक किसी-
ने विचार ही नहीं किया है । इस कालमें संपूर्ण राष्ट्रके सामने
हिन्दुत्वकी रक्षा,हिन्दूजातिके मान और मर्यादाकी रक्षाका एकसा
प्रश्न था और इसके लिये सैकड़ों रणक्षेत्र बन रहे थे और अन्य
प्रयत्न भी हो रहे थे । यही एक शब्द था—“हिन्दुत्व” जो हमारे
राष्ट्रके मनोमय शरीरके मेरुदंडका काम कर रहा था । इसी
हिन्दुत्वके कारण काश्मीरके ब्राह्मणोंपर होनेवाले अत्याचारोंकी
वेदना मद्रासके नायरोंने नहीं सही जाती थी। हिन्दुओंकी हार
देखकर हमारे भाट रोते थे, हमारे आचार्य हिन्दुओंको बढ़ावा देते
थे, हमारे वीर हिन्दुओंकी लड़ाइयां लड़ते थे, हमारे साधु
महात्मा हिन्दुओंको आशीर्वाद देते थे, हमारे राजनीतिज्ञ
हिन्दुओंके भाग्यका विधान करते थे, हमारी माताएँ हिन्दुओं-

४६ हिन्दुत्व
के घावोंपर विलाप करतीं और हिन्दुओंकी विजयपर गर्व
करतो थीं।
इस संबंधमें उस समयके ग्रन्थकारोंने जो कुछ लिख रखा है
उसके यदि हम अवतरण दें तो एक बड़ा ग्रन्थ बन जायगा।
यह काम तो बड़ा प्रिय है पर जो बात यहां सिद्ध करनी है उसके
लिये इसकी आवश्यकता नहीं। इसलिये यहां उस कालके श्रेष्ठ
पुरुषोंके मुखसे या लेखनीसे निकले हुए वर्णनोंके कुछ अवतरणों-
से ही हमें संतोष करना चाहिये।
हिन्दी भाषामें जितने नये पुराने ग्रन्थ हैं उनमें चन्दबरदाई-
कृत “पृथ्वीराज रासो” नामक महाकाव्य सबसे प्राचीन प्रामा-
णिक ग्रन्थ है। इसमें एक ही पद्य ऐसा है जो इस ग्रन्थकी रच-
नासे भी पहलेका है। परन्तु आश्चर्य और आनन्दका विषय
यह है कि हमारे उत्तरापथके प्राकृत साहित्यकी इस सबसे
प्राचीन कवितामें हिन्दुस्थानकी पूर्ण देशाभिमानयुक्त और गौरव-
सूचक स्तुति है। चन्दबरदाईके पिता, वेन कवि, पृथ्वीराजके पिता
अजमेर-महाराजको संबोधन कर कहते हैं—
अटल ठाट महिपाट, अटल तारागढ़ थानं ।
अटल नग्र अजमेर, अटल हिन्दव अस्थानं ॥
अटल तेज परताप, अटल लंका गढ़ डंडिय ।
अटल आप चहुवान, अटल भूमि जस मंडिय ॥
संभरी भूप सोमेसनृप, अटल छत्र ओपै सुसर ।
कविराज वेन आसीस दे, अटल जगां रजेस कर ॥

हिन्दवानेको ढाल ४७
चन्दबरदाई हिन्दी-साहित्यके अदि कवि माने जाते हैं और
इन्होंने हिन्दु, हिंदवान, हिन्द—इन शब्दोंका इतनी बार और इतनी
स्वाभाविकताके साथ प्रयोग किया है कि इस विषयमें कोई
सन्देह ही नहीं रह जाता कि ११ वीं शताब्दीमें ये शब्द सर्व-
साधारणमें प्रचलित थे । यह वह समय है, जब पंजाबमें भी
मुसलमानोंके पैर नहीं जमे थे और यह सम्भव नहीं है कि वे इस
समयके स्वाधीन और स्वाभिमानी राजपूतोंसे कोई ऐसा नाम
स्वीकार करा सकते, जो उनके प्रति घृणा सूचित करनेके लिये
उनके शत्रुओने रखा हो, और न यह संभव है कि ऐसा नाम ये
राजपूत गौरव और अभिमानके साथ अपना लेते । शहाबुद्दीनको
जिस समय हिन्दुओंने कैद किया और पृथ्वीराजने उससे यह शर्त
करा कर कि फिर कभी “हिन्दुओंपर आक्रमण नहीं करेंगे”, उसे
छोड़ दिया, उस समयका वर्णन करते हुए चन्द कहते हैं—
“राखि पंच दिन साहि अदब आदर बहु किन्नौ।
सुज हुसैन गाजी सुपूत हथ्थे ग्रहि दिन्नौ ॥
किय सलाम तिन बार जाहु अपन्ने सुथानह ।
मति हिन्दुपर साहि सज्जि आऔ स्वस्थानह ॥”
(पृ० रासो स० ६)
पर शहाबुद्दीन ऐसा आदमी नहीं था जो हिन्दुओंकी वीरो-
चित उदारताका कृतज्ञ होता । बार बार फौज जमा करके वार
वार उसने अपने उपकारीके साथ जंग छेड़ा—
"जब हिन्दु दल जोर हुअ छुट्टि मीरधर भ्रम ।

४८ हिन्दुत्व
असमय अरबस्तान चला करन उद्दूसा क्रम ॥”
और फिर—
“जुरे हिन्दु मीरे, बहे खग्ग तारं ।
मुखे मार मारं बहे सूरसारं ॥”
अन्तको—
“हिन्दु म्लेच्छ अघाइ घाइन ।
नंचि नारद युद्ध चायन ॥”
पर हिन्दुओंको कुचलनेका इतना प्रयत्न करके भी शहाबुद्दीन-
से कुछ न बन पड़ा और दिल्लीमें जब यह समाचार पहुँचा कि
शहाबुद्दीन फिर कैद किया गया तब प्रजाके आनन्दका पारावार
न रहा । प्रजाने पृथ्वीराजको प्रेम और आनन्दसे बधाई दी—
“आज भाग चहुआन घर ।
आज भाग हिन्दवान ॥
इन जीवित दिल्लीश्वर ।
गंज न सकै आन ॥”
शहाबुद्दीनने फिर प्रतिज्ञा की कि अब ऐसा नहीं करूँ गा । पहली
सब प्रतिज्ञाएं वह भंग कर चुका था । फिर इस प्रतिज्ञाने उसे
रिहाई दिला दी । पर कृतघ्न शहाबुद्दीनने फिर हिन्दुस्थानपर
आक्रमण किया । और ऐसी तैयारी और जोरके साथ आक्रमण
किया कि बातकी बातमें दिल्लीके द्वारपर पहुँच गया । हिन्दपति
पृथ्वीराजने युद्धसभा निमंत्रित की, शहाबुद्दीनने गुस्ताखीके
साथ हिन्दपतिको ललकारा, सब रावल और सामन्तोंकी आँखोंसे

हिन्दूवानका ढाल ४६
आगकी चिनगारियां निकलने लगीं, शहाबुद्दीनकी ललकार सुनाने-
के लिये जो यवनदूत दरबारमें आया था उससे चामुण्डरायने कहा
कि, “शाहको याद दिलाओ कि हमारे ही सामने तुमने अपनी नाक
रगड़ी थी, अब बेहया होकर चढ़ाई करने आये हो !” चामुण्डराय
फिर बोले—
“निर्लज्ज म्लेच्छ लजै नहीं । हम हिन्दू लजवान ॥”
दुःखका दिन समीप आया । दोनों ओरके लोग जानते थे कि
यह भाग्यका खेल है । न जाने कौन हारेगा और कौन जीतेगा ।
हम्मीरकी हारके कुछ ही पहले चन्द बरदाई भगवती दुर्गाकी
स्तुति करते हैं—कैसी हृदयद्रावक और देशभक्ति पूर्ण स्तुति है--
“तू गे हिन्दुराजान वन्दी न आर्यं ।
जपै जाप जालंधरं तूं सहायं ॥
नमस्ते नमस्ते इ जालंधररानी !
सुरं आसुरं नागपूजा प्रमानी ॥”
चन्दने फिर युद्धका जो कुछ परिणाम हुआ उसका वर्णन
करके उस प्रसंगका वर्णन किया है जब कौशल रचकर पृथ्वी-
राजने शहाबुद्दीनका सिर धड़से उतार लिया । अन्तमें विजित
हिन्दपति पृथ्वीराजकी इस प्रकार मर्मस्पर्शी शब्दोंमें स्तुति की--
“धनि हिन्दु पृथिराज, जिने रजवट्ठ उजारिय ।
धनि हिन्दु पृथिराज, बाले कलिमझूझ उजारिय ॥
धनि हिन्दु पृथिराज, जेन सुविहान ह संध्यो ।
बार बारह ग्रहि मुक्कि, अन्तकाल सर बन्ध्यो ॥”

५० हिन्दुत्व


यह ध्यानमें रखनेकी बात है कि रासोमें बार बार "भारत"
शब्द आया है पर वह "महाभारत" के अर्थमें आया है। भारत-
वर्षके अर्थमें शायद ही कहीं आया हो । यही बात इसके बादके
साहित्यमें भी देखते हैं। हिन्दुओंका फिरसे उत्थान होने और
हिन्दू-स्वातंत्र्यका युद्ध आरम्भ होनेके पूर्वतक संपूर्ण साहित्यमें
"हिन्दु और हिन्दुस्थान" इन नामोंकी ही सर्वत्र महिमा गायी
गयी है। हिन्दू-स्वातन्त्र्य-युद्धके महोपदेशक और आचार्य समर्थ
रामदास स्वामी अपनी अलौकिक उक्तियोंमें एक स्थानपर उस
दिव्य दृश्यका वर्णन करते हैं जिसे उन्होंने स्वप्नमें देखा था और
जिसे वे विजयोत्साहके साथ कृतज्ञतापूर्वक कहते हैं कि, अधि-
कांशमें सिद्ध हो गया है—
* स्वप्नें जें देखिलें रात्रीं, तें तें तैसेंचि होतसे ।
हिंडतां फिरतां गेलों, आनन्दवनभुवनीं ॥ १॥
बुडाले सर्व ही पापी, हिन्दुस्थान बलावलेँ ।
अभक्तांचा क्षयो झाला, आनन्दवनभूवनीं ॥२॥
कल्पांत मांडिला मोठा, म्लेच्छ दै त्य बुडावया ।
कैपक्ष घेतला देवीं, आनन्दवनभूवनीं ॥ ३ ॥

※ “रातको स्वप्न देखा, ठीक वही सब हो रहा है। घूमते फिरते
आनन्दवन भवनमें गये। देखा सब पापियोंका नाश हो गया है, हिन्दुस्थान
सबसे बलवान हुआ है; अभक्तोंका क्षय हो गया है और पापियोंका नाश
करनेके लिये, प्रलयंकारो प्रचंड उद्योग हो रहा है, देवता हमारे साथ हैं।
यहांसे राजधर्मके साथ साथ धर्मका अभ्युत्थान हो रहा है; सबको इससे
बड़ा संतोष है। औरंग डूबा। शत्रुओंका संहार हुआ। अष्ट छत्र फिरसे
प्रतिष्ठित हुए । बोलनेमें दोष है, करके दिखाना चाहिये; आगे जो कुछ हो,
वही सत्य है। स्नान-सांध्या, जप-तप. अनुष्ठानके लिये अब जलकी कोई
कमी नहीं है। जो कुछ स्मरण हुआ, वही लिखा । भगवान प्रत्यक्ष हैं।
राम ही कर्त्ता और राम ही भोक्ता हैं।”