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हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)

Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar

स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा

DevanagariHindipublished167 पृष्ठ

१२ हिन्दुत्व
जाती है। जिस विशाल एकीभवनके उद्योगमें सिन्धुसे समुद्र
पर्यन्त इस संपूर्ण महादेशका समावेश हुआ था और इसे एक
राष्ट्र बना देनेका जिसका लक्ष्य था, उसके लिये "आर्यावर्त"
और "ब्रह्मावर्त" पूर्ण बोधक नाम नहीं थे। प्राचीन ग्रन्थकारोंके
लेखानुसार आर्यावर्त वह देश था जो हिमालय और विन्ध्याके
बीचमें था—"आर्यावर्तः पुण्यभूमिर्मध्यं विन्ध्यहिमालयोः" जिस
अवस्थामें यह नामकरण हुआ उस अवस्थामें यह ठीक भी था;
परन्तु जब आर्यावर्तवासिनी आर्य-जातिने आर्य और अनार्य
दोनोंको मिलाकर एक राष्ट्र निर्माण कर दिया और नतशिखर
विन्ध्याद्रीके भी पार दूर दूरतक अपनी संस्कृतिका प्रचार कर
लिया, तब ऐसी जातिके लिये यह नाम बहुत ही अपूर्ण था।
आवश्यकता थी एक ऐसे नामकी जो भारतीय राष्ट्रकी व्यापक
भावनाका बोधक हो। अत्यधिक रूपमें यह प्रयोजन तब सिद्ध
हुआ जब भरत-वंशका समस्त पृथिवीपर राज हुआ। यह भरत
कौन थे—यह वैदिक थे या जैन थे—अथवा यह कब हुए
इत्यादि बातोंके संबन्धमें कल्पना-सागरमें गोते लगाना छोड़
इतना ही जानना हमारे लिये यहाँ पर्याप्त होगा कि आर्यावर्त
और दक्षिणापथके लोगोंने अपनी मातृभूमिका यह नाम केवल
स्वीकार ही नहीं किया, प्रत्युत इस नामसे अपनी मातृभूमि और
अपनी संस्कृतिके साम्राज्यको पुकारनेमें उन्हें स्नेहपूर्ण आनंद
आता था। ज्यों-ज्यों दक्षिणकी ओर अन्तरिक्षका पट खुल गया,
त्यों-त्यों हम देखते हैं कि जातिके गुरुत्वाकर्षणका केन्द्र सप्त-

हिन्दू नामकी उत्पत्ति १३
सिन्धुओंके प्रदेशसे हटकर गंगा-तटके प्रदेशमें आ गया और
सप्तसिन्धु, आर्यावर्त, या दक्षिणापथ—ये नाम दब गये तथा उनके
स्थानमें भरतखंड नाम प्रचलित हुआ जो राजनीतिके विचारसे
बड़ा ही भव्य नाम था और जिसमें आसेतु हिमाचल समस्त देश-
का अन्तर्भाव होता था। हमारे राष्ट्रकी परिभाषा करनेका जो
प्रयत्न उस समय किया गया है जब राष्ट्रकी यह भव्य भावना
हमारे पूर्वाचार्योंके अन्तःकरणमें उदय हो रही थी, उससे यह
बात स्पष्ट हो जाती है। एक राष्ट्रके नाते हमारी स्थितिकी
जैसी उत्तम व्याख्या विष्णुपुराणमें है, वैसी अन्यत्र कहीं नहीं
मिलती। विष्णुपुराणमें है—
उत्तरंयत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्।
वर्षं तद्भारतं नाम भारती यत्र संततिः॥
परन्तु यह नवीन भारतवर्ष नाम हमारे पालनेका सिन्धु या
हिन्दू नाम बिलकुल ही दबा नहीं सका, न हमसे वह प्रेम ही
भुला सका जो उस महा नदी सिन्धुपर हमारा था, जिसकी
गोदमें बैठकर हमारे पूर्वाचार्यों और पूर्वजोंने उसके स्तनसे
जीवन-रसका पान किया था। सिन्धु-नदीके किनारे-किनारे
हमारे जो सीमा-प्रान्त थे उनका नाम अब भी सिन्धुराष्ट्र रहा।
और संस्कृत-साहित्यमें सर्वत्र “सिन्धुसौवीर” हमारे राष्ट्रके
अन्तर्गत और प्रधान अंगस्वरूप माने गये हैं। महाभारतके
उस महान् भारतीय युद्धमें सिन्धुसौवीरका राजा एक

१४ हिन्दुत्व
प्रधान पुरुष था, और भरतवंशके साथ उसका अति निकट
सम्बन्ध था। सिन्धुराष्ट्रकी चतुःसीमा समय-समयपर बदलती
रही है तो भी मुलतानसे लेकर समुद्रतक जो भाषा वहाँके
लोग बोलते थे और अब भी बोलते हैं उससे वे स्वयं एक
जाति मालूम होते हैं और उनका 'सिन्धी' नाम अबतक यह
स्मरण दिलाता है कि जो लोग यह भाषा बोलते हैं, वे सिन्धु
हैं और हमारे भारतीय राष्ट्रके अन्दर उनका एक विशिष्ट
स्थान है। यद्यपि भरतखंड नामने हमारे राष्ट्रका पालनेका नाम
दबा दिया तथापि विदेशीय राष्ट्रोंने इसकी उपेक्षा ही की और
हमारे सीमा-प्रान्त प्राचीन नामोंसे ही जाने जाते थे; और
हमारे नजदीकी पड़ोसी अवेस्तानुयायी ईरानी, यहूदी, यूनानी
तथा अन्य लोग हमें हमारे प्राचीन सिन्धु या हिन्दु नामसे
ही जानते थे। वे इस नामका उपयोग केवल सिन्धु-नदीके तट
प्रदेशको जनानेके लिये ही नहीं करते थे, बल्कि समस्त देशको
इसी नामसे जनाते थे, जिसमें प्राचीन सिन्धु अन्य जातियोंके
साथ मिलते-मिलाते फैल गये थे। अवेस्तानुयायी ईरानी हमें
हिन्दू जानते और यूनानी कर्कश हकारको त्याग 'इंडो' और
यूरोपियनोंके द्वारा लगभग सारा यूरोप और पीछेसे अमेरिका भी
हमें हिन्दू या इंडियन कहने लगा। जो हुएन संग हमारे साथ
इतने कालतक रहा वह भी हमें "शिन्तु" या "हिन्तु" ही कहता
है। कुछ थोड़े उदाहरणोंको छोड़कर जैसे पारथियन लोग
अफगानिस्तानको श्वेत भारत कहते थे, अन्यथा शायद ही कभी

हिन्दू नामकी उत्पत्ति १५
विदेशियोंने हमारे पालनेका नाम भुलाकर नये नाम “भारत” का
प्रयोग किया हो । आज भी सारा संसार हमें “हिन्दू” और हमारे
देशको “हिन्दुस्थान” ही जानता है, मानो हमारे वैदिक पूर्वजों-
द्वारा स्वीकृत नामकी रक्षा कर रहा है ।
पर नामका तो दस्तूर ही यह है कि जिस किसीका नाम हो
वह उसकी इच्छापर नहीं बल्कि दूसरोंकी इच्छापर निर्भर करता
है । हम अपना चाहे जो नाम रखना पसन्द करें, नाम माना जायगा
वही जो और लोग पसन्द करेंगे । नामका प्रयोजन भी तो यही
है । हम अपने आपको बिना नाम और रूपके जानते ही हैं। पर
जब हमारा सम्बन्ध दूसरोंके साथ होता है, स्नेह-सम्बन्ध हो
या विरोध-सम्बन्ध, तब नामकी जरूरत होती है। इसमें दोका
सम्बन्ध होता है। यदि संसार किसी आचार्यका नाम “अष्टावक्र”
और किसी मसखरेका नाम “मुल्ला दोप्याजा” रखना ही पसन्द
करता है, तो नामवालेकी चाहे जो इच्छा हो, संसारको तो वही
नाम स्मरण रहेगा जो उसने पसन्द किया है । इस तरह संसार
हमारा जो नाम रखता है, वह यदि हमारी रुचिके विरुद्ध न हो
तो ऐसे नामका अन्य सब नामोंको दबा देना बहुत ही अधिक
संभवनीय है । परन्तु यदि संसार ऐसा नाम रखता है, जिससे
हमारा पूर्व गौरव और प्रेम सूचित होता है तो ऐसा नाम
निश्चय ही हमारे अन्य नामोंको भुलाकर बना रह सकता है । यह
बात और इसके साथ वह अवस्था जिसमें बाहरी संसारके साथ
पहले-पहल हमारा सम्बन्ध हुआ और पीछे उसके साथ घोर

१६ हिन्दुत्व
विरोध हुआ, इन दो बातोंसे हमारा हिन्दू नाम फिर एक बार
आगे आया और इतने जोरसे आगे आया कि प्यारा “भरतखंड”
नाम भी उसके पीछे पड़ गया।
( ३ )
“हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान”
यों तो बौद्ध-धर्मका उदय होनेके पूर्व भी हिन्दुस्थानका अन्य
देशोंसे सम्बन्ध था और हिन्दुओंके सार्वभौम उद्योगका इतना
विस्तार हो गया था कि हमारे स्वदेश-भक्त कवि और धर्मशास्त्र-
वक्ता अधिकारके साथ यह कह सकते थे कि—
एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः ।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्व मानवाः ॥ ( मनु )
तथापि यहां जिस बातका हम विचार कर रहे हैं, उसके लिये
बौद्ध-धर्मके उदयके पश्चात् ही भारतके सार्वराष्ट्रीय जीवनका
विचार कर्तव्य है। कारण, इसी समयके लगभग राजनीतिक
उद्योगके विस्तारकी सीमा हो चुकी थी और देशके अन्दर कोई
ऐसा काम बाकी न था जो न किया गया हो; इसलिये
स्वभावतः ही इस उद्योगका स्रोत देशके बाहर भी प्रवाहित होने
लगा और भारतके बाहरके देशोंसे व्यवहार भी खूब बढ़ने
लगा। इसके पूर्व इतने जोरके साथ ऐसा प्रवाह नहीं हुआ था,

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान १७
न विदेशोंसे इतना घनिष्ठ सम्बन्ध ही हुआ था। यही नहीं,
बल्कि बाहर देशवाले भी आ-आकर पहलेसे अधिक उद्दण्डता
और प्रभुताके साथ हमारा द्वार खटखटाने लगे। इस राजनीतिक
परिवर्तनके साथ-साथ बौद्ध-धर्मने भी भारतवर्षको उस समयके
ज्ञात संसारका हृदयस्थान बना दिया। मिश्रसे लेकर मेक्सिको-
तक असंख्य जनसमुदाय सिन्धुस्थानको अपने देवताओं और
देवतुल्य मनुष्योंका वासस्थान मानने लगा। भिन्न-भिन्न देशों-
से सहस्रों यात्री यहाँ आने लगे और सहस्रों विद्वान, उपदेशक,
साधु और सन्त इस देशसे बाहर जाकर नाना देशोंमें विचरण
करने लगे। परन्तु बाहर-देशवाले हमें हमारे “सिन्धु” या “हिन्दू”
इस प्राचीन नामसे ही जानते और पुकारते थे, इसलिये लोगोंका
: यह आना-जाना हमारे राष्ट्रीय नामोंमेंसे इसी नामको सर्व-
प्रधान बनानेमें ही सहायक हुआ। उन भिन्न-भिन्न राज्योंके
: साथ, जो हमें हिन्दू नामसे जानते थे, जो राजनीतिक पत्रव्यव-
हार होता था, उसमें पहले “भरतखण्ड” के साथसाथ “हिन्दु-
स्थान” और पीछे अकेले “हिन्दुस्थान” शब्दका ही प्रयोग होने
लग गया होगा।
बौद्ध-धर्मके उदयसे संसारमें इस नामका इतना प्रचार हो
गया, पर आश्चर्यकी बात यह है कि उस बौद्ध-धर्मके अस्तसे
इस नामका और भी अधिक प्राधान्य हो गया ।
बौद्ध-मतका पतन होनेका जो सबसे प्रधान कारण है, हम
समझते हैं, उसकी ओर विद्वानोंका उतना ध्यान नहीं गया है
२

१८ हिन्दुत्व


जितना जाना चाहिये। यहाँ विस्तारके साथ इस विषयकी
मीमांसा नहीं की जा सकती, पर संक्षेपमें कुछ साधारण बातें कहे
देते हैं, जिनका विस्तारके साथ विवेचन पीछे किसी अवसरपर
किया जायगा। हिन्दू बौद्धमतका बहिष्कार करनेके लिये जो
तैयार हो गये, उसका कारण क्या केवल दार्शनिक मतभेद ही
था ? केवल दार्शनिक मतभेदसे ही ऐसा हुआ हो, यह सम्भव
नहीं है; क्योंकि दार्शनिक मतभेद तो सदासे चले आते हैं और
दोनों प्रकारके मतोंका साथ-साथ ही प्रचार भी होता चला
आया है। तो क्या बौद्धोंके विहारोंमें पीछेसे जो अनाचार और
व्यभिचार होने लगा, उससे ऐसा हुआ ? यह भी एकमात्र कारण
नहीं हो सकता; क्योंकि यदि अनेक विहारोंमें उन व्यभिचारियोंका
जमावड़ा हुआ था, जो दूसरोंके परिश्रमसे उपार्जित वस्तुओंपर
जीवन निर्वाह करते और परायी सम्पत्ति अनाचारोंमें फूँक
डालते, तो उसके साथ-साथ उन महान् तपस्वी और ज्ञानी
अर्हतों और भिक्षुओंकी परम्परा भी तो अभीतक जारी थी। और
व्यभिचार केवल बौद्ध-विहारोंमें ही तो नहीं था। ऐसे-ऐसे दोषों-
का इतना भयानक परिणाम कि भारतवर्षसे बौद्धोंकी सत्ता ही उठ
गयी, कदापि न होता; यदि बौद्धोंके प्रचारका राजनीतिक परि-
णाम राष्ट्रकी जीवनीशक्ति, और तो क्या, हमारी जातिके अस्ति-
त्वके लिये इतना विघातक न होता। यह जैसा शोकपर्यव-
सायी नाटक हुआ है, उसके लिये शाक्यसिंहके जीवनकी ही
एक घटना जितनी उत्तमताके साथ विष्कंभकका काम देगी,

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान १६
उतनी किसी कविकी कोई कल्पना नहीं दे सकती। शाक्यसिंह
जिस समय अपने बौद्ध-सम्प्रदायकी नींव दे रहे थे, उसो समय
उन्होंने यह खबर सुन ली कि शाक्योंके उस छोटेसे प्रजातन्त्र-
राजकी क्या गति हुई। वे अपनी जातिके भूषणभूत नरवीरोंको
अपने भिक्खू-सम्प्रदायकी दीक्षा दे चुके थे और शाक्य-प्रजा-
तन्त्र वीरोंसे विहीन होकर दूसरोंके अधीन हो गया और यह
घटना शाक्यसिंहके जीवनकालमें ही हुई ! उन्हें जब यह खबर
मालूम हुई, तब उसका उन 'बुद्ध' पर कोई असर नहीं हुआ !
शताब्दियां उलट गयीं; शाक्योंके राजा सब राजाओं के राजा-
लोकजित हो गये। छोटे शाक्यराजकी चतुःसीमा विस्तृत
हो गयी, वह भारतवर्ष की चतुःसीमा हो गयी; और कपिलवस्तु-
के छोटे प्रजातन्त्रकी जो दुर्गति हुई, वही भारतवर्षकी भी हुई-
भारतवर्ष आक्रमणकारी योद्धाओंका शिकार हुआ-शाक्य तो
अपने ही जातिभाइयोंके शिकार हुए, पर भारतवर्ष लीचियों
और हूणोंका शिकार हुआ। यदि बुद्ध-भगवानको इसकी खबर
मिले-किसी तरहसे उनके पास यह खबर पहुँचायी जा सके,
तो इससे भी वे वैसे ही उदासीन रहेंगे जैसे कपिलवस्तुकी
खबर सुनकर उनके चित्तपर कोई असर नहीं हुआ। पर सब
हिन्दू राजनीतिक दासत्वके जहरका प्याला शांतिके साथ अपने
होठों से कैसे लगा सकते हैं? जिन असभ्य और बर्बर जातियों-
की क्रूर हिंसावृत्तिका उन्हें सामना करना पड़ा, वे अहिंसा और
आध्यात्मिक बन्धु-भावकी मधुर बातोंसे शांत होनेवाले नहीं थे।

२० हिन्दुत्व
इनके फौलादी खड्गकी धार मृदु तालपल्लवों और सुस्वर
मन्त्रोच्चारसे मन्द होनेवाली नहीं थी। हम उस विशाल विश्व-
बन्धुत्वको और उसके दैवी संकल्पको भुलाना नहीं चाहते—
उसपर अभियोग लगानेकी बात तो दूर रही। पर उसका जो
परिणाम सामने दिखायी देता है, वह इतना प्रत्यक्ष है कि इति-
हासका कोई विद्यार्थी उससे अपना ध्यान नहीं हटा सकता। हम
जानते हैं, हमारे इस कथनके प्रतिवादमें अनायास ही यह कहा
जा सकता है कि भारतवर्षमें जो सबसे बड़े और सबसे
शक्तिशाली राजा और सम्राट् हुए, वे बौद्धकालमें ही हुए। पर
यह कौन कहता है ? यूरोपियन कहते हैं और हमारे वे लोग
कहते हैं, जिन्होंने बे-जाने यूरोपियनोंके विचार और उन विचारों-
के साथ उनके कुसंस्कार भी अपने दिमागमें भर लिये हैं। एक
समय था, जब भारतीय स्कूलों में पढ़ाया जानेवाला भारतका
इतिहास मुसलमानोंके आक्रमणसे ही आरम्भ होता था, क्योंकि
उस समय अंग्रेज लेखक हमारे पूर्वकालीन जीवनकी और कोई
बात प्रायः नहीं जानते थे। अब इधर कुछ कालसे यूरोपको
हमारे बौद्धकालीन इतिहासकी भी बहुतसी-बातें मालूम हुई
हैं और इसलिये हम यह मान बैठते हैं कि हमारे इतिहासका
आदि और सर्वोत्तम अंग यही है। पर बात यह है कि यह इति-
हासका न तो आदि है न अन्त। बुद्ध-धर्म-संघके प्रति हमारा
जितना प्रेम और आदर है, उससे अधिक और किसीका क्या
होगा ? बुद्ध-धर्म और संघ हमारे थे। उनका गौरव हमारा है

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २१
और उनका पतन भी हमारा है। देवानां प्रियं अकोश बड़े थे,
बौद्ध भिक्षुओंने जो काय किया, वह उससे भी महान् था। पर
इनसे यदि अधिक नहीं तो इतने ही महान् और पवित्र तथा इनसे
अधिक विचारपूर्ण पराक्रम इनके पूर्व हो चुके थे और उन्हीं परा-
क्रमोंने इन्हें भी इतना पराक्रमी बनाया था। इसलिये हम इस
बातको नहीं मानते कि हमारी जातिका राजनीतिक ओज और
पुरुषोचित पराक्रम मौर्यवंशके साथ आरम्भ हुआ और उसीके
साथ उसका अन्त हुआ—या यह बौद्ध-मत अंगीकार करनेका ही
परिणाम था। बौद्ध-मतने भी विजय प्राप्त की है, पर वह विजय
उस लोककी है, इस लोककी नहीं, जहाँ जिस-तिसके हाथमें
फौलाद है और तृष्णा इतनी बलवान और वास्तविक है कि
वह आकाश-गंगाके मनोहर दृश्यसे नहीं बुझ सकती।
ये बातें हमारे देशभक्तों और विचारशील पुरुषोंके ध्यानमें आ
गयी होंगी, जब हूण और शक ज्वालामुखीकी अग्निज्वालाओंके
समान इस देशमें फैलकर इसे तहस-नहस करने लगे। हिन्दु-
स्थानवासियोंने देखा कि हमारी जातिके आदर्श—हमारे राज-
सिंहासन, हमारे परिवार और हमारे देवतातक पैरों-तले कुचले
जा रहे हैं, हमारी धर्मभूमि उजड़ रही है और बर्बरोंके झुण्ड
आकर हमें लूट रहे हैं। भारतवासियोंकी सभ्यता और संस्कृतिको
देखते, भाषा, धर्म, तत्वज्ञान तथा दया-दाक्षिण्यादि मनुष्यो-
चित गुणोंमें इन आक्रमणकारियों की अवस्था अत्यन्त हीन थी।
पर केवल भौतिक वलमें वे श्रेष्ठ थे—बल ही उनका सर्वस्व था

२२ हिन्दुत्व
—ढाल और तलवार ! यही उनका मंत्र था। इसका फल स्पष्ट
था। यह बात भी स्पष्ट थी कि बौद्धदर्शनमें इस नवीन और
भयानक "द्वैत" का, इस "अग्नि और खड्गके" धर्मशास्त्रका कोई
जवाब नहीं था। इसलिये हमारी जातिके नेताओंको इस अपवित्र
अग्निका सामना करनेके लिये यज्ञीय अग्निको फिरसे प्रज्वलित
करना पड़ा और फौलादके लिये उसे कालीकी वेदीकी सानपर
चढ़ाकर तीक्ष्ण करनेके लिये वेदोंकी खानें खोलनी पड़ीं, जिसमें
कालदेवता 'महाकाल' संतुष्ट हों। उनका विचार भी ठीक
उतरा। हिन्दू क्षात्र तेजने वह विजय प्राप्त की, जो चिरस्मरणीय
रहेगी। विक्रमादित्यने विदेशियोंको भारत-भूमिसे मार भगाया
और ललितादित्यने उनके अड्डोंमें घुसकर तारतरीसे मंगोलिया-
तक उनका देश पादाक्रान्त करके उन्हें अच्छी तरह दण्ड
दिया। वीरताने वह काम किया जो वचनोंकी गंभीरता न
कर सकी। फिर एक बार राष्ट्र उस गौरवको प्राप्त हुआ,
जिसका प्रकाश जीवनके सभी विभागोंपर पड़ा। काव्य
और तत्त्वज्ञान, कला और शिल्प, कृषि और वाणिज्य, विचार
और आचार सबमें वह जीवन-ज्योति आ गयी, जो स्वाधीनता,
सामर्थ्य और विजयकी अनुभूतिसे ही जगमगाया करती है।
पूर्ण क्रांति हुई—कोई कसर नहीं। "वैदिक धर्म" और
"वेदोद्धार" की पुकार मची। राष्ट्रकी यह पुकार बढ़ती ही गयी,
उसका जोर बढ़ता गया, क्योंकि यह राजनीतिक आवश्यकता
ही थी।

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २३
बौद्ध-मतने ही सर्वप्रथम और सबसे महान् प्रयत्न, विश्वधर्म
प्रचारका किया। "हे भिक्खुओ, संसारकी दशों दिशाओंमें जाओ
और साधुताके विधानका उपदेश करो।" सचमुच, वह साधुता-
का ही विधान था, उसमें और कोई गुप्त हेतु नहीं था, उसमें
भूमि या अधिकारका कोई लोभ नहीं था; उसने काम भी बहुत
बड़ा किया, पर वह पाशविक मनोविकारों या राजनीतिक मह-
त्वाकांक्षाओं अथवा व्यक्तिगत स्वार्थोंके बीज मानवी मनोभूमिसे
उखाड़ नहीं सका, जिससे हिन्दुस्थान शस्त्र नीचे रखकर निश्चिन्त
रह सकता। फिर भी, संसारकी शिक्षाके लिये हिन्दुस्थानने
अपनी यह इच्छा घोषित की कि, "शस्त्रकी विजयकी अपेक्षा शांति
और साधुताकी विजयसे ही हमें अधिक आनन्द होगा।" इसके
लिये उसने क्या नहीं किया? इतनी उदारता और महत्ता दिखायी
कि अधिकार और संपत्तिकी लालसा उसे देखकर हँसने लगी !
हिन्दुस्थानके राजाओंने ऐसी ऐसी राजाज्ञाएं निकालीं कि घोड़े
और हाथियोंको जो जल पिलाया जाय, वह छानकर पिलाया
जाय, जिसमें उन जलीय जीवोंकी रक्षा हो। समुद्रके मध्यमें
अनाज फेंकनेके स्थान बनाये गये थे, जिसमें समुद्रकी मछलि-
योंको उत्तम आहार मिले। परन्तु मनुष्योंने अभीतक मछली
खाना नहीं छोड़ा था, न मछलियोंने ही एक दूसरेको खा जानेकी
वृत्ति छोड़ी थी। हिन्दुस्थानने स्वयं अपनी हिंसा कराकर
हिंसाकी हिंसा कर डालनेमें बड़ी महत्ता दिखायी—और अन्तमें
यह मालूम किया कि लातोंके देवता बातोंसे नहीं मानते। जब

२४ हिन्दुत्व
तक इस संसारमें और राष्ट्रीय तथा जातीय भेद इतने बलवान
हैं कि मनुष्योंको पशु बना देते हैं, तबतक हिन्दुस्थानको यदि
जीना है, चाहे वह जीवन राजनीतिक हो या आध्यात्मिक, तो
राष्ट्रीय और जातीय अखंडतासे उत्पन्न होनेवाले बलकी उपेक्षा
करनेसे काम नहीं चल सकता। इस प्रकार तत्कालीन देश-
नेताओंका जी विश्वबन्धुत्वकी इन बातोंसे ऊब गया और वे कहने
लगे—
ये त्वया देव निहता असुराश्चैव विष्णुना ।
ते जाता म्लेच्छरूपेण पुनरद्य महीतले ॥
व्यापादयन्ति ते विप्रान् घ्नंति यज्ञादिकाः क्रियाः ।
हरन्ति मुनिकन्याश्च पापाः किं किं न कुर्वति ॥
म्लेच्छाक्रांते च भू लोके निर्वषट्कार मंगले ।
यज्ञायागादि विच्छेदाद्वै लोकोऽवसीदति ॥ ( गुणाढ्य )
और जिन जंगली शकों और हूणोंने भिक्षुवेश धारण किये
और शस्त्र त्यागकर हाथमें तुलसी-माला लिये अहिंसाव्रती इस
सुरम्य देशको उजाड़ डाला था, उन्हें इन्होंने सिन्धु नदीके पार
मार भगाया और सुदृढ़ तथा अखंड राष्ट्रकी स्थापना की। तब
स्वभावतः ही हमारे देश-नेताओंके ध्यानमें यह बात भी आ गयी
कि इस नवीन राष्ट्रीय राज्यके पीछे यदि वैसे ही राष्ट्रीय धर्मका
बल हो तो फिर राष्ट्रकी शक्तिका क्या कहना है।
और एक बात ध्यानमें रखनेकी यह है कि हम और हमारे
शत्रुओंके बीच जितनी बातें समान होंगी, उतना ही उनका

प्रथम खण्ड: भौगोलिक, सांस्कृतिक एवं रक्त-सम्बन्ध की एकता

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २५
सामना करनेका हमारा बल कम होगा। जिस शत्रुके साथ
हमारा किसी भी बातमें मेल नहीं है, उसका हम घोरतम विरोध
कर सकते हैं, जैसे जिस मित्रके साथ हमारा हर बातमें मेल हो
और हम जिसकी प्रत्येक बातको अपने अन्दर पाकर उसकी
कदर करते हैं, उस मित्रके साथ हमारा सबसे अधिक प्रेम होता
है। हिन्दुस्थान विश्वबन्धुत्व और अहिंसाके नशेमें इतना चूर
हो गया था कि पाप, अपराध और आक्रमणका प्रतीकार करने-
की शक्ति भी उसकी नष्ट हो गयी थी, ऐसी अवस्थामें अन्याय-
की तरफसे देशके चित्तमें अत्यंत तीव्र तिरस्कार उत्पन्न करके
उसके प्रतीकारकी अदम्य शक्तिका संचार करनेके लिये यह
आवश्यकता हुई कि जिनके साथ हमें लड़ना है, उनसे हर
बातमें विषमता उत्पन्न की जाय, दोनोंके बीच उपासना-मार्गकी
जो समानता थी, वह भी नष्ट की जाय; क्योंकि इस उपासनामें
अपने उन सहधर्मियोंको गले लगाना पड़ता था, जिन्होंने उक्त
प्रकारसे देशका गला घोंटा था। ऐसे विश्वधर्मको लेकर क्या
करना है, जो राष्ट्रोंकी भयानक तामसी वृत्ति और पाशविक
अहंकारका दमन करनेके बदले हिन्दुस्थानको निश्चिन्त और
बेखबर बनाकर उन राष्ट्रोंकी अधिकार-लालसाको और भी उत्ते-
जित कर देता है? इसलिये उस बल और वीर्यपर ही भरोसा
किया गया, जो राष्ट्रीय आत्मचैतन्यसे ही उत्पन्न हुआ करता है।
इसके पूर्व वह अहिंसाके मार्गपर चलनेके लिये अपना सर्वस्व दे
चुका था, पर उससे उसकी सिद्धि नहीं हुई!

२६ हिन्दुत्व
बौद्ध-मतके विश्वबन्धुत्वके भावका तब तो और भी जोरसे
विरोध होने लगा, जब बौद्ध भारतवर्षमें बौद्ध राज्यकी पुनः
स्थापना करनेकी चेष्टा करने लगे। राष्ट्रीय भावको यह स्वीकार
नहीं था कि राष्ट्रीय स्वाधीनता नष्ट हो और किसी विदेशीय
विजेताको हम अपने राजाधिराज मानें। परंतु यदि यह विदेशीय
आक्रमणकारी कोई बौद्धमतावलंबी हुआ, तब तो यह निश्चय ही
था कि भारतीय बौद्ध उसके साथ गुप्त सहानुभूति रखते, जैसे
कैथोलिक संप्रदायके स्पैनिश उद्योगियोंको इंग्लैण्डकी राजगद्दी-
पर किसी कैथोलिक संप्रदायके वंशको स्थापित करनेके उद्योगमें
इंग्लैण्डके कैथोलिकोंसे अवश्य ही सहायता मिलती थी। यह
केवल निराधार तर्ककी बात नहीं है। प्राचीन ग्रंथोंमें इस बातके
प्रमाण हैं कि कई बार कुछ विदेशी बौद्ध राजाओंने भारतमें बौद्ध
राज्य स्थापित करनेके उद्देश्यसे भारतपर आक्रमण भी किया
था। उस जमानेके इतिहासका विस्तारपूर्वक विवेचन करनेका
यह स्थान नहीं है। पर यहां एक पुराणमें वर्णित ऐसे एक
आक्रमणके वर्णनकी ओर निर्देशमात्र कर सकते हैं। यह वर्णन
कुछ तो अलंकारात्मक और कुछ वास्तविक है। यह “आर्य-
देशजों” पर न्यनपत्ति (हूणोंके राजा) के आक्रमणकी कथा है।
पौराणिक पद्धतिसे बताया गया है कि किस प्रकार “हहा”
नदीके किनारे एक महान् युद्ध हुआ था और किस प्रकार चीनसे
बौद्ध सेना आयी थी (“चीनदेशमुपागम्य युद्धभूमिरकारयत्”)
और किस प्रकार कितने ही अन्य बौद्ध राष्ट्रोंने उसकी सहा-

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २७
यताके लिये अपनी अपनी सेनाएँ भेजी थीं—
श्यामदेशोद्भवा लक्षास्तथा लक्षाश्च जावकाः ।
दशलक्षाश्चीनदेश्या युद्धाय समुपस्थिताः ॥
और कैसा घमासान युद्धके होनेके पश्चात् बौद्ध हारे और
इस हारसे उन्हें कितनी जिल्लत उठानी पड़ी। उन्हें हिन्दुस्थानके
सम्बन्धमें अपने सब गुप्त राजनीतिक हेतु प्रकट रूपसे त्याग
देने पड़े और यह प्रतिज्ञा करनी पड़ी कि अब हम लोग किसी
राजनीतिक हेतुसे भारतमें प्रवेश न करेंगे। पर धर्मसहिष्णुता
जिस भारतकी विशेषता है, उस भारतसे बौद्धोंको व्यक्तिशः कुछ
भी भय नहीं था; पर भारतके राष्ट्रीय जीवन और स्वातंत्र्यपर
चढ़ाई करनेका स्वप्न देखना उन्हें परित्याग करना पड़ा ।
सर्वैश्च बौद्धवृन्दैश्च तत्रैव शपथं कृतम्।
आर्यदेशं न यास्यामः कदाचिद्राष्ट्रहेतवे ॥ (भविष्यपुराण—
प्रतिसर्ग पर्व )
और इस प्रकार हमारे आचार-विचारकी जो विशेषताए
थीं, वे फिरसे प्रकट होने लगीं—वर्णाश्रमव्यवस्था बौद्धोंके
कालमें भी नष्ट नहीं हुई थी और अब तो उसकी लोकप्रियता
इतनी बढ़ गयी कि बड़े-बड़े राजा-महाराजा “वर्णव्यवस्थापनपरः”
(सोनपत-ताम्र लेख)—“वर्णाश्रमव्यवस्थापनप्रवृत्तचक्रः” (मध-
वत ताम्रपट) कहलानेमें अपनी बड़ी प्रतिष्ठा समझते थे।
इस वर्णाश्रम-व्यवस्थाका इतना आदर बढ़ा कि मानों उसीमें
सारी राष्ट्रीयता समा गयी। हमारे और विदेशियोंके बीच जो

२८ हिन्दुत्व
भेद निर्दिष्ट किया गया, वह यही तो था कि—
चातुर्वर्ण्यं व्यवस्थानं यस्मिन्देशे न विद्यते ।
तं म्लेच्छदेशं जानीयादार्यावर्तस्ततःपरः ॥
इसीके एक कदम आगे बढ़कर यह किया गया कि हमारे
लोग समुद्रपारके उन देशोंमें न जायँ, जो हमारे रहने योग्य नहीं
हैं और जहाँ हमारे आचार-विचारका आदर नहीं होता; उलटे
विरोध होता है और इसलिये जहाँ हम अपने आचार-विचारोंकी
रक्षा न कर सकेंगे । बौद्ध-मतसे जो चित्त हट गया, उसकी यह
तद्विरुद्ध प्रतिक्रिया थी और अवश्य ही यह अति मात्रामें थी ।
तथापि, यदि राजनीतिक दृष्टिसे विचार किया जाय तो इसका
अर्थ समझमें आ जाता है; क्योंकि आज भी तो इस बातका
आन्दोलन होता रहता है कि जिन देशोंमें हमारी जातिका अपमान
होता है, उन देशोंमें हमारे यहाँके लोग न भेजे जाय—उपनिवेशों-
में भारतीयोंका भेजा जाना बन्द किया जाय ।
इस प्रकार भारतवर्षसे बौद्धमत जो उठ गया, उसका कार्य-
कारण राजनीतिक और राष्ट्रीय प्रयोजन था । बौद्ध-मतका कोई
भौगोलिक केन्द्र नहीं था । बौद्धमतको स्वीकार करके भारतवर्षने
अपना वह भौगोलिक केंद्र खो दिया था और अब फिरसे उसकी
स्थापना करनी थी । जब राष्ट्रका आत्म-चैतन्य पूर्ण रूपसे जागा
और उसे स्व-परके भेदाभेदकी पूरी पहचान हुई, तब उसने यह
भेद निर्दिष्ट भी कर दिया और अपनी स्थिति अपने सामने ऐसी
स्पष्ट कर दी कि उसे यह मालूम हो कि हम कहाँ हैं और संसार

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २६
भी जाने कि यह एक जाति है, एक राष्ट्र है, केवल यही नहीं, यह
एक देश है और एक राज्य है। दक्षिण ओर हमारे देशकी स्वाभा-
विक सीमा आप ही बँध चुकी थी। दक्षिण-महासागरसे इस
सीमाकी शोभा और पूर्णता निर्मित थी। "समुद्र-रचना" का
दृश्य देख देखकर हमारे कवि और देशभक्त सदासे ही अपने
नेत्रोंको तृप्त किया करते थे। परन्तु उत्तर-पश्चिम ओर जातियोंका
संमिश्रण बड़े बेढंगे तौरपर हो रहा था तथा हमारे देशकी सीमा
भी सदा अस्थिर रहा करती थी। इसलिये इस ओर सीमा निर्दिष्ट
करनेकी आवश्यकता यदि स्वतः स्थापित होनेके इस उद्योगमें
हमें प्रतीत न होती, तो निश्चय ही यह बड़े आश्चर्यकी बात होती ।
उज्जैनके "महाकाल" के अधिष्ठानमें जिन्होंने स्वराष्ट्र-स्थापनका
इतना महान् उद्योग किया, वे इस सीमाको निर्दिष्ट करनेकी आव-
श्यकताकी उपेक्षा नहीं कर सकते थे । उत्तर-पश्चिमकी यह सीमा
वेगवती, साथ ही गम्भीर स्रोतस्वती सिन्धु नदीके सिवाय और
क्या होती ? जिस दिन हमारे पूर्वज उस नदीको पार करके इधर
आये, उसी दिन उनका सम्बन्ध उन लोगोंसे छूट गया जिन्हें छोड़
कर वे इधर आये और एक नवीन राष्ट्रके संस्थापक हुए—एक
नवीन आशा, नवीन उद्देश्यको धारण कर वे एतद्देशप्रसूत
जातियोंको मिलाते और वंश-विस्तार करते हुए एक जाति और
एक राष्ट्र हो गये। जिस जाति और राष्ट्रको सिन्धु या हिन्दू
कहनेमें जो औचित्य और प्रेम है, वह और किसी नाममें नहीं है।
सिन्धु-नदीको ही अपनी सीमा करना कोई नवीन बात भी

३० हिन्दुत्व
नहीं था, "फिरसे वेदोंकी स्थापना" की जो पुकार राष्ट्रमें मची
हुई थी उसीका यह स्वाभाविक परिणाम था। वैदिक धर्मके
अधिष्ठानमें जिस वैदिक राज्यकी स्थापना हो, उसका नाम भी तो
वैदिक ही होना चाहिये और क्या यह भी आवश्यक नहीं है कि
नामकरणका प्रकार भी वैदिक ही हो ? ऐसा ही हुआ। पुराणों-
में लेख है कि विक्रमादित्यके पौत्र शालिवाहनने विदेशियोंका
इस देशमें दूसरी बार घुस आनेका प्रयत्न विफल किया और
उन्हें सिन्धु नदीके पार मार भगाकर यह राजाज्ञा घोषित की
कि आजसे आर्य और अनार्य राष्ट्रोंके बीच सिन्धु नदी सीमा
मानी जायगी—
“एतस्मिन्नंतरे तत्र शालिवाहन भूपतिः ।
विक्रमादित्यपौत्रश्च पितृराज्यं प्रपेदिरे ॥
जित्वा शकान् दुराधर्षान् चीनतैत्तिरिदेशजान् ।
बाल्हिकान् कामरूपांश्च रोमजान् खुरजान् शठान् ॥
तेषां कोषान् गृहीत्वाच दण्डयोग्यानकारयत् ।
स्थापिता तेन मर्यादा म्लेच्छार्याणां पृथक् पृथक् ॥
सिन्धुस्थानमितिज्ञेयं राष्ट्रमार्यस्य चोत्तमम् ।
म्लेच्छस्थानं परं सिन्धोः कृतं तेन महात्मना ॥
(भविष्यपुराण प्रतिसर्ग पर्व)
हमारे देशका प्राचीनसे प्राचीन नाम जो ग्रन्थोंमें मिलता है,
वह "सप्तसिन्धु" या "सिन्धु" है। "भारतवर्ष" भी पीछेका
नाम है और यह वैयक्तिक है। व्यक्तिविशेषका गौरव चाहे वह

हिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान ३१
कितना ही महान् हो, समय बीतनेके साथ क्षीण हो ही जाता है।
जिस नाममें वैयक्तिक गौरव और पराक्रम ही भरा हुआ है, वह
नाम राष्ट्रकी कृतज्ञता-बुद्धि और आत्मगौरव जब बढ़ने
लगता है, तब उस राष्ट्रके चित्तका वैसा समाधान नहीं कर
सकता, जैसा कि कोई ऐसा नाम करे जिसमें राष्ट्रीय पराक्रम भरा
हो, जिसमें राष्ट्रके पूर्व पुरुषोंकी स्मृति संरक्षित हो और इसके साथ
जो कोई उत्तम और स्थायी प्राकृतिक पावन दृश्य नेत्रोंके सामने
उपस्थित करता हो। महाराज भरत आये और चले गये। ऐसे
और भी कितने ही महान् राजा हो गये !—पर सिन्धु अभीतक
वर्तमान है और सदा ऐसी ही वर्तमान रहेगी, हमारी कृतज्ञता-
बुद्धिको सदा इसी प्रकार जगाती और बढ़ाती रहेगी, हमारे
आत्मसम्मानकी इसी प्रकार वृद्धि करती रहेगी, हमारे पूर्वजोंकी
स्मृतिका संचार करती रहेगी—हमारी भवितव्यतापर उसका
पहरा रहेगा। यही हमारे राष्ट्रके कालशरीरका वह मेरुदण्ड
है, जो अति प्राचीनके साथ सुदूर भविष्यका सम्बन्ध रखता
है। जो नाम हमारे राष्ट्रको एक नदीके साथ सम्बद्ध करता
और उसके साथ मिला देता है, वह प्रकृतिको हमारी तरफ ला
देता है और हमारे राष्ट्रीय जीवनको एक ऐसे आधारपर स्था-
पित करता है, जो आधार (जहांतक मानवी दृष्टिकी पहुँच है)
चिरस्थायी है। ये सब बातें हमारे पूर्वजोंके ध्यानमें आयी होंगी
और इन्हींसे प्रेरित होकर उन्होंने हमारे राष्ट्र और देशका नाम
“सिन्धुस्थान” रखा होगा।