हिन्दुत्व: हिन्दू कौन है? (स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर - रत्नागिरि जेल में रचित वैचारिक ग्रन्थ)
Hindutva: Who is a Hindu? by Veer Savarkar
स्वातंत्र्यवीर विनायक दामोदर सावरकर द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहिन्दुस्थान और म्लेच्छस्थान २३
बौद्ध-मतने ही सर्वप्रथम और सबसे महान् प्रयत्न, विश्वधर्म
प्रचारका किया। "हे भिक्खुओ, संसारकी दशों दिशाओंमें जाओ
और साधुताके विधानका उपदेश करो।" सचमुच, वह साधुता-
का ही विधान था, उसमें और कोई गुप्त हेतु नहीं था, उसमें
भूमि या अधिकारका कोई लोभ नहीं था; उसने काम भी बहुत
बड़ा किया, पर वह पाशविक मनोविकारों या राजनीतिक मह-
त्वाकांक्षाओं अथवा व्यक्तिगत स्वार्थोंके बीज मानवी मनोभूमिसे
उखाड़ नहीं सका, जिससे हिन्दुस्थान शस्त्र नीचे रखकर निश्चिन्त
रह सकता। फिर भी, संसारकी शिक्षाके लिये हिन्दुस्थानने
अपनी यह इच्छा घोषित की कि, "शस्त्रकी विजयकी अपेक्षा शांति
और साधुताकी विजयसे ही हमें अधिक आनन्द होगा।" इसके
लिये उसने क्या नहीं किया? इतनी उदारता और महत्ता दिखायी
कि अधिकार और संपत्तिकी लालसा उसे देखकर हँसने लगी !
हिन्दुस्थानके राजाओंने ऐसी ऐसी राजाज्ञाएं निकालीं कि घोड़े
और हाथियोंको जो जल पिलाया जाय, वह छानकर पिलाया
जाय, जिसमें उन जलीय जीवोंकी रक्षा हो। समुद्रके मध्यमें
अनाज फेंकनेके स्थान बनाये गये थे, जिसमें समुद्रकी मछलि-
योंको उत्तम आहार मिले। परन्तु मनुष्योंने अभीतक मछली
खाना नहीं छोड़ा था, न मछलियोंने ही एक दूसरेको खा जानेकी
वृत्ति छोड़ी थी। हिन्दुस्थानने स्वयं अपनी हिंसा कराकर
हिंसाकी हिंसा कर डालनेमें बड़ी महत्ता दिखायी—और अन्तमें
यह मालूम किया कि लातोंके देवता बातोंसे नहीं मानते। जब